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सुख-दुख

ब्यूरोक्रेसी के आंकड़ों के तिलस्म में उलझे योगी ज़मीनी हकीकत से दूर हैं!

राजीव तिवारी बाबा-

ये जो पब्लिक है वो सब जानती है… आगामी विधानसभा चुनाव के नतीजों को लेकर भाजपा के योगी बड़ी गलतफहमी में और सपा के अखिलेश अति-आत्मविश्वास में दिख रहे हैं। राजनीति में और खासकर यूपी की राजनीति में ये दोनों ही परिस्थितियां घातक सिद्ध होती आई हैं।

२०१२ के चुनाव में बसपा और २०१७ के चुनाव में सपा वापसी की बड़ी गलतफहमी में थी। ब्यूरोक्रेसी के आंकड़ों के मायाजाल उलझे मायावती और अखिलेश ज़मीनी हकीकत को नहीं भांप सके और जनता ने उन्हें सत्ता से बाहर कर दिया। इसी तरह २०१७ चुनाव में बसपा की मायावती अपनी पुनर्वापसी को लेकर जबरदस्त आत्मविश्वास में थीं कि सपा सरकार से आजिज जनता बसपा को दुबारा सत्ता में लाएगी। मगर बाजी मारी तीसरे ने।

कमोबेश यही परिस्थितियां फिर एकबार दिख रही हैं। ब्यूरोक्रेसी के आंकड़ों के तिलस्म में उलझे योगी ज़मीनी हकीकत से दूर हैं कि जनता इस सरकार के कामकाज के तौर-तरीकों से त्रस्त है। ये इसलिए भी क्योंकि योगी ने स्वयं को अपनी ही पार्टी के कार्यकर्ताओं से दूर कर रखा है तो सच कौन बताए? और उनके दंभी स्वभाव को देखते हुए कौन सच बताकर योगी जैसे ताकतवर व्यक्ति से बैर मोल ले। यह परिस्थितियां योगी की गलतफहमी बनाए रखने के अनुकूल और सत्ता में बरक़रार रहने के प्रतिकूल हैं।

दूसरी ओर सपा के अखिलेश यादव की स्थिति २०१७ में सत्ता में वापसी के लिए आत्मविश्वास से भरी बसपा की मायावती जैसी दिख रही है। अखिलेश को उनकी कथित सलाहकारों की टीम ये पर्याप्त भरम दे रखा है कि योगी सरकार से त्रस्त जनता के पास सपा के अखिलेश के अलावा कोई और विकल्प नहीं है। जनता जाएगी तो जाएगी कहां अखिलेश के पास ही आएगी। बस इसी अति आत्मविश्वास से भरे अखिलेश ज़मीनी स्तर पर वो कदम नहीं उठा पा रहे हैं जो उन्हें सत्ता में पुनर्वापसी करवा सकते हैं।

बहरहाल योगी जानें और अखिलेश जानें और जानें उनकी पार्टी और सलाहकार कि कैसे सत्ता में दुबारा आया जा सकता है। फिलहाल तो सौ कि सीधी एक बात यही कहुंगा कि सत्ता में वापसी की योगी की गलतफहमी इसी तरह बरकरार रही तो फिर ‘राम ही मालिक हैं।’ और अखिलेश की सत्ता में पुनर्वापसी का अति आत्मविश्वास इसी तरह जारी रहा तो ‘होइहे वही जो राम रचि राखा’ गाकर धीरज धरना होगा।
हम तो यही कहेंगे कि ‘ये जो पब्लिक है वो सब जानती है।’



यूसुफ़ किरमानी-

यूपी में और यूपी की राजनीति में क्या चल रहा है… यूपी में जो हमें नहीं दिख रहा है, वो है बुख़ार से तड़प कर हो रही बच्चों की मौत…

फिरोजाबाद में करीब 100 बच्चे भर्ती, फिरोजाबाद में मौतों की संख्या 80 पहुंची, मथुरा में भी डेंगू,बुखार के मरीजों में इजाफा, जिले में अबतक 15 लोगों की हो चुकी मौत। कासगंज में आज 2 बच्चों की हुई मौत, कासगंज में बुखार से 5 अबतक 5 मौतें हुईं। लखनऊ शहर बुख़ार की चपेट में है। यूपी के सीएम का एक पैर गोरखपुर तो दूसरा पैर कहीं और होता है।

यूपी में जो हमें दिख रहा है।…

सभी राजनीतिक दल अयोध्या में मंदिर की तरफ़ भाग रहे हैं।

मायावती के निर्देश पर सतीश मिश्रा अयोध्या हो आए। ब्राह्मण सम्मेलन हो ही चुका है।

आम आदमी पार्टी के नेता अयोध्या से अपने अभियान की शुरुआत करने जा रहे हैं।

ओवैसी फ़ैज़ाबाद ज़िले के रंगोली गाँव में बेबात और बिना किसी काम के जा रहे हैं।

कांग्रेस की प्रियंका गांधी वाड्रा भी अयोध्या दर्शन को जाने वाली हैं।

समाजवादी पार्टी का कोई न कोई नेता आये दिन अयोध्या दर्शन को पहुँच जाता है।

सवाल ये है कि ये राजनीतिक दल किसकी पिच पर खेल रहे हैं?

जिन बहुसंख्यकों को गंगा में तैरतीं अपने प्रियजनों और प्रियतमों की लाशें याद नहीं, वे भला तुम सारे विपक्ष के साफ्ट हिन्दुत्व पर यूपी चुनाव में वोट देंगे!

सरकार ने सरसों के तेल से लेकर पेट्रोल, डीज़ल, गैस सिलेंडर के दाम को आसमान पर पहुँचा दिया, तब भी ये बहुसंख्यक नहीं जागा तो तुम्हारे सॉफ़्ट हिन्दुत्व पर कैसे जाग जाएगा? जिन लोगों को मुल्ले टाइट चाहिए, वे आपके बहुत छोटे से स्टेक सॉफ़्ट हिन्दुत्व पर क्यों दांव लगाएँगे ?

अयोध्या भागने वालों की इस भीड़ में मैंने देश के तथाकथित प्रथम नागरिक राष्ट्रपति को शामिल नहीं किया।

ये पोस्ट उन लोगों के लिए है जो अक्सर पूछते हैं …और यूपी में क्या चल रहा है यूसुफ जी? तो साहब यूपी में जो चल रहा है, उसी को बयान कर दिया। अब ये सवाल मत पूछिएगा।

पूर्व चीफ़ जस्टिस बोबडे नागपुर में आरएसएस चीफ़ मोहन भागवत से मिलने चला गया। इस पर भी हल्ला मचाया गया। बेवक़ूफ़ी की हद है। बोबडे तो अच्छा आदमी है जो सार्वजनिक रूप से मिलने चला गया। उन पूर्व जजों का क्या जो रात के अंधेरे में उधर मिलते रहे और इधर अयोध्या पर फ़ैसला लिखते रहे। राज्यसभा जाते रहे। बोबडे तो मीडिया को बताकर गया। नागपुर उसका अपना शहर है। उसने इस शहर में भाजपा नेता के बेटे की बाइक पर ज्वॉय राइड किया। क्या वो अपने ही शहर में संघ के मुखिया से नहीं मिल सकता? क्या पता ये कहने गए हों कि संघ अब अपना झंडा बदल ले।

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