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यह कोर्ट पर दबाव बनाने के लिए तो नहीं है?

जेल में मुख्यमंत्री को खाने की मनमानी और छूट कैसे है? इंसुलिन क्यों नहीं दिया जा रहा है और क्यों कोई जमानत के लिए अपना स्वास्थ्य खऱाब करेगा? जान की जोखिम डालेगा? इसकी भी छूट क्यों है? ईवीएम मामले में ज्यादातर अखबारों का शीर्षक एक जैसा क्यों है? ईवीएम के खिलाफ खबरें और टिप्पणियां क्यों गायब हैं या कम हैं? यह सब सामान्य नहीं है क्योंकि अब यही व्यवस्था है और मीडिया व्यवस्था का भाग है तो उसकी जरूरत किसे है?

संजय कुमार सिंह

दो गंभीर मामले सुप्रीम कोर्ट में हैं। जनहित में दोनों मामलों में फैसला सरकार के खिलाफ होना चाहिये और फैसला आने से पहले आज ऐसी खबरें छपी हैं जो यह शंका पैदा करती हैं कि मकसद (सुप्रीम) कोर्ट पर दबाव बनाना है और ये खबरें न्याय के मार्ग में रोड़ा है। इसका कारण राजनीतिक हो सकता है और मामले तो राजनीतिक हैं हीं। पहली खबर ईडी का यह आरोप है कि केजरीवाल जेल में मिठाइयां, आम खा रहे हैं ताकि उनका शुगर बढ़ जाये और जमानत मिलने में आसानी हो। आम आदमी पार्टी ने कहा है कि उन्हें इंसुलिन नहीं दी जा रही है इसलिए शुगर लेवल बढ़ गया है। यहां मामला यह है कि एक निर्वाचित मुख्यमंत्री को अकारण या कम से कम जबरदस्ती जेल में रखा गया है। आजादी के बाद से यह देश का अपनी तरह का पहला मामला है। बेशक जो भी होगा वह नजीर बनेगी और नजीर ठीक बनती नहीं लग रही है। मुख्यमंत्री की गिरफ्तारी के मामले मे निचली अदालतों से राहत नहीं मिली। सुप्रीम कोर्ट से एक बार मामला वापस लिया जा चुका है प्राथमिकता के आधार पर नहीं सुना गया। सुनवाई चल रही है तब यह खबर छपी है कि मुख्यमंत्री जानबूझकर मीठा खा रहे हैं ताकि मेडिकल इमरजेंसी हो और जमानत मिल जाये। एक मुख्यमंत्री को जेल में रखने या जमानत मिलने या नहीं मिलने के लिए यह ‘व्यवस्थाहै तो सामान्य नहीं है। खबर में जो तथ्य हैं या नहीं हैं वह तो अपनी जगह और वह भी व्यवस्था का भाग है।  

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कहने की जरूरत नहीं है कि मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल आम राजनीतिज्ञ नहीं हैं। आईआईटी के पढ़े और अच्छी सरकारी नौकरी छोड़कर जनसेवा में आये हैं और अच्छे लोगों की टीम बनाई है। उनके अच्छे कामों के लिए उन्हें 2006 में मैग्सेसे पुरस्कार मिल चुका है। कोई भी जानता है कि जेल में खाने के मामले में मनमानी नहीं की जा सकती है। शुगर के मरीज से उनके घर वाले भी मीठा छिपाते हैं, बच्चे तक रोकते हैं। फिर जेल में उन्हें मीठा मिल कैसे रहा है और इसके लिए क्या वे अकेले दोषी हैं? दूसरी ओर, वे अच्छी राजनीति कर रहे हैं और पसंद किये जा रहे हैं फिर भी उनके करीबियों को पीएमएलए मामले में जेल में बंद रखा गया है जो नशे के सौदागरों और दुर्दांन्त अपराधियों के लिए है तथा जिसमें आम मामलों से अलग अभियुक्त को निर्दोष साबित होना होता है। मोटे तौर पर यह कानून के दुरुपयोग का भी मामला लगता है लेकिन कानून मेरा विषय नहीं है और मेरी टिप्पणी कानून की आम समझ के आधार पर ही है।

