सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद मनमानी पर उतर आए नियोक्ता, सुनिए मयंक की कहानी

सेवा में,

श्रीमान मुख्य न्यायाधीश,

भारत

महोदय,

आपके verdict on plea challenging MHAs order to pay full salary to staff during lockdown, पर जितना समाचार में पढ़ा और सुना वो कहीं अपूर्ण लगा।

मैं देश के नागरिक के तौर पर कुछ कहना चाहूंगा।

ये निर्णय practically उन पर तो समझ आता है जो organisation या industries दैनिक या मासिक कमाती हैं। जब production या sale ही नहीं हुई, आमदनी ही नहीं हुई तो ऐसे में वो अपने कर्मचारी को चाहें जितना दे दें उस पर टिप्पणी नहीं की जा सकती। पर उनका क्या जो सालाना या छमाही सत्र पर काम करती हैं? उनका क्या जिन्होंने कह कर वर्क फ्रॉम होम करवाया? जिन्होंने अपना पूरा काम करवा कर सैलरी देने के वक़्त हाथ झटक दिए?

मैं एक महाविद्यालय में अध्यापक हूँ। महाविद्यालय में फ़ीस सत्र के शुरुआत में ही वसूल ली जाती है। हमें बोला गया कि आप घर से बच्चों को पढ़ाओ। वीडियो बनाओ और उसे बच्चो के साथ सांझा करो, डिजिटल क्लासेज लो बच्चों की, कॉलेज ने अपने कुछ लिपिकीय कार्य करने को घर से दे दिया। बच्चों का पाठ्यक्रम घर से अधिकाँश पूर्ण करवा दिया। लेकिन अप्रैल और मई की तनख्वाह नहीं आई। शायद आपके निर्णय का इंतज़ार किया जा रहा होगा। अभी थोड़ी देर पहले तनख्वाह आई 6125 जो की मासिकी 12500 की आधी भी नहीं और अभी ये भी नहीं पता कि ये अप्रैल के नाम पर भेजी गई है या अप्रैल और मई दोनों की।

मेरे पिताजी एक फ़ूड इंडस्ट्रीज में लगभग 20-25 सालों से काम कर रहे थे। lockdown में उनकी आर्गेनाइजेशन ने उन्हें 58 वर्ष की आयु से दो महीने पहले ही निकाल कर बाहर कर दिया।

मेरी मासिकी पर निर्भरता थी लेकिन वो भी कितनी आई? आपके verdict से जो गलत नियोक्ताओं को जो सहारा मिला है गलत करने का वो अधिकाँश के हित में नहीं है। यद्यपि मैंने आपका पूरा निर्णय नहीं पढ़ा है जिस लिए आपके निर्णय पर कोई प्रश्न लगाने का मुझे अधिकार नहीं है पर देश में न्याय के लिए प्रत्येक नागरिक उच्चतम न्यायालय की ओर देखता है। कितनी उम्मीदें होती हैं आपसे।

और फिर महोदय यदि श्रमिक या कोई कर्मचारी के पास साक्ष्य है और वो जाना चाहता है श्रम न्यायालय तो उसमें हर्ज़ ही क्या? क्यों गलत नियोक्ताओं पर दण्डात्मक कार्यवाही नहीं होनी चाहिए?

मैंने वर्ष 2017 में AKTU, Lucknow से लाखों रुपये बर्बाद करके MCA किया। वर्तमान तक न जाने कितनी कंपनियों ने धोखा किया। अपने क्षेत्र में आज तक बेरोज़गार हूँ। राष्ट्रपति तक से पिछले वर्ष जुलाई में इच्छा मृत्यु तक की माँग कर ली। जिस पर इस मई एक पत्र उत्तर प्रदेश शासन से DM Agra के पास आया लेकिन प्रशासन शांत होकर बैठ गया।

Skill Development and Entrepreneurship Ministry (DOSKD/E/2019/00584 – 30/07/2019) तक से दरखास्त की लेकिन वर्तमान तक वो coma में हैं।

एक काम ही बचा था AICTE प्रमाणित वो MCA की डिग्री एक रिक्शा पर लटकाऊँ और उसे ही देश में घुमाऊं शायद सरकार को शर्म आ जाए कि शिक्षा व्यवस्था कितनी गिरी हुई है कि एक विद्यार्थी जो first div with honours में MCA उत्तीर्ण कर रहा है उसे देश में एक नौकरी तक नहीं। और प्रक्टिकली मैं कैसा हूँ ये आप मेरे महाविद्यालय से पूछ लीजिये या मेरे स्वयं से बनाये AI based Softwares देख लीजिये।

अपने क्षेत्र से अलग एक नौकरी मिली भी जहाँ ईमानदारी से lockdown तक में बच्चों को पढ़ाया लेकिन सुप्रीम कोर्ट के जजमेंट के बाद सैलरी आई वो देख कर न हंसते बन रहा न रोते। अब आप स्वयं ही बताइये ऐसे महाविद्यालय जहाँ प्रतिमाह बच्चे फीस नहीं देते बल्कि सत्र के प्रारम्भ में ही दे देते हैं उन पर lockdown में ऐसे कौन से दुखों के पहाड़ टूट पड़े जो आपने उन पर दंडात्मक कार्यवाही करने तक पर रोक लगा दी।

मैं आपका निर्णय पूरा पढूंगा हो सकता है मैं गलत हूँ, उसमें आपने कुछ ऐसा रखा हो जिस पर कर्मचारी के साथ कोई अन्याय न हो सके। फिर भी आपसे अपना किस्सा साझा किया जो आपके निर्णय के बाद मेरे साथ घटित हुआ। अगर कुछ आपको बुरा लगता है तो उसके लिए क्षमा प्रार्थी हूँ।

धन्यवाद

भवदीय

मयंक सक्सेना

22/82, विजय नगर कॉलोनी, आगरा

उत्तर प्रदेश

mayankmca2017@gmail.com



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Comments on “सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद मनमानी पर उतर आए नियोक्ता, सुनिए मयंक की कहानी

  • Namrata Sharma says:

    Shameful Incident. Look the image, how cheap this Lokesh is. Saying what you are expecting. The employee asking for his/her salary and what he is replying? Cheap Mentality. and later, are you out of mind. i think this lokesh is mentally abnormal. I think he will be dumb may be. Does this judgement allows employers to insult their employees?

    Reply

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