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येति युग की भारतीय सेना और सत्तारूढ़ नेताओं की आस्था में पिसती पत्रकारिता

भारतीय सेना के कार्यों का श्रेय लेने और महिमामंडन की चुनावी कोशिशों के बीच सेना की हास्यास्पद भूमिका की पोल खुल गई है। हालांकि, अखबारों ने इसे ऐसे प्रस्तुत नहीं किया है। सेना की निन्दा वैसे भी देशद्रोही करार दिए जाने का जोखिम लेना है। फिर भी दुनिया भर में इसकी चर्चा है। आपने भी पढ़ा होगा कि भारतीय सेना ने हिम मानव येति के पैरों के निशान देखने का दावा करते हुए एक ट्वीट किया था। इस मामले में तब भी कहा गया था कि सेना को अपने निर्णय या अनुमान को ट्वीट करने की बजाय यह सूचना उन लोगों की जानकारी में लाना चाहिए था जो इसपर कुछ पक्की जानकारी या ठोस राय दे सकते। यह जानकारी समय पर देने से दावे या अंदेशे की जांच कर एक निष्कर्ष पर पहुंचा जा सकता था।

नवभारत टाइम्स ने आज इस विषय पर नेपाल आर्मी के प्रवक्ता ब्रिगेडियर जनरल विज्ञान देव पांडे से पूनम पाण्डे की बातचीत प्रकाशित की है। इसमें उनसे पूछा गया, भारतीय सेना के येति के दावे पर आपकी क्या प्रतिक्रिया है? जवाब था, यह काम वाइल्ड लाइफ कंजर्वेशन डिपार्टमेंट और टूरिजम डिपार्टमेंट का है, इसलिए हम इस पर कमेंट नहीं कर सकते। लेकिन ये सारी चीजें बेहतर तरीके से हो सकती थीं। इस तरह की कोई भी घटना ज्यादा ऑथेंटिक हो सकती थी। आम तौर पर यह प्रक्रिया है कि ऐसा कुछ नोटिस होने पर उसे टूरिज्म डिपार्टमेंट के डीजी ऑफिस को बताते हैं ताकि वह उसके वेरिफिकेशन के लिए 24 घंटों के भीतर ही अपनी टीम वहां भेज दें। क्योंकि मौसम की ऐसी स्थिति में 24 घंटे के बाद कुछ नहीं मिलता और निशान सब मिट जाते हैं। लेकिन इंडियन आर्मी के अभियान दल ने किसी को इसकी जानकारी नहीं दी और जब वह दल लोअर बेस कैंप पहुंचा तब यह दावा सामने आया।

इस मामले में खास बात यह है कि ये निशान 9 अप्रैल को देखे गए और सूचना व तस्वीर को कोई 20 दिन बाद ट्वीट किया गया। नेपाल आर्मी को इस तारीख पर भी शक है और उसका कहना है कि यह 11 अप्रैल की बात होगी और अगर ऐसा कुछ देखा गया था तो उसी समय संबंधित विभागों को जानकारी देनी चाहिए थी क्योंकि जहां ये निशान देखे गए वहां मौसम की स्थिति ऐसी है कि 24 घंटे बाद कुछ नहीं रहता है। सारे निशान मिट जाते हैं।

इस मामले में तथ्य यह भी है कि अमेरिकी वैज्ञानिक और नेपाल की एक टीम 1983 में इस क्षेत्र में दो महीने रहकर येति को तलाश चुकी है। उसके बाद यह माना गया कि इस तरह के पैरों के निशान जंगली पर्वतीय भालू (वाइल्ड माउंटेन बियर) के हैं। सहायकों का कहना है कि ऐसे निशान पहले भी कई बार दिखे हैं और यह पैरों के निशान भालू के हैं। सहायकों का कहना है कि ऐसे निशान पहले भी कई बार दिखे हैं और यह पैरों के निशान भालू के हैं।

मकाऊ-बरून नैशनल पार्क के डीजी ऑफिस और वॉर्डन ऑफिस के मुताबिक कई बार इस तरह के पैरों के निशान देखे गए हैं। टेलीग्राफ ने यह बताया है कि भालू के पैरों के निशान बड़े क्यों होते हैं। जानकारों के मुकाबिक भालू का बच्चा उछलते हुए चलता है तो उसके पैर एक ही जगह नहीं पड़ते बल्कि हिलते हैं। इसे ठीक से समझने के लिए टेलीग्राफ देखें।

