‘कैनविज टाइम्स’ का शटर बहुत ही शातिराना अंदाज में धीरे-धीरे डाउन किया जा रहा है!

खुद को अव्वल दर्जे का बुद्धिमान और पत्रकारों को परले दर्जे का मूर्ख क्यों समझते हैं गुलाटी साहेब

पहले लखनऊ और फिर बरेली में पत्रकारिता की पताका बुलंद करने वाले ‘कैनविज टाइम्स’ का शटर बहुत ही शातिराना अंदाज में धीरे-धीरे डाउन किया जा रहा है। इस पुनीत कार्य को स्वयं कैनविज ग्रुप के चेयरमैन कन्हैया गुलाटी (स्वघोषित हरिश्चंद) अंजाम दे रहे हैं। जाहिर है गुलाटी साहेब सूदखोर रहे हैं, तो घाटे का कोई सौदा क्यों करेंगे? …और करना भी नहीं चाहिए। खैर छोड़िए घाटे और मुनाफे की बात… सूदखोर और धंधेबाज करें तो ही अच्छा है, पत्रकारों का काम तो दबे कुचलों की आवाज उठाना है। पत्रकारों की जमात दूसरों को न्याय दिलाने के लिए भ्रष्ट से भ्रष्ट तंत्र की चूले हिलाती आई है पर बात जब अपने लिए न्याय मांगने या करने की आती है तो यह जमात महज संसार के सबसे निर्बल जीवों का जत्था बनकर रह जाती है। पत्रकारों को बहुत कोस लिया अब वक्त है पत्रकारिता में घुसपैठ कर चुके कथित कॉरपोरेट्ïस को आईना दिखाने का…

वर्ष 2007 में कैनविज सेल्स एंड मार्केटिंग प्राइवेट लिमिटेड के साथ कैनविज का उदय हुआ बाद में कंपनी का नाम कैनविज इंफ्रा कॉरपोरेशन इंडिया लिमिटेड कर दिया गया। मल्टी लेवल मार्केटिंग का कारोबार करने वाली इस कंपनी को धीरे-धीरे ‘अखंड मूर्ख’ मिलते गए और कैनविज दिन दूना रात चौगुना तरक्की करने लगा। तरक्की की इस राह में पहले कुछ रोड़े जेके सक्सेना (पूर्व फाउंडर मेंबर) ने अटकाए तो कुछ पुलिस प्रशासन ने। यही वो दौर था जब कैनविज के प्रबंधन की बागडोर संभालने वाले शातिर चेयरमैन कन्हैया गुलाटी और सीईओ आशुतोष श्रीवास्तव ने अखबार की व्यूह रचना की और अखबार के माध्यम से पुलिस प्रशासन के साथ-साथ सत्ता से जुड़े लोगों से गलबहिया करने लगे।

कैनविज प्रबंधन को अखबार की आड़ से कमाई का रास्ता आसान होता दिखा तो अखबार को डेली कर दिया गया। इधर पत्रकारों की हाड़तोड़ मेहनत के बल पर कैनविज टाइम्स ने लखनऊ में अपनी एक अलग पहचान बना ली। उधर कैनविज का मल्टी लेवल मार्केटिंग बिजनेस भी सफलता के नए कीर्तिमान स्थापित कर रहा था। देखते ही देखते कैनविज ने पैकेज्ड वॉटर, रियल इस्टेट, होटल एंड रिसार्ट के क्षेत्र में कदम रखा और बहुत ही कम समय में अपना अभूतपूर्व विस्तार किया। कहानी में ट्विस्ट केंद्र में सत्ता परिवर्तन के बाद आना शुरू हुआ। इधर मोदी ने कमान संभाली, उधर जेटली ने चिटफंड कंपनियों पर लगाम लगाने के लिए गणित भिड़ाना शुरू किया। यही नहीं कैनविज प्रबंधन की मुसीबतें कई और तरफ से भी बढऩा शुरू हुईं। मौका ताड़ते ही गुलाटी साहेब ने 2016 में मल्टी लेवल मार्केटिंग कंपनी कैनविज इंफ्रा कॉरपोरेशन को डायरेक्ट सेलिंग कंपनी कैनविज इंडस्ट्रीज लिमिटेड में कंवर्ट कर लिया।

अब परिस्थिति बिल्कुल बदल चुकी थी। पहले जो मुनाफा बोरों में होता था अब उससे थैलियों तक भरने को मोहताज हैं। ऐसी सूरत में गुलाटी साहेब ने सबसे पहले खर्चे कम करने की चाल चली और मोहरा बनाया उन्हीं पत्रकारों को जिनके दम पर अरबों रुपये का साम्रज्य खड़ा किया। सोची समझी रणनीति के तहत न्यूज रूम के हालात इतने बदतर कर दिए गए कि पत्रकार पलायन को मजबूर होने लगे। पत्रकारों की तनख्वाह तीन-तीन महीने लेट लतीफ होने लगी और तौ और पूरे संस्थान में उन्हें कोई सांत्वना देने वाला भी नहीं मिला। हालात इतने बदतर हो चले कि कभी 50 से अधिक स्टाफ से संचालित होने वाले अखबार में अब महज गिनती के लोग बचे हैं, जबकि इसके विपरीत गुलाटी साहेब ने छंटनी के नाम पर मजदूरों को दिए जाने वाले तीन-तीन महीने के वेतन के रूप में लाखों रुपये बचाए हैं। बचत की बात तो ठीक है पर गुलाटी साहेब ने पत्रकारों को सीढ़ी बनाकर कामयाबी का जो सफर तय किया है और उसके इनाम के स्वरूप पत्रकारों को दुर्दशा के जिस दलदल में छोड़ दिया वह कदापि उचित नहीं है। क्रिया गुलाटी साहेब आपकी तरफ से हो चुकी है अब प्रतिक्रिया का इंतजार करिए…पत्रकारों को मूर्ख मत समझिए।  आपने सिर्फ अभी तक उनको इस्तेमाल ही किया है। मजीठिया तो गया तेल लेने पत्रकारों की तनख्वाह से पीएफ काटने के बावजूद जनवरी से अभी तक आपने जमा नहीं किया है।

एक मीडियाकर्मी द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.



 

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