मनोज अभिज्ञान-
इंवेस्टमेंट महज़ आंकड़ों और बाजार के रुझानों का खेल नहीं है; यह गहरे मनोवैज्ञानिक, दार्शनिक और आर्थिक अवधारणाओं से भी जुड़ा हुआ है। एडम स्मिथ ने अपनी पुस्तक ‘वेल्थ ऑफ नेशंस’ में ‘अदृश्य हाथ’ (Invisible Hand) की अवधारणा दी थी, जिसमें उन्होंने बताया कि बाजार अपने आप संतुलन बना लेता है, बशर्ते निवेशक अपनी व्यक्तिगत भावनाओं और पूर्वाग्रहों को अलग रखकर तर्कसंगत निर्णय लें। लेकिन जब निवेशक राजनीति, विचारधारा या व्यक्तिगत मान्यताओं को अपने निवेश निर्णयों का आधार बना लेते हैं, तो वे उस ‘अदृश्य हाथ’ को बाधित कर देते हैं। डैनियल काह्नमैन और अमोस ट्वरस्की जैसे व्यवहारवादी अर्थशास्त्रियों ने सिद्ध किया है कि मनुष्य अक्सर ‘संज्ञानात्मक पूर्वाग्रह’ (Cognitive Bias) के कारण गलत वित्तीय निर्णय लेता है। निवेशक जब अपनी राजनीतिक निष्ठा को वित्तीय निर्णयों से जोड़ते हैं, तो वे बाजार के वास्तविक संकेतों की उपेक्षा कर देते हैं, जिससे दीर्घकालिक नुकसान का खतरा बढ़ जाता है।
मार्क्स ने पूंजीवाद के अंतर्निहित संकटों की व्याख्या करते हुए बताया था कि उत्पादन के साधनों का स्वामित्व एक सीमित वर्ग के पास होता है, जबकि आम जनता भावनात्मक लहरों में बहकर निवेश के निर्णय लेती है। जब पूंजीवादी बाजार को किसी विचारधारा या राजनीति से जोड़ दिया जाता है, तो यह ‘फाल्स कॉन्ससनेस’ (False Consciousness) को जन्म देता है—यानी लोग वास्तविक आर्थिक हितों के बजाय भावनात्मक और प्रतीकात्मक कारणों से निवेश करने लगते हैं। इसका एक उदाहरण ESG (पर्यावरण, सामाजिक और प्रशासन) इंवेस्टमेंट स्ट्रैटजी है, जिसे नैतिक निवेश के रूप में प्रचारित किया गया, लेकिन इसका कोई दीर्घकालिक लाभ नहीं हुआ। इसी तरह, अगर कोई निवेशक सिर्फ अपने राजनीतिक झुकाव के कारण किसी उद्योग या कंपनी में निवेश करता है, तो वह बाजार के व्यापक आर्थिक कारकों—जैसे मुद्रास्फीति, ब्याज दरों और अंतरराष्ट्रीय व्यापार संतुलन—को अनदेखा कर देता है, जिससे उसके निर्णय अव्यावहारिक हो सकते हैं। निवेश और राजनीति के बीच संबंध हमेशा से रहा है, लेकिन यह रिश्ता अक्सर निवेशकों के लिए नुकसानदायक साबित होता है।
अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप के दूसरी बार सत्ता संभालने के बाद हाल ही में प्रस्तावित Defiance MAGA Seven ETF इसका उदाहरण है, जो उन सात कंपनियों में निवेश करने की योजना बना रहा है जो ट्रंप प्रशासन की नीतियों से लाभान्वित हो सकती हैं। यह विचार सुनने में आकर्षक लग सकता है, लेकिन वास्तव में यह जोखिम भरी रणनीति है। सबसे पहली समस्या यह है कि बाजार में कोई भी स्पष्ट दिखने वाली चीज़ पहले ही कीमतों में समाहित हो चुकी होती है। यदि कोई मानता है कि ट्रंप के दोबारा सत्ता में आने से रक्षा और एयरोस्पेस कंपनियों के शेयर बढ़ेंगे, तो यह संभावना पहले ही बाजार द्वारा आंकी जा चुकी होगी। इसी तरह, अगर कोई मानता है कि क्रिप्टोकरेंसी पर ट्रंप की नीतियों से Coinbase को लाभ होगा, तो निवेशकों ने पहले ही इस संभावना को शेयर की कीमत में शामिल कर लिया होगा।
