ये टीओआई तो अपनी नंगई बंद नहीं करेगा, कम से कम हम तो इसे खरीदना बंद कर सकते हैं

dipika

टाइम्‍स ऑफ इंडिया की निर्लज्‍जता जारी है !! अखबार केवल खबरों का छपा हुआ पुलिंदा नहीं होता बल्कि वह अपने आप में एक मांइडसैट है, एक पूरी संस्‍कृति का प्रतिनिधि है. दीपिका पादुकोण के क्‍लीवेज शो वाले मामले में टाइम्‍स ऑफ इंडिया ने अपनी गलती को स्‍वीकार करने के बजाए आज बेशर्मी की सभी हदों को लांघते हुए अपनी सफाई देने की आड़ में एक बार फिर दीपिका पादुकोण का अपमान किया है. टाइम्‍स के ही शब्‍द हैं “We believe there’s no shame in Deepika showing off her body, but does she now want us to first check with her as to which pictures of her — taken at public events — we can or cannot publish?” (हम समझते हैं कि दीपिका के अंग प्रदर्शन करने में कोई शर्म की बात नहीं है, लेकिन क्या वो चाहती है कि हम पहले उनसे पूछ लें कि कार्यक्रमों में खींचीं गयी उसकी कौन सी तस्वीरें हम छाप सकते हैं और कौन सी नहीं)

टाइम्‍स यहीं नहीं रूकता. वह दीपिका को अहसास दिलाता है कि देखिए यह हमारी भलमनसाहत है कि हम इससे आगे नहीं बढ़ते. “Deepika, just for the record, we do not zoom into a woman’s vagina or show her nipples.” (दीपिका, आपको बता दें, हम स्त्री योनी पर कैमरा फोकस नहीं करते और न ही उसके वक्षस्थल को दिखाते हैं)

दरअसल टाइम्‍स ऑफ इंडिया को यह बर्दाश्‍त नहीं हो पा रहा कि कैसे अचानक एक अभिनेत्री ने अपने सम्‍मान के लिए इसे लताड़ लगा दी. क्‍योंकि इस अखबार के लिए अभिनेत्रियों के क्‍लीवेज को सैंसेशन के साथ परोसना इसका अधिकार था. हम और आप शायद इसकी करतूतों को एक स्‍टैंडर्ड का अखबार समझ कर नज़रअंदाज कर जाते हैं.

यही टुच्‍ची मानसिकता इस अखबार को दिल्‍ली टाइम्‍स के पन्‍नों पर डीयू के कॉलेजों में हो रहे टैलेंट शो/फ्रैशर्स पार्टी में न्‍यूकमर ल‍ड़कियों को बेहयाई के साथ “हॉटैस्‍ट गर्ल ऑफ कैंपस” घोषित करने की हिम्‍मत देती है. अखबार तो शायद अपनी नंगई बंद नहीं करेगा…..कम से कम हम तो इसे खरीदना बंद कर सकते हैं!!

युवा लेखक सौरभ आर्य के फेसबुक वॉल से साभार।



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Comments on “ये टीओआई तो अपनी नंगई बंद नहीं करेगा, कम से कम हम तो इसे खरीदना बंद कर सकते हैं

  • Salah achhi hai lekin chutiyape se jayada kucch nahi. Abe ullu tere kahne se kitne log band karenge tu khud janta hai. Salle ……tv par ankhe fad fad ke dekhenge…paper me chhapa to badhajami ho rahi hai…vo dikha rahi hai, public ne bhi dekh liya to kya dikkat…Public figure agar public me figure dikhaye to akhbar vale use kyon na chhapen…?

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  • madan kumar tiwary says:

    मंगरु चाहे cleavage देखे।

    भैया जी हमहू देखब,

    का देखब रे,चुप,इ सब बडकन के देखे के चीज हे।

    न भईया जी हमहू देखब सुनली हे बड़ा दंगा फसाद हो गईले हे। कौनो खबरिया वाला फोटुक सोटूक छाप देलके अउ उ कलिवेजवा वाला मैडमा खिसिया गईले।

    केकरो फोटुक छाप देभी त न खिसिअइते,औरत के इज्जत न हइ, उ काउनो समान हइ।

    खीचइलके हल काहे ला,देखाही ला न बाबू ।

    हा बेटा तोरा खाली किलिवेजवे लउकले

    ,त जे मन होते उहे न देखबे बाबू। हम कउनो पागल ही की चिकन टंगवा न देख के उ बैगवा देख बे। बाबू जे हमरा निक लगले हम देखली, उनका से पूछ के देखती हल ? उहो त किलिवेजवे देखा रहलतून हल।

    औरत के इज्जत करे चाहि बेटा मंगरू। ओकरो इज्जत है, ओकरा समान नै समझे चाही बेटा।

    बाबू के बात ? उ जे हमनि के फसा के सबुनवा बेच दे हे से? हमहू ले ले ही, मैडम़ा के गोर गोर टंगवे देख के न बाबू। केता लुटलके बाबू । पचासो साबुन लगे के बादो हमर झमनिया के टंगवा करिए हइ। बाबू तू न जाना ह , इ फिरू कुछ बेचे के चक्कर में हइ ,बाकी एकर किलिवेजवा एकबार देखा देहु न बाबू।

    चुप। चल जइब जेल बेटा। औरतियन के एगो कोरट हइ भेज देते अन्दर।

    हिहिहिहिही। मुरुख समझल हे , चुपे से देखबे केकरो पता थोड़ेही चलत। ( कंचुकी नाही सुखत सुन सजनी उर बीच बहत पनाले

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