वरिष्ठ पत्रकार चंद्र भूषण की नई किताब- ‘तुम्हारा नाम क्या है तिब्बत’

चंद्र भूषण-

चार जीवों की संगति… हाथी के ऊपर बंदर और बंदर के ऊपर खरगोश। ऐसी पेंटिंग मुझे तिब्बत में कई जगह दिखी थी। इसे सारनाथ स्थित तिब्बती विश्वविद्यालय में भी देखकर मैंने वहां इतिहास के एक आचार्य से पूछा कि तीन जानवरों का यह साहचर्य क्या किसी कथा का इलस्ट्रेशन है? उन्होंने कहा, आप गौर से देखेंगे तो चित्र में तीन नहीं, चार जानवर नजर आएंगे। खरगोश के ऊपर एक छोटी सी चिड़िया भी है और ये चारों जीव एक विशाल पेड़ के नीचे हैं। मैंने पूछा, इस चित्र की कहानी क्या है?

उन्होंने कहा- कहानी नहीं, संदेश है कि किसी की महत्ता उसके आकार-प्रकार से नहीं, उसकी दूरदृष्टि से आंकी जानी चाहिए। साथ ही यह भी कि समाज में सबकी अपनी-अपनी जगह है, सभी आपस में मिल-जुलकर रह सकते हैं। मुझे यह बात कुछ समझ में नहीं आई। बुद्ध का धर्म इतने अमूर्त संदेशों से नहीं बना है। बाद में यह चित्र मैंने और जगहों पर देखा और भारत में रह रहे तिब्बती बच्चों की तीसरी क्लास की भाषा पुस्तक में तो इस तरह का एक पाठ ही था- ‘चार जीवों की संगति’ (फोर एनिमल्स इन हार्मनी)। यह जानकारी भी मिली कि हाथी, बंदर और खरगोश हर जगह मिलने वाले चित्र में एक से हैं लेकिन चिड़िया की नस्ल अलग-अलग है।

तिब्बती चित्रों में यह ठीक से न पहचान में आने वाली कोई छोटी चिड़िया है लेकिन बाकी जगहों पर कहीं यह तीतर है, कहीं बटेर। नॉर्थ-ईस्ट के इलाकों में यह धनेस है और सिक्किम-भूटान में धनेस से कम मोटी चोंच वाली लेकिन वैसी ही लंबी पूंछ वाली और आकार में तिब्बती चिड़िया से जरा बड़ी कोई और चिड़िया। तिब्बत में तेरहवें दलाई लामा द्वारा जारी तिब्बती स्वतंत्रता की प्रतीक मुद्रा पर भी यही चित्र विराजमान है। भूटान जाने का मौका मुझे अभी तक नहीं मिला है, लेकिन यह जानकारी जरूर हासिल हो गई है कि वहां यह राजचिह्न की तरह हर जगह दिखता है।

खोजबीन से पता चला कि यह कथा सुत्तपिटक और जातक, दोनों ही जगह मौजूद है। सुत्त के रूप में गौतम बुद्ध ने इसे एक कथा की तरह सुनाया है जबकि ‘तित्तिर जातक’ नाम की जातक कथा के अंत में ऐसी हर कथा की तरह यह बुद्ध वाक्य आता है कि ‘वह चिड़िया मैं था।’ तित्तिर जातक नाम से जाहिर है कि मूल कथा में चिड़िया तीतर ही रही होगी, जिसकी पहचान उड़ने से नहीं दौड़ने से जुड़ी है।

लेकिन व्याख्याकार चारों जीवों की जगह तय करने में लंबा वितान तानते हैं- चिड़िया आकाश में, बंदर पेड़ पर, हाथी जमीन पर और खरगोश जमीन के नीचे। कुल मिलाकर चार जीवों में पूरी सृष्टि! बहरहाल, कथा की जमीन यह है कि गौतम बुद्ध एक बार अपना दायां हाथ कहलाने वाले सारिपुत्त को नए भिक्षुओं द्वारा पर्याप्त सम्मान न दिए जाने को लेकर कुछ क्षुब्ध हो गए और उन्हें यह किस्सा सुनाया।

चार मित्रों हाथी, बंदर, खरगोश और चिड़िया में यह बताने की होड़ लग गई कि उनमें किसने ज्यादा दुनिया देख रखी है। हाथी ने कहा कि जब वह जवान हुआ तब इस विशाल पेड़ की ऊंचाई उससे थोड़ी ही ज्यादा हुआ करती थी। बंदर ने कहा कि इस पेड़ को उसने उस हाल में देखा है जब इसकी शाखाएं उछलने लायक भी नहीं थीं। खरगोश ने बताया कि उसने तो इसको छोटे पौधे की दशा में देख रखा है। फिर अंत में पंछी बोला कि यह पेड़ उसी की बीट से जन्मा है।

कहानी का उद्देश्य भिक्षुओं को यह बताना था कि सारिपुत्त जैसे कम बोलने वाले चिंतकों को ध्यान से सुनें, बड़ी बात तक पहुंचने के लिए भारी-भरकम दिखने वाले बड़बोले लोगों के आगे-पीछे न डोलते रहें।

बहरहाल, पता नहीं कैसे इस कहानी के कई रूप चर्चा में आते गए और इससे अलग-अलग संदेश ग्रहण किए जाने लगे। तिब्बती दायरों में इसे चार जीवों की लयदार संगत के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। चिड़िया ने बीज रोपा, बंदर ने खाद डाली, खरगोश ने पानी दिया और पौधा खड़ा हो गया तो हाथी ने उसकी रक्षा करके विशाल पेड़ में बदल दिया।

कहानी किन-किन रूपों में मौजूद है, कहां-कहां किस-किस तरह इसे ग्रहण किया गया, यह स्वयं में बौद्ध धर्म के सभ्यतागत वैविध्य का एक उदाहरण है। लेकिन तिब्बत, चीन, मंगोलिया, जापान, थाईलैंड, श्रीलंका और अन्य बौद्ध देशों में भी मठों से लेकर महलों तक जगह-जगह चटख-चमकीले रंगों में बना हुआ यह चित्र आपको देखने को जरूर मिल जाएगा- एक छतनार पेड़ के नीचे खड़ा हाथी, उसपर बैठा बंदर, उसके कंधों पर खरगोश और उसके भी सिर पर वहां की कोई सुंदर, सौम्य स्थानीय चिड़िया। धर्म को सभ्यता से जोड़ता एक पुराना प्रतीक।



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