इतिहास इस बात का गवाह है कि चुनावी नतीजों के आधार पर किया गया निवेश दीर्घकालिक रूप से अस्थिर साबित होता है। 2024 के चुनाव के बाद Trump Media & Technology Group के शेयरों में चार गुना उछाल आया, लेकिन कुछ ही महीनों में इसमें 34% की गिरावट आ गई। CoreCivic, जो निजी जेलों का संचालन करता है, चुनाव के बाद लगभग दोगुना हो गया, लेकिन इस साल 12% गिर गया। यह दर्शाता है कि राजनीतिक आधार पर किया गया निवेश अक्सर अल्पकालिक भावनात्मक उतार-चढ़ाव पर निर्भर करता है, न कि किसी ठोस आर्थिक आधार पर।
इसके अलावा, शेयर बाजार की दिशा केवल किसी देश के शासक की नीतियों से तय नहीं होती। महंगाई, ब्याज दरें, कमोडिटी की कीमतें, डॉलर का मूल्य, युद्ध, प्राकृतिक आपदाएँ और अन्य देशों की नीतियाँ भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। किसी देश का शासक, भले ही अमेरिका का राष्ट्रपति क्यों न हो, इनमें से कुछ कारकों को तो प्रभावित कर सकता है, लेकिन उन पर पूरी तरह नियंत्रण नहीं कर सकता।
जब कोई निवेशक अपनी राजनीतिक विचारधारा के आधार पर कुछ कंपनियों को चुनता है या अस्वीकार करता है, तो वह अपने पोर्टफोलियो को बाज़ार के संपूर्ण परिदृश्य से अलग कर देता है। उदाहरण के लिए, टेक्नोलॉजी सेक्टर एस एंड पी 500 का 30% से अधिक हिस्सा बनाता है और हाल के वर्षों में बाज़ार के मुनाफे में इसने महत्वपूर्ण योगदान दिया है। लेकिन कुछ निवेशक समावेशी और प्रगतिशील कंपनियों को नकारते हैं, जिससे उनका पोर्टफोलियो टेक्नोलॉजी की तुलना में औद्योगिक, वित्तीय और ऊर्जा कंपनियों की ओर अधिक झुक जाता है। राजनीतिक नज़रिए से बनाए गए ईटीएफ की अस्थिरता इस बात को और स्पष्ट करती है। God Bless America ETF जो उन कंपनियों में निवेश करता है जो राजनीतिक रूप से वामपंथी रुख नहीं अपनातीं, ने हाल ही में एस एंड पी 500 की तुलना में 0.7 प्रतिशत कम परफॉर्म किया है। दिलचस्प बात यह है कि बाइडेन के कार्यकाल के दौरान इसने बेहतर प्रदर्शन किया था।
इसी तरह, Point Bridge America First ETF उन कंपनियों में निवेश करता है जिनके कर्मचारी और पॉलिटिकल एक्शन कमिटी रिपब्लिकन पार्टी को दान देते हैं। लेकिन 2017 में शुरू होने के बाद से इसने एस एंड पी 500 की तुलना में औसतन 3 प्रतिशत कम वार्षिक रिटर्न दिया है। इस विचार को लेकर निवेशकों को सवाल करना चाहिए—क्या किसी कंपनी का राजनीतिक दान उसका परफोर्मेंस तय कर सकता है?