ईडी के नए और इस चौकाने वाले आरोप का कारण मेरी समझ से एक जनहित याचिका है। खबर के अनुसार, मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल की जान को खतरा बताते हुए पीआईएल दायर की गई है और सभी लंबित मामलों में असाधारण अंतरिम जमानत की मांग की गई है। चूंकि उनके खिलाफ आरोप पहली नजर में राजनीतिक लगते हैं, ईडी सरकार के विरोधियों के खिलाफ ही कार्रवाई कर रहा है यह लगभग स्पष्ट है और केजरीवाल के निशाने पर होने का कारण यह भी है कि वे केंद्र में सत्तारूढ़ भाजपा की सरकार के खिलाफ हैं इसलिए इस पीआईएल का मतलब है और ऐसे में केंद्र सरकार की शाखा के रूप में ईडी का घबराना और ऐसे आरोप लगाना जायज है। मेरी शिकायत मीडिया से है जिसमें ईडी से सामान्य सवाल भी नहीं पूछे गये लेकिन उसके आरोपों को प्राथमिकता से छापा गया है। सामान्य समझ यही है कि इंसुलिन लेने वालों को इंसुलिन नहीं देना जानलेवा हो सकता है और इंसुलिन नहीं देने के कारण शुगर लेवल बढ़ना ही है।

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ऐसे में यह कहना कि मीठा खाने से बढ़ा है कोई दमदार दलील नहीं है। सबको बता है कि शुगर रोटी-चावल से भी बढ़ता है। मुद्दा यह है कि अगर वे इंसुलिन लेते हैं तो क्यों नहीं दी जा रही है और दूसरे, उन्हें इस समय जेल में आम जैसी चीज कैसे मिल रही है। यही नहीं, जेल में बिना चीनी की चाय क्यों नहीं दी जा रही है? अगर यह सब नियमों के कारण है तो भी यह खबर अटपटी है कि कोई कैदी जेल में मीठी चीजें खा रहा है ताकि शुगर लेवल बढ़ जाये औऱ जमानत मिल जाये। जेल में कैदी आत्महत्या करते हैं उन्हें रोकने का काम जेल अधिकारियों का है और इसमें कैदियों को नंगा रखने के मामले भी हैं। लेकिन मुख्यमंत्री के मामले में यह संभव नहीं है तो जानबूझकर मीठा खाने का आरोप लगा दिया और अखबारों ने जस का तस छाप दिया।

दूसरा मामला ईवीएम के संबंध में सुनवाई पूरी होने और फैसला सुरक्षित रख लिये जाने के मामले में आज छपी खबर का है। आइए इस संबंध में पहले सातो शीर्षक देख लें। 

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अमर उजाला

“ईवीएम पर सवाल …. शीर्ष कोर्ट की नसीहत – हर चीज पर संदेह भी समस्या” (लीड के ऊपर छह कॉलम से ज्यादा का शीर्षक) “कहा – आयोग ने कुछ अच्छा किया है, तो सराहना होनी चाहिये, वीवी पैट से पूर्ण क्रॉस सत्यापन की मांग पर फैसला सुरक्षित” (उपशीर्षक है)। इसके साथ छपी खबरों के शीर्षक है, (1) “चुनावी प्रक्रिया की पवित्रता जरूरी, आशंकाओं को दूर करना होगा”। (2) “चार करोड़ वीवीपैट पर्चियां मिलाईं, कोई विसंगति नहीं मिली : आयोग”।    

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नवोदय टाइम्स

ईवीएम पर संदेह करने वालों से उच्चतम न्यायालय ने कहा – हर चीज पर शक नहीं किया जा सकता है। हाईलाइट किया हुआ अंश है, सुप्रीम कोर्ट – मतों की वीवीपैट से पूर्ण मिलान की मांग वाली याचिकाओं पर फैसला सुरक्षित।

