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सुख-दुख

डिनर के दौरान वैदिक जी बोले- ‘इतना कड़ा आप ही लिख सकते हैं!’

असरार ख़ान-

वेद प्रताप वैदिक जी अब हमारे बीच नहीं हैं लेकिन वे एक ऐसी शख्सियत थे जिसके अंदर तरह तरह के जनपक्षीय गुण कूट कूट कर भरे थे इसलिए लंबे समय तक याद किए जाते रहेंगे उनकी पत्रकारिता पर शोध भी होते रहेंगे ….

1984 की शुरुआत में एक दिन मैंने फैज अहमद फैज साहब के कश्मीर पर एक ऐसे बयान को पढा जिससे मुझे करारा धक्का लगा …उनका बयान था ” कश्मीर को पाकिस्तान में मिलाए बगैर पाकिस्तान की कल्पना नहीं की जा सकती …” और इसी तरह हिंदी की उपेक्षा को लेकर एक खबर आई थी …

मैंने दोनों ही मुद्दों पर बड़ा बड़ा पत्र लिखा और उसे नवभारत टाइम्स में छपने के लिए बहादुर शाह जफर मार्ग टाइम्स ऑफ इंडिया भवन पहुंच गया …

जब अंदर गया तो पूछा कि नवभारत टाइम्स के संपादक से मिलना चाहता हूं मुश्किल से मुझे वैदिक जी के चैंबर तक पहुंचाया गया तब वे सहायक या स्थानीय संपादक थे …ठीक से याद नहीं

उन्होंने मेरा परिचय और प्रोफेशन पूछा वे थोड़ा मुस्कुराए बोले आप ने अच्छी प्रतिक्रिया व्यक्त की है ….

तीन दिन बाद पत्रों के कॉलम में मेरे दोनों पत्र एकसाथ प्रकाशित हुए ..जिसकी हेडिंग थी …आखिरी वक्त में क्या खाक मुसलमां होंगे और दूसरी हेडिंग थी मैकाले के मानस पुत्र …

उस दिन तक मैं उनके बारे में कुछ नहीं जानता था मुझे यह भी पता नहीं था कि वे JNU के छात्र थे और हिंदी के इतना बड़े पक्षधर खैर उन दिनों मैं सरकारी नौकरी छोड़कर एक NGO के साथ आदिवासियों के लिए काम कर रहा था ….

बाद में जब मैं खुद सही सही पत्रकार बन गया तब उनसे अच्छा परिचय हुआ .मैं उनके व्यवहार से बहुत प्रभावित हुआ बहुत धीरे से नपी तुली बात बोलते थे कुछ दिन उनके साथ PTI भाषा के लिए विदेश से जुड़ी खबरों को लिखता रहा ….

वैदिक जी पर समाजवादी खेमे के बड़े नेताओं का कुछ प्रभाव था और मुलायम सिंह यादव के प्रति भी वे काफी नरम थे …एक बार किसी लेख में मैंने मुलायम सिंह और चंद्रशेखर को भारतीय राजनीति का महाखलनायक लिख दिया और उसके अगले ही दिन इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में एक डिनर में मुलाकात हुई ….

मेरे उस लेख के लिए उन्होंने मुझे बधाई तो दी लेकिन कहा कि इतना कड़ा आप ही लिख सकते हैं ….उस दिन मुझे लगा कि हर पत्रकार किसी न किसी नेता से जरूर जुड़ा होता है जिसकी आलोचना वह नहीं कर पाता ….

विख्यात पत्रकार और चिंतक वैदिक जी महान प्रतिभा के धनी थे उन्होंने JNU जैसे अंग्रेजीदां कैम्पस में हिंदी की शान को बढ़ाते हुए अपनी PhD हिंदी में लिखा था ….उन्होंने हमें अपनी मातृभाषा के लिए लड़ना सिखाया ….जिसे हम कभी नहीं भूल सकते ….सादर नमन …

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