पत्रकार अजय सेतिया की विरोध और भक्ति की पत्रकारिता

Sanjaya Kumar Singh : इंदौर में एक अभय प्रशाल (abhayprashal.com) है। यह एक स्टेडियम, स्पोर्ट्स क्लब और मध्य प्रदेश की खेल राजधानी कहे जाने वाले इंदौर में खेलों का मुख्य केंद्र भी। इसका नाम अभय प्रशाल एक समय हिन्दी के बड़े और सम्मानित मीडिया संस्थान रहे नई दुनिया के संपादक, मालिक, पत्रकार या सर्वेसर्वा अभय छजलानी के नाम पर है। इंदौर एक समय नई दुनिया का मुख्यालय भी था। नहीं जानने वालों के लिए मैं अभय प्रशाल के नामकरण की कहानी उमेश त्रिवेदी के एक निबंध, “वे हर बार अमिट छाप छोड़ते हैं”, से कर रहा हूं जो अभय छजलानी के बारे में है और 1997 में प्रकाशित, “कठोर डग, सधे कदम” में प्रकाशित है। संबंधित अंश (संपादित) इस प्रकार है…

”….खेल प्रशाल का लोकार्पण समारोह होने वाला था। अर्जुन सिंह केंद्र में मानव संसाधन विकस मंत्री और दिग्विजय सिंह प्रदेश के मुख्यमंत्री थे। मेरे दिमाग में पहले से ही यह विचार कुलबुला रहा था कि खेल प्रशाल का नाम अभय जी के नाम पर होना चाहिए। ….. दूसरी ओर इंदौर में सुरेश गावड़े भी इसी लाइन पर सोच रहे थे। उनका फोन आया कि – उमेश खेल प्रशाल का नाम अभय जी के नाम पर होना चाहिए ….। अगले दिन पुष्पा मित्तल का फोन था कि – उमेश जी आप क्या सोचते हैं, यदि खेल प्रशाल का नाम अभय जी के नाम पर हो तो …? …. मैंने सोचा यह बात अभय जी के कान में डाल दी जाए। ….. वे अपनी तरफ से खेल प्रशाल का नाम रख चुके थे। ….. इसी उधेड़बुन में जब मैं खेल प्रशाल का निमंत्रण देने मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के पास पहुंचा तो उन्होंने पूछा कि इस मौके पर क्या घोषणा की जा सकती हैं, जिससे समारोह स्थायी रूप से यादगार बन सके। मैंने अभय जी के निर्देशानुसार उन्हें सुझाव दिया…..। मुख्यमंत्री ने मेरी शक्ल देखी और कहा कि खेल प्रशाल का नाम अभय जी के नाम पर रख दें तो कैसा रहेगा? ….. इसके बाद बात आई-गई हो गई। … लेकिन हमलोगों का उस वक्त आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा जब मुख्यमंत्री ने अचानक नामकरण का प्रस्ताव रख दिया और ऐसा लगा कि उन्होंने खेल प्रशाल में बैठे सभी लोगों के मन की बात कह दी। लेकिन मुख्यमंत्री का यह प्रस्ताव अभय जी के लिए सबसे ज्यादा सकपकाने वाला था। उनके चेहरे पर इतना संकोच, इतना असमंजश, इतनी ऊहापोह मैंने पहले कभी नहीं देखी थी। ….. रमेशा बाहेती दर्शकों का मूड भांप चुके थे। उन्होंने तत्काल ट्रस्ट की ओर से प्रस्ताव रखकर मुख्यमंत्री के प्रस्ताव को हरी झंडी दे दी। …. किन्तु अभय जी के लिए यह चौंकाने वाला प्रसंग था जो उनके चेहरे पर साफ नजर आ रहा था।”

इस कहानी का साथी अजय सेतिया की इस पोस्ट से कोई संबंध नहीं है। इसका मकसद पाठकों को यह बताना है कि आप पूरी बात न जानें तो कई बार गलत निष्कर्ष निकाल सकते हैं। जैसे यह माना जाता है कि जीवित व्यक्तियों के नाम पर नामकरण नहीं होता है या हो जाए तो अपशकुन होता है, आदि। यहां ऐसा कुछ नहीं हुआ। आज मैंने फोन करके पूछ लिया अभय छजलानी 80-85 साल की उम्र में भी सक्रिय और स्वस्थ हैं। ईश्वर से कामना है कि दीर्घायु हों। यहां अजय सेतिया की पोस्ट को उद्धृत करने का मकसद यह बताना है कि कैसे व्यक्ति निष्पक्ष होते हुए भी आधारहीन विरोध कर सकता है। और यह दावा करता रह सकता है कि वह सरकार का समर्थन नहीं करता है। उनकी पोस्ट है, “फिलहाल इसका नाम गतिमान एक्सप्रेस है। सोचो यूपीए शासन काल में चलती तो इसका क्या नाम होता।”

भारतीय रेल में नेहरू, गांधी के नाम पर कोई ट्रेन मुझे तो याद नहीं आ रही है। ट्रेन का नाम ज्यादातर उनके छूटने-पहुंचने के स्थान पर या राजधानी, शताब्दी, गरीबरथ, दुरंतो जैसे हैं और नया नाम गतिमान भी इसी क्रम में है। ऐसे में गतिमान नाम के लिए कोई श्रेय देना या यूपीए का मजाक उड़ाना (निष्पक्ष पत्रकार के लिए) बेमतलब का काम है। मैं नहीं कहता कि कांग्रेस ने नेहरू, इंदिरा, गांधी, राजीव आदि के नाम पर जो नाम रखे हैं वो सभी सही हैं या उसमें अति नहीं हुई है। पर एक पत्रकार के रूप में मुझे विरोध करना होगा तो बाकायदा करूंगा तर्क-सबूत के साथ। सेतिया जी, आप भले नरेन्द्र मोदी के पक्ष में नहीं लिख रहे हैं पर भक्तों की तरह काम कर रहे हैं। भक्त कहां लिखते हैं। हर लिखे पर टिप्पणी जरूर करते हैं। सरकार विरोधी को आपिया, कांग्रेसी, सेकुलर करार देते हैं। आप वही करते नजर आ रहे हैं।

वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह के फेसबुक वॉल से.

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