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हिन्दुस्तान टाइम्स

ईवीएम पर सुप्रीम कोर्ट (ने कहा) : ऐसी व्यवस्था को क्यों रोकना जो ठीक काम कर रही है।

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टाइम्स ऑफ इंडिया

ईवीएम को सुप्रीम कोर्ट का विश्वास मत, कागज वाली व्यवस्था पर वापसी की संभावना से इनकार किया (लीड का मुख्य शीर्षक है) चुनाव आयोग के सर्वोच्च अधिकारी ने प्रदर्शन किया, सवालों के जवाब दिये। ईवीएम और वीवीपैट की गिनती में केवल एक मिसमैच।

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द हिन्दू 

किसी भी चरण में ईवीएम से छेड़छाड़ संभव नहीं है : सुप्रीम कोर्ट में चुनाव आयोग। इसके साथ छपी एक छोटी सी खबर का शीर्षक है, ईवीएम की खराबी की रिपोर्ट गलत : चुनाव आयोग

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इंडियन एक्सप्रेस

वीवीपैट की पर्ची से 100% पुष्टि की अपील (फ्लैग शीर्षक) मुख्य शीर्षक है, सुप्रीम कोर्ट ने आदेश सुरक्षित रखा, कहा (मतदाताओं की) बढ़ती संख्या लोगों का विश्वास दिखाती है। (लीड)

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द टेलीग्राफ 

ईवीएम में कोई खराबी नहीं – चुनाव आयोग।

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इस संबंध में जो खबरें और शीर्षक पहले पन्ने पर नहीं हैं उनमें से कुछ इस प्रकार हैं –

  1. केरल में ईवीएम मॉक ड्रिल में बीजेपी को मिले अधिक वोट… सुप्रीम कोर्ट में सनसनीखेज दावे पर चुनाव आयोग को जांच का निर्देश
  2. सुप्रीम कोर्ट ने पूछा- वोटर्स को वोटिंग पर्ची क्यों नहीं दे सकते, चुनाव आयोग ने कहा – इसका गलत इस्तेमाल होगा
  3. याचिकाकर्ताओं की तरफ़ से वकील निजाम पाशा ने कहा कि यह व्यवस्था होनी चाहिए कि वोटर अपना वीवीपैट स्लिप बैलट बॉक्स में ख़ुद डाले।
  4. ईवीएम पर जर्मनी का उदाहरण नहीं चलेगा
  5. 60 करोड़ वीवीपैट का मिलान क्या संभव है?

खबरों के अनुसार इस पर जस्टिस खन्ना ने सवाल किया कि क्या वोटर के निजता का अधिकार प्रभावित नहीं होगा? मुझे लगता है कि मेरे वोट की पर्ची मुझे मिले, मैं यह देखकर कि मैंने जिसे वोट दिया है पर्ची उसी की है, बॉक्स में डाल दूं तो मेरी निजता मेरे ही पास रहेगी और उसी पर्ची को गिना जाये तो मैं आश्वस्त रहूंगा कि मैंने सही पर्ची डाली थी और सही पर्ची गिनी गई है। जो भी हो, जनता को क्या बताया जा रहा है यह अपने आप में महत्वपूर्ण है। सुनवाई देखने-सुनने वालों का कहना है कि बहुत सारी नई जानकारी दी गई जो पहले से सार्वजनिक नहीं थी। पर ऐसी कोई जानकारी खबरों में नहीं है। ऊपर की पांच खबरों से लगता है कि वोटों की सख्या और बैलट पेपर की पुरानी व्यवस्था का भी हौव्वा है। मेरा मानना है कि व्यवस्था इसके बावजूद बनानी है और संतोषजनक होना सबसे जरूरी है। यह कोई दलील नहीं है कि 60 करोड़ वोट हैं इसलिये गिनने जरूरी नहीं है। अभी हाल में हमलोगों ने 350 करोड़ रुपये गिने जाने की खबर सुनी है। वैसे भी एक नोट के मुकाबले एक वोट कीमती है। गिनना तो होगा ही भले वीवीपैट की पर्ची नोट जैसी हो और नोट गिनने वाली मशीन से गिनी जाये। पहले वोट लूट लिये जाते थे इसलिए अब ईवीएम या ईवीएम से वोट लूटे जायें यह भी कोई दलील नहीं हुई।   