अंग्रेजी दैनिक द टेलीग्राफ ने एक मई को ही यह खबर राहुल गांधी की नागरिकता संबंधी सवाल और प्रधानमंत्री के भाषण को आचार संहिता का उल्लंघन नहीं मानने के चुनाव आयोग के इस फैसले के साथ छापा था और पूछा था कि आज मई दिवस है या मूर्ख दिवस। अखबार ने इन तीन खबरों का शीर्षक लगाया था, येति युग में आइए। येती वाली खबर में अखबार ने लिखा था, भारतीय सेना ने सोमवार की रात एलान किया कि उसकी पर्वतारोहण टीम ने गए महीने माउंट मकाऊ में रहस्यमयी हिममानव येति के पैरों के निशान देखे हैं। इसके अगले दिन पीटीआई ने अनाम सूत्रों के हवाले से कहा कि सेना इन तस्वीरों और वीडियो को विशेषज्ञों से साझा करेगी ताकि इस बारे में ज्यादा जाना जा सके। कहने की जरूरत नहीं है कि सेना के संबंधित लोगों को इसका महत्व ही नहीं समझ में आया था और ना यह कि ऐसी सूचनाओं का करना क्या है। ना उन्होंने किसी से पूछा या जानने की कोशिश की।

अखबारों में यह खबर सेना के ट्वीट के बाद नहीं, पीटीआई की खबर के बाद आई। इससे पहले ट्वीटर पर इसका पूरा मजाक बन चुका था। फिर भी यह खबर ज्यादातर अखबारों में पहले पन्ने पर थी और इनमें सेना की चूक की खबर नहीं थी और न खबर पर अविश्वास था। पहले पन्ने पर जो महत्ता मिली उसके मद्देनजर उमर अब्दुल्ला का यह तंज भी महत्वपूर्ण है कि, भाजपा अब यह सोच रही होगी कि हिममानव का लोकसभा चुनाव के बाकी बचे प्रचार अभियान में कैसे इस्तेमाल करें (अमर उजाला) और इसमें तरुण विजय के ट्वीट (द टेलीग्राफ) की भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

टेलीग्राफ ने उसी दिन लिखा था कि कोई तस्वीरों की सत्यता को चुनौती नहीं दे रहा है पर सवाल है कि सेना कैसे इस निष्कर्ष पर पहुंच गई कि ये निशान येती के पैरों के हैं। अखबार ने ये भी लिखा था कि शोशल मीडिया पर इसका मजाक उड़ाया जा चुका था पर संघ के विचारक तरुण विजय ने इस पर ट्वीट किया था, “बधाई हो! हमें हमेशा आप पर गर्व है। भारतीय सेना की पर्वतारोही टीम को सलाम। लेकिन आप सब भारतीय हैं कृपया येति को राक्षस न कहें। उनकी इज्ज़त करें, आपने उन्हें ‘स्नोमैन’ कहकर संबोधित किया है।”

नवभारत टाइम्स में मूल खबर ऊपर पहले पन्ने पर और आज की खास खंबर अंतिम पन्ने पर

आपके अखबार ने इसे कैसे छापा था आप बेहतर जानते होंगे पर आज नवभारत टाइम्स की इस खबर से पता चल रहा है कि सेना ने इस मामले में कैसी गलतियां की और निर्णय लेने की जल्दबाजी के साथ समय पर सूचना नहीं देने की भी बड़ी गलती की है। टेलीग्राफ ने आज भी पहले पन्ने पर ही इस मामले का अपडेट छापा है पर अंग्रेजी या हिन्दी के दूसरे अखबारों में पहले पन्ने पर ऐसा कुछ नहीं दिखा। नवभारत टाइम्स ने भी मूल (और भ्रम फैलाने वाली) खबर को पहले पन्ने पर छापा था और सही व कथित एक्सक्लूसिव खबर को आखिरी पन्ने पर छापा है। दोनों ही खबर पूनम पांडे की है तब भी।

पूरे मामले को ठीक से समझने के लिए नभाटा में प्रकाशित पूरी बातचीत पढ़ने लायक है। जो इस प्रकार है :

