श्रम विभाग के खिलाफ खबरें क्यों नहीं?

डेंगू रोकने में स्वास्थ्य विभाग असमर्थ… नहीं बन रहे जाति प्रमाणपत्र… लोक अदालत में मामले निस्तारित… आजादी तो मिली स्कूलों पर छत नहीं डली जैसे समाचारों से अखबारों के दर पन्ने रंगे रहते हैं । अखबारों में छपने वाली खबरों में 90-95 % पुलिस, शिक्षा, स्वास्थ्य विभाग या नगर निगम, जल निगम या परिवहन निगम से संबंधित होती हैं। खेल और कारोबार संबंधी खबरों की भी भरमार होती है। यही नहीं बडे क्या मझोले अखबारों में भी बकायदे इसके संवाददाता होते हैं। इधर कुछ वर्षो से न्याय पालिका से संबंधित समाचार भी पढने को मिल जाते हैं। अगर किसी समूह/ वर्ग की खबरें नहीं होती तो वह है श्रमिकों से जुड़े श्रम विभाग की। जबकि हर प्रदेश का अपना श्रम विभाग होता है।

बताते चलें कि काम के सरलीकरण के लिए ठीक-ठाक समाचार पत्र अपने संवाददाताओं की बीट तय करता है। अमूमन हर अखबार शिक्षा,स्वास्थ्य विभाग,वन विभाग, वन निगम, परिवहन विभाग, निर्माण निगम, सेतु निगम, परिवहन निगम, जल निगम, नगर निगम, रेलवे की खबरों को कवर करने के लिए अपने संवाददाता नियुक्त करता है। यही नहीं राजनीतिक दलों की खबरों के लिए विशेष रूप से कार्यों का बंटवारा होता है। सत्तारूढ़ व प्रमुख विपक्षी पार्टी के लिए तो मारामारी रहती है। बडे अखबारों में तो खेल व विधि संवाददाता अलग से होता है। कुछ समाचार पत्र हाईकोर्ट की खबरों के लिए वकीलों (जूनियर) की सेवाएं लेते हैं।

अब सवाल यह उठता है कि अखबारों में श्रम विभाग (श्रमिकों नहीं) के खबरें सकारात्मक ही सही क्यों नहीं होती। अन्य विभागों की तरह श्रम विभाग बीट क्यों नहीं होता। अगर होती भी है तो खानापूरी के लिए। हर प्रदेश में श्रमिकों की अच्छी-खासी संख्या है और समस्याएं भी। श्रम विभाग में आयेदिन श्रमिकों का हुजूम उमडा रहता है कभी जाँब कार्ड बनवाने के लिए तो कभी औद्योगिक विवाद अधिनियम के तहत अपना मामला निपटवाने के लिए। अक्सर किसी न किसी विभाग या फैक्टरी के कर्मचारियों की तारीख ही लगी रहती है लेकिन अखबार में संक्षिप्त समाचार के तहत भी इन्हें जगह नहीं मिलती क्यो? उपभोक्ता फोरम के फैसले/खबरें रहतींं हैं लेकिन श्रम विभाग की नहीं क्यों? साल-छह महीने का अखबार पलट डालिए श्रम विभाग पर एक लाइन भी नहीं मिलेगी। ऐसा नहीं कि खबरों के लिहाज से यह विभाग सूखा हो तब भी खबरें नहीं क्यों ? समाचार पत्र श्रम विभाग पर इतने मेहरबान क्यों?

किसी ने कहा है जब एक हाथ भारी पत्थर के नीचे दबा हो तो दूसरे हाथ का इस्तेमाल सावधानी और समझदारी से करना चाहिए।शायद समाचार पत्र भी इसी फार्मूले पर चल रहे हों। गौरतलब है कि अखबारों में काम करने वाले पत्रकार/गैर पत्रकार श्रमजीवी पत्रकार अधिनियम 1955 से आच्छादित होते हैं और इनके साथ श्रमजीवी शब्द चिपक जाने के कारण ये अपने -अपने प्रदेशों के श्रम विभाग से गवर्न होते हैं। श्रम कानून से जुडे सभी प्रावधान / सुविधाएं इन्हें मिल रहीं हैं यह नहीं यह देखना और दिलवाना श्रम विभाग की ही जिम्मेदारी हैं। यह अपनी जिम्मेदारी को कितनी ईमानदारी से निभा रहा है इसपर चर्चा फिर कभी। अब चूंकि अखबारों की नकेल श्रम विभाग के पास होती है इसलिए अखबार के मालिक भी इनसे “पंगा” नहीं लेते।

फिर यह कहावत भी तो है न कि, ” डायन भी एक घर छोड देती है। अब जब अखबार श्रम विभाग को बख्श दे रहा है तो श्रम विभाग भी तो कुछ करेगा। किसी भी प्रदेश का श्रम विभाग किसी भी समाचार पत्र पर हाथ नहीं डालता। मसलन अखबारकर्मी को न्यूनतम मजदूरी मिल रही है या नहीं। अखबार में काम के घंटे कितने हैं । पद के हिसाब से काम लिया जा रहा है या नहीं। अखबार श्रम कानूनों का पालन कर रहे हैं या नहीं। यदि अखबार में काम करने वाला कोई कर्मचारी अपने प्रबंधन की ज्यादतियों की शिकायत करता है तो श्रम विभाग ढाल बनकर मालिकों के पक्ष में खडा हो जाता है। कोई भी समाचार पत्र के विषय में जानकारी इनसे मांग ले और ये विभाग दे दे या कर्मचारी की सहायता कर दे तो जाने। सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 के तहत ही इनसे जानकारी मांग लीजिए ये ” नाको चने चबवा देंगे” जानकारी देने में। अगर सूचना मांगने वाले ने भूल या अज्ञानतावश क्या शब्द लगा दिया तो प्रश्नवाचक कहकर उसे खारिज कर देंगे नहीं तो ” सूचना कार्यालय में धारित नहीं है कहकर आपको टरका देंगे। मजीठिया वेजबोर्ड इसका जीता जागता ताजा उदाहरण है।

अरुण श्रीवास्तव
पत्रकार एवं आरटीआई कार्यकर्ता
09458148194
देहरादून



 

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