दिलचस्प यह है कि अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व में रिपब्लिकन पार्टी की सरकार होने के बावजूद रिपब्लिकन झुकाव वाले फंड अच्छा प्रदर्शन नहीं कर रहे। लेकिन राजनीति के आधार पर निवेश करने की गलती केवल एक पक्ष तक सीमित नहीं है। पर्यावरण, सामाजिक उत्तरदायित्व और कॉर्पोरेट गवर्नेंस (ESG) आधारित निवेश भी इसी प्रकार का भ्रामक जाल साबित हुआ है। एक समय ESG निवेश बहुत लोकप्रिय था और इसने ट्रिलियन डॉलर से अधिक की संपत्ति जुटाई। लेकिन हाल के वर्षों में इसके परिणाम सामान्य से भी कमजोर रहे हैं। BlackRock का iShares ESG Aware MSCI USA ETF 2016 से एस एंड पी 500 की तुलना में सालाना औसतन 0.3 प्रतिशत कम रिटर्न दे रहा है। Vanguard ESG U.S. Stock ETF 2018 से सालाना 0.1 प्रतिशत कम प्रदर्शन कर रहा है। यानी इन समावेशी अच्छी कंपनियों में निवेश करके न तो बेहतर लाभ मिला और न ही समाज को कोई ठोस फायदा हुआ।
दिलचस्प यह है कि जब कोई व्यक्ति बुरी कंपनियों को छोड़कर अच्छी कंपनियों में निवेश करता है, तो इससे बाज़ार पर कोई वास्तविक प्रभाव नहीं पड़ता। कंपनियां पहले ही सार्वजनिक रूप से शेयर जारी कर चुकी होती हैं, इसलिए किसी के द्वारा खरीदे या बेचे गए शेयरों से उनकी पूंजी में कोई बड़ा बदलाव नहीं आता। कोई कंपनी किसी व्यक्ति के अनुसार अच्छी या बुरी भी इस आधार पर ही तय होती है कि उसकी विचारधारा क्या है।
भारत में भी राजनीति और इंवेस्टमेंट के घातक मेल के कई उदाहरण देखने को मिलते हैं। 2014 में नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद इंफ्रास्ट्रक्चर और रक्षा क्षेत्र की कंपनियों के शेयरों में जबरदस्त उछाल आया था, क्योंकि निवेशकों को उम्मीद थी कि सरकार बड़े पैमाने पर इन क्षेत्रों में निवेश करेगी। इंफ्रास्ट्रक्चर लीजिंग एंड फाइनेंशियल सर्विसेज (IL&FS) जैसी कंपनियों के शेयरों ने शुरुआती बढ़त दर्ज की, लेकिन 2018 में इस कंपनी पर जब कर्ज संकट गहराया, तो निवेशकों को भारी नुकसान हुआ। इसी तरह, 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले कई निवेशकों ने सरकारी बैंकों और NBFC (गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों) पर दांव लगाया था, क्योंकि सरकार की ‘सबका साथ सबका विकास’ नीति से इन कंपनियों को फायदा होने की उम्मीद थी। लेकिन बाद में IL&FS संकट और कोरोना महामारी ने इन सेक्टरों को बुरी तरह प्रभावित किया, जिससे इन शेयरों में निवेश करने वालों को भारी नुकसान उठाना पड़ा।
इसके अलावा, हाल ही में अदानी समूह के शेयरों में भी राजनीति से प्रेरित निवेश की प्रवृत्ति देखी गई। 2022 में जब हिंडनबर्ग रिपोर्ट ने अदानी समूह पर वित्तीय अनियमितताओं के आरोप लगाए, तो समूह की कंपनियों के शेयरों में भारी गिरावट आई। लेकिन कई निवेशकों ने इसे राष्ट्रवाद से जोड़ते हुए अदानी समूह के शेयरों को खरीदना जारी रखा, यह मानते हुए कि सरकार इस समूह को बचाएगी। हालाँकि, शेयर बाजार केवल राजनीतिक समीकरणों से नहीं चलता—वैश्विक मंदी, ब्याज दरों में वृद्धि और निवेशकों की धारणा जैसे कारक भी अहम भूमिका निभाते हैं। नतीजा यह हुआ कि भावनात्मक और राजनीतिक रूप से प्रेरित निवेशकों को भारी उतार-चढ़ाव का सामना करना पड़ा। ये उदाहरण दर्शाते हैं कि यदि कोई निवेशक राजनीतिक विचारधारा के आधार पर निवेश करेगा, तो वह अल्पकालिक उतार-चढ़ाव के जाल में फँस सकता है और दीर्घकालिक रूप से अपने निवेश पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकता है।
राजनीतिक ध्रुवीकरण के इस दौर में भावनात्मक रूप से निष्पक्ष रहना कठिन हो सकता है। राजनीति अब केवल विचारधारा नहीं बल्कि पहचान का विषय बन चुकी है—जो हमारे साथ सहमत हैं वे सही और अच्छे हैं, और जो असहमत हैं वे गलत और बुरे। राजनीति इतनी ध्रुवीकृत हो गई है कि लोगों को अपनी राय तथ्य लगने लगती है और जो तथ्य उनके विचारों के खिलाफ जाते हैं, वे उन्हें केवल राय लगते हैं। लेकिन शेयर बाज़ार को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप किसे वोट देते हैं। सफल निवेशक वही हैं जो राजनीति से प्रभावित हुए बिना अनुशासन बनाए रखते हैं। यदि आप अपने निवेश में राजनीति को घुसने देंगे, तो आप बस अपने गर्व या गुस्से को व्यक्त कर पाएंगे—लेकिन इसका लाभ मिलने की संभावना बेहद कम होगी।