सवाल : नेपाल से कितने लोग भारतीय सेना के इस पर्वतारोही दल के साथ हैं, जिसने रहस्यमयी हिम मानव येति के पैरों के निशान देखने का दावा किया है?
जवाब : नेपाल से 15 गाइड और कूली, एक कुक और नेपाल आर्मी के एक कैप्टन- लाइजन ऑफिसर के तौर पर भारतीय सेना के पर्वतारोही दल के साथ हैं। अभी भारतीय आर्मी की यह टीम लोअर बेस कैंप में है और नेपाल आर्मी के कैप्टन काठमांडू में, क्योंकि मौसम खराब होने की वजह से अभियान रुका हुआ है। 5 मई तक मौसम ठीक होने का अनुमान है, तब नेपाल आर्मी के कैप्टन भी भारतीय सेना के अभियान दल को फिर से जॉइन कर लेंगे।

सवाल : क्या नेपाल आर्मी के कैप्टन ने भी रहस्यमयी पंजे के निशान देखे?
जवाब : भारतीय सेना का दल जब यांगलेखारका से लांगमाले खारका जा रहा था तब उन्हें पंजे के निशान दिखे। पंजे के निशान दिखने की जो तारीख बताई जा रही है उसमें भी कुछ कंफ्यूजन है। भारतीय सेना ने कहा है कि पंजों के निशान उन्हें 9 अप्रैल को दिखाई दिए थे, लेकिन हमारी जानकारी के मुताबिक यह 11 अप्रैल की बात होगी। क्योंकि नेपाल आर्मी के जो कैप्टन इस दल के साथ हैं, उन्होंने बताया कि 9 और 10 अप्रैल को यह अभियान दल यांगले खारका में आराम कर रहा था और दल 11 अप्रैल को आगे बढ़ा। जो निशान देखे गए वह 11 अप्रैल के हैं। भारतीय सेना के 18 सदस्यों के अलावा 17 लोग नेपाल के भी थे। वे कतार में ट्रैवल कर रहे थे। जो लोग आगे थे उन्होंने वह पैरों के निशान देखे जिसमें नेपाल के सहायक (पोर्टर) शामिल थे। नेपाल आर्मी के कैप्टन पीछे थे, इसलिए उन्होंने पैरों के निशान नहीं देखे। शायद बर्फ की वजह से या वहां से चलने की वजह से वह मिट गए होंगे।

सवाल : तो भारतीय सेना की टीम के साथ चल रहे नेपाल के जिन लोगों ने निशान देखे, उनका क्या कहना है, क्योंकि उनके लिए यह जगह नई नहीं है?
जवाब : सहायक और गाइड का कहना है कि वह श्योर नहीं है कि यह निशान येति के हैं। मकालू रीजन में 1983 में अमेरिकी वैज्ञानिक और नेपाल की टीम करीब 2 महीने रही थी ताकि वह येति को खोज सकें। लेकिन उसके बाद यह माना गया कि इस तरह के पैरों के निशान जंगली पर्वतीय भालू (वाइल्ड माउंटेन बियर) के हैं। सहायकों का कहना है कि ऐसे निशान पहले भी कई बार दिखे हैं और यह पैरों के निशान भालू के हैं।

सवाल : क्या वहां के स्थानीय लोग येति या हिम मानव की बातों पर यकीन करते हैं। क्या वह इस दावे पर भरोसा कर रहे हैं?
जवाब : दल के साथ गए सहायकों के मुताबिक ऐसे निशान भालू के हैं। जो उन्हें पहले भी कई बार दिखे हैं।

सवाल : क्या नेपाल आर्मी ने कभी पहले इस तरह के पंजे के निशान देखे हैं?
जवाब : नहीं, नेपाल आर्मी ने कभी इस तरह के कोई निशान नहीं देखे। यह काम पर्वतों पर जाने वाले एक्सपर्ट्स का है। मकाऊ-बरून नैशनल पार्क के डीजी ऑफिस और वॉर्डन ऑफिस के मुताबिक कई बार इस तरह के पैरों के निशान देखे गए हैं।

वरिष्ठ पत्रकार और अनुवादक संजय कुमार सिंह की रिपोर्ट

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