चर्चा में है ‘वनमाली कथा’ का नवलेखन विशेषांक!

धीरेंद्र अस्थाना-

धीरे-धीरे इस पत्रिका ने,जैसी कि उम्मीद भी थी,वह मुकाम छू लिया कि यहां कोई भी छपना चाहे। यह मुकाम पहले सिर्फ राजेंद्र यादव के समय वाले हंस को हासिल था।या फिर बाद में रवींद्र कालिया वाले नया ज्ञानोदय को।

वनमाली कथा के इस नवलेखन विशेषांक ने सिद्ध कर दिया है कि युवा लेखक कुणाल सिंह अपने अग्रज संपादकों की संपादन कला में परकाया प्रवेश करने में कामयाब हो चुके हैं।

जाहिर है यह प्रक्रिया तभी संभव हो पाती है जब संपादक को निर्णय लेने की संपूर्ण स्वाधीनता प्राप्त हो। वरिष्ठ लेखकों- संपादकों संतोष चौबे और मुकेश वर्मा ने यह स्वाधीनता उपलब्ध करवाई है इसीलिए कुणाल सिंह संपादन में अपना श्रेष्ठ दे पा रहे हैं।

मैंने इस विशेषांक में सबसे पहले पहली कहानी वाले सभी ग्यारह लेखकों को पढ़ डाला और जिनकी कहानी बहुत ज्यादा पसंद आयी उनको फोन भी किया। यह मेरी सहज आदत है। कहानी अच्छी है तो नये पुराने का भेद किए बिना मैं बधाई दे देता हूं।

मुंहफट हूं इसलिए बता देता हूं कि कुछ नये लेखकों ने नाम बताते ही मुझे पहचान लिया लेकिन कुछ भले लेखक ऐसे भी निकले जिन्होंने मुझे नहीं पढ़ा था और जो मेरे नाम से भी परिचित नहीं थे। लेकिन फोन पाकर खुश वो भी हुए। पहली कहानी पर तारीफ का फोन सुन कर कौन लेखक खुश नहीं होगा!

बहरहाल, बता दूं कि ग्यारह कहानियों में से नौ कहानियां आला दर्जे की हैं।दो कहानियां साधारण हैं। उनकी जगह किन्हीं दो अन्य नये लेखकों को लेना चाहिए था।एक अत्यंत छोटी होने और मामूली कथ्य के चलते प्रभाव पैदा नहीं कर पाती और दूसरी अनावश्यक रूप से लंबी होने तथा कथ्य के नाटकीय रूप ले लेने की वजह से अपना प्रभाव खो देती है।

जिस अद्भुत कथा लेखक ने अपनी कहानी में जादुई यथार्थवाद पैदा किया वह मेरी प्रशंसा से इस कारण चूक गया कि पत्रिका की एक अन्य लेखिका का फोन नंबर भी उसी का बता कर छप गया है।वह लेखक है मुदित श्रीवास्तव।इसी टक्कर की कहानियां शिल्पी झा,सौरभ सिंह, वियोगिनी ठाकुर,विकास वशिष्ठ, वैशाली थापा,मौलश्री सक्सेना, प्रिया वर्मा और आशीष शुक्ला की रहीं।शिल्प,कथ्य,कहन कहीं कोई असावधानी नहीं। पहली कहानी का टैग हटा दें तो कोई नहीं कहेगा कि यह पहली कहानी होगी।

इसका मतलब यह हुआ कि अच्छा लिखने वाले आ रहे हैं, आते जा रहे हैं। पुराने लेखकों को निराश होने की जरूरत नहीं है कि उनके बाद कथा साहित्य विपन्न हो जाएगा।

पहली कहानी वाले ज्यादातर लेखक थर्टी माइनस या थर्टी प्लस के हैं इसका मतलब इन्होंने कहानीकार के रूप में छपने को लेकर धैर्य बरता और जब संतुष्ट हो गये तो कहानी छपने भेजी।यह बड़ा बनने वाले लेखक का लक्षण है।

नोट कीजिए, इनमें से अधिकतर कथा साहित्य का झंडा बुलंद करने वाले हैं। पहली कहानी के टैग से मुक्त एक ही युवा लेखिका को अभी पढ़ा है– सबाहत आफरीन। और यकीन मानिए, हिंदी की गर्व करने वाली लेखिकाओं की कतार में अपना स्थान उन्होंने सुनिश्चित कर लिया है। सुना है कि उनके पहले कहानी संग्रह का विमोचन समारोह लखनऊ में दिग्गजों के बीच हुआ है।

अगली कड़ी में वे तेरह लेखक जो युवा कहानीकार हैं लेकिन पहली कहानी का तमगा पीछे छोड़ आए हैं।



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