आपको याद होगा कि इलेक्टोरल बांड के मामले में भी ऐसे ही सवाल पूछ गये थे और बचाव में सरकार की ओर से ऐसी ही दलीलें दी गई थीं। सुप्रीम कोर्ट ने नहीं माना और बांड को असंवैधानिक घोषित करके रद्द कर दिया। गोपनीय जानकारी सार्वजनिक करने का आदेश दिया। इसके बाद जो योजना वसूली की लग रही है जिसे दुनिया का सबसे बड़ा भ्रष्टाचार कहा जा रहा है उसका प्रधानमंत्री बचाव कर रहे हैं। अखबारों ने भी बचाव में खबर छापा है। कहने की जरूरत नहीं है कि ईवीएम मामले में ज्यादातर शीर्षक से लगता है कि चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट के सवालों के संतोषजनक जवाब दिये हैं या जो दिये हैं उन्हें मान लिया गया है और यह भी कि सुप्रीम कोर्ट में कोई दोष स्वीकार नहीं किया गया।

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चुनाव आयोग ने कहा है कि ऐसी व्यवस्था को क्यों रोकना जो ठीक काम कर रही है। आप जानते होंगे कि सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई अब सार्वजनिक है और जो भी चाहे, सीधा प्रसारण देख सकता है। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई सार्वजनिक है, उसके सवाल, जवाब और टिप्पणियां भी। मैंने प्रसारण नहीं देखा पर जिनलोगों ने देखा उनका कहना है कि बहुत विस्तार में सुनवाई हुई और सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने कई सवाल पूछे और याचिका दायर करने वालों से यही अपील की गई कि वीवीपैट की सभी पर्चियों की गिनती की व्यवस्था की जाये। पर खबरों से नहीं लगता है कि ऐसी मांग हुई या अदालत इससे सहमत लगी। लेकिन जो लोग सीधा प्रसारण देख रहे थे उनमें से कम से कम एक ने कहा है और वह भी रिकार्ड पर है कि सुप्रीम कोर्ट की बातों से और अपने अनुभव से उन्हें उम्मीद है कि सभी पर्चियों के मिलान या गिनती का आदेश दिया जा सकता है। पूरे मामले को जानने समझने के बाद मेरी भी राय यही है।

अभी फैसला आना है और ऐसे में तमाम लोगों की राय से अलग खबरों से यह बताना कि सुप्रीम कोर्ट या चुनाव आयोग ईवीएम या व्यवस्था से संतुष्ट है, मुझे लगता है कि कोर्ट पर दबाव बनाना है। कहने की जरूरत नहीं है कि जो सवाल पूछे गए उसमें शीर्षक और भी बहुत कुछ हो सकते थे पर लगभग एक जैसे शीर्षक से मुझे लगता है कि किसी के लिए भी बिल्कुल अलग फैसला देना मुश्किल होगा। सुप्रीम कोर्ट ऐसे दबाव में आयेगा कि नहीं यह अलग मामला है पर केजरीवाल के अलावा ईवीएम के मामले में भी आज की खबरों से लगता है कि ये सरकार के समर्थन में अदालतों पर दबाव बनाने के लिए हैं। कम से कम खबर के रूप में तो ठीक नहीं ही हैं। दोनों के बारे में मैं ऊपर लिख चुका हूं। इसके अलावा मेरा मानना है कि चुनाव की प्रक्रिया तय करना सुप्रीम कोर्ट का काम नहीं है। पर हर बार सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर ही मतदाताओं का भरोसा बनाने की कार्रवाई हो यह उचित नहीं है। पर बात इतनी ही नहीं रह गई है। व्यवस्था ने संतोषजनक व्यवस्था नहीं की और अदालत ने व्यवस्था ठीक होने की बात कही तो सबको छोड़कर उसे ही शीर्षक बना दिया गया।

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केजरीवाल का मामला

केजरीवाल का मामला तो मुझे बिल्कुल समझ में आया कि ईडी ने ऐसा आरोप लगाया भी क्यों है। यह आरोप जेल अधिकारियों पर, केजरीवाल से मिलीभगत का या ऐसा कुछ क्यों नहीं है। यहां भी मेरा मानना है कि मामला अंततः सुप्रीम कोर्ट में फंसा है। नीचे की अदालतों ने न्याय कर दिया होता, ईडी ने चुनाव के बाद गिरफ्तार किया होगा तो मामला यहां आता ही नहीं। अब सुप्रीम कोर्ट अगर न्याय करे (मुख्यमंत्री को जमानत दे, क्योंकि उससे जांच और मामले पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा और न्याय होता दिखेगा और वे चुनाव में सक्रिय भूमिका निभा पाएंगे) तो यह प्रचारित किया जा सकेगा कि सुप्रीम कोर्ट सरकार के खिलाफ है, या उसके फैसले की आलोचना हो रही है। अगर जमानत नहीं दी जायेगी या ईवीएम पर मतदाताओं का भरोसा कायम करने के लिए कुछ नहीं किया जायेगा तब भी आलोचना होगी और जो आलोचना होने पर दबाव बनाते हैं उन्हें यह कहने का मौका मिलेगा कि आप दबाव में रहिये आलोचना योग्य फैसला मत कीजिये चाहे न्याय न हो। यह सीधे कहा भले नहीं जा रहा है। जो स्थितियां हैं उनमें ऐसा ही लग रहा है। या व्यवस्था ऐसी ही हो गई है।

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खबरों की साख गटर में

यहां खबरों को गलत ठहरा देने और खबर से पल्ला झाड़ लेने का मामला भी चिन्ता का विषय है। खबरें गलत नहीं होनी चाहिये हों तो गलत खबर देने वालों के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिये। अभी सरकार जो व्यवस्था बना रही है या बनाना चाहती है उसमें गलत खबर देने वाले के खिलाफ कार्रवाई हो या नहीं (रिपोर्टर के सवाल के जवाब में मालिक का नाम पूछने वाले मंत्री तो हैं ही) खबर हटाने पर ज्या जोर रहता है और गलत कहकर पल्ला झाड़ लेना तो आम है। केरल की खबर के मामले में भी यही कहा गया। मेरा मानना  कि गलत खबर देने वालों को खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिये जो नहीं हो रही है और जैसे कार्रवाई हो रही है वह ठीक नहीं है। इसमें अर्नब गोस्वामी और केरल के पत्रकार सिद्दीक कप्पन का मामला उल्लेखनीय है। उसपर यूएपीए का मामला लगा दिया गया जबकि अर्नब ने जिस डिजाइनर के पैसे मारे थे उसे दिया या नहीं पता ही नहीं चला। कुल मिलाकर, मुझे लगता है कि व्यवस्था न सिर्फ पत्रकारिता की बल्कि पत्रकारों की साख भी खराब करने में लगा है। फैक्ट चेक यूनिट को सुप्रीम कोर्ट रद्द कर चुकी है लेकिन यू टयूब और सोशल मीडिया से सरकार की परेशानी जायज है और इसीलिए यू ट्यूब पर फूहड़ खबरें की-कराई जा रही हैं ताकि कार्रवाई या कानून बनाने का बहाना मिले। स्वार्थ औऱ बेवकूफी में सहयोग करने वालों की कमी नहीं है।

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