कासगंज में चंदन गुप्ता को मारने वाले शूटर वसीम जावेद का सपा कनेक्शन!

अजय कुमार, लखनऊ

योगी सरकार पर भी दंगों का दाग… आम चुनाव से पूर्व फिर दंगा ‘वोट बैंक’ वाला… उत्तर प्रदेश के जिला कासगंज में हुई साम्प्रदायिक हिंसा और एक युवक की मौत ने पूरे प्रदेश को एक बार फिर शर्मशार कर दिया। ऐसा लगता है कि यूपी और दंगा एक-दूसरे के पूरक बन गये हैं। सरकार कोई भी हो, दंगाई कभी सियासी संरक्षण में तो अक्सर धर्म की आड़ में अपना काम करते रहते हैं। बीजेपी सरकार भी इससे अछूती नहीं रह पाई है। बीजेपी सरकार में हुए दो बड़े दंगों की कहानी तो यही कहती है। यूपी को दंगामुक्त रखने के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के दावे तार-तार हो गये, अब योगी इस बात का दंभ नहीं भर सकेंगे कि उनका शासनकाल दंगा मुक्त है। योगी को सत्ता संभाले एक वर्ष भी नहीं हुआ है और प्रदेश दो बार बड़ी साम्प्रदायिक हिंसा की आग में झुलस चुका है। पिछले वर्ष सहारनपुर में पहले बाबा साहब के जन्मदिन के मौके पर उसके 15 दिनों बाद दलित-ठाकुरों के बीच हुई हिंसा और अब नये साल के पहले महीने की  26 जनवरी यानी गणतंत्र दिवस पर तिंरगा यात्रा के दौरान हुआ हिन्दू-मुस्लिम दंगा काफी कुछ इशारे करता है।

पिछले वर्ष सहारनपुर में महाराणा प्रताप की जयंती पर राजपूतों ने शोभायात्रा निकाली थी, जिस दौरान शब्बीरपुर गाँव में दलितों और राजपूतों में विवाद हो गया और देखते-देखते कई घर जल कर राख हो गये थे।  अभी भीम आर्मी के 22 से ज्यादा कार्यकर्ता जेल में बंद हैं। इससे पूर्व बाबा साहब के जन्मदिन के मौके पर भी यहां दंगा भड़का था, लेकिन उसे समय रहते नियंत्रित कर लिया गया था। सहारनपुर की जातीय हिंसा के बाद यह दूसरा बड़ा मामला है, जब कानून-व्यवस्था को लेकर योगी सरकार कटघरे में है। विपक्ष ही नहीं राज्यपाल राम नाईक तक इसे प्रदेश के लिये कलंक बता रहे हैं। शुरुआती जांच के बाद खुफिया रिपोर्ट में जो बात सामने आई है उसके अनुसार कासगंज की घटना भी सहारनपुर की घटना की तरह सुनियोजित लग रही है। अगर ऐसा न होता तो ट्रेन की पटरियों के किनारे पड़े रहने वाले पत्थर लोंगो के घरों से नहीं बरामद होते। भले ही दो सम्प्रदायों के बीच टकराव के बाद एसपी को दोषी मानकर हटा दिया गया है लेकिन, खुफिया रिपोर्ट में प्रशासन की भी चूक उजागर हुई है। कासगंज हिंसा की घटनाओं के संबंध में दर्ज सभी पांच मुकदमों की जांच विशेष जांच दल (एसआइटी) ने शुरू कर दी है। जिला एटा के एएसपी क्राइम के नेतृत्व में यह टीम गठित की गई है। वह दंगे के राजनैतिक पहलू भी खंगालेगी।

उधर, खुफिया रिपोर्ट ने समाजवादी पार्टी की भी चिंता बढ़ा दी है। सीएम आवास के आसपास आलू फेंकने की घटना में सपा के कुछ नेताओं का नाम सामने आने के बाद यह दूसरा मौका है जब कासगंज हिंसा में मारे गए चंदन गुप्ता के शूटर वसीम जावेद का सपा कनेक्शन खुल कर सामने आ रहा है। वसीम समेत हत्या में नामजद दर्जनभर आरोपियों पर रासुका की कार्रवाई चल रही है। मुख्य आरोपी वसीम के घर से पुलिस को एक एलबम मिली है, जिसमें फोटो के जरिए उसके संपर्क सूत्र तलाशे जा रहे हैं। वसीम का सपा शासनकाल में दबदबा था। उसे कुछ स्थानीय सपा नेताओं का संरक्षण प्राप्त था। उसके घर से अवैध बंदूक और अन्य आपत्ति जनक सामना भी बरामद हुआ है।  इस संबंध में जांच एजेंसियां शासन को पल-पल का अपडेट दे रही हैं।

बहरहाल, सभ्य समाज में किसी भी तरह की हिंसा को जायज नहीं कराया जा सकता है। भारतीय संविधान का जो स्वरूप है, उसके अनुसार विश्व में अपने हिन्दुस्तान की पहचान धर्मनिरपेक्षता के साथ लोकतांत्रिक मान्यताओं पर चलने वाला देश के रूप में होती है। पूरी दुनिया में अपना देश इकलौता है, जहां अलग-अलग धर्मो को मानने वाले लोंगो की संख्या सबसे अधिक होने के बाद भी सभी 125 करोड़ लोग एक साथ मिलजुल कर रहते हैं। इसके लिये किसी एक धर्म या कौम को श्रेय दिया जा सकता है। पूरा देश मिलीजुली संस्कृति का हिस्सा है।

यह सिक्के का एक पहलू है तो सच्चाई यह भी है कि देश में साम्प्रदायिक हिंसा और दंगो का भी बहुत पुराना इतिहास है। कोई भी राज्य और कोई भी दल ऐसा नहीं है जिसके दामन पर दंगा भड़काने का आरोप नहीं लगा हो। राष्ट्रीय पार्टी कहलाने वाली कांग्रेसी समय-सयम पर बीजेपी पर तो बीजेपी वाले कांग्रेसियों पर दंगा भड़काने का आरोप लगाते रहते हैं। वामपंथी भी दंगों की सियासत में कभी पीछे नहीं रहे हैं। राष्ट्रीय दल ही नहीं क्षेत्रीय दलों का इतिहास भी दंगों के मामले में काफी दागदार है। समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल, जनता दल युनाइटेड,शिवसेना, तृगमूल कांग्रेस सहित कई दलों के नाम इस कड़ी में गिनाये जा सकते हैं। इतिहास गवाह है कि साम्प्रदायिक हिंसा के कारण कई बार सरकारों को अपना राजपाठ तक गंवाना पड़ जाता है।

यहां छोटी-छोटी बात ही नहीं बेमतलब की बातों पर भी दंगा हो जाता है। कभी अपने धर्म पर कथित खतरा देख कर लोग मरने-मारने पर उतारू हो जाते हैं तो कभी तथाकथित धर्मगुरूओं के बहकावे में आकर लोग एक-दूसरे के खून के प्यासे जो जाते हैं। मामला धर्म और धर्मगुरूओं तक ही सिमित नहीं है। दंगों की आड़ में सियासतदार भी राजनैतिक रोटियां सेंकने का कोई मौका छोड़ते नहीं हैं। इसी लिये 1984 में कांग्रेस शासनकाल में हुए सिख दंगों की आग 35 वर्षो के बाद भी उसको झुलसाती रहती है। 1986 में दंगों की आड़ लेकर जिस तरह से कश्मीरी पंडितों को राज्य से बाहर खदेड़ दिया गया था,उसका दर्द अभी भी महसूस किया जा सकता है। देश में हुई साम्प्रदायिक हिंसा और दंगों के तमाम मामलों को छोड़ कर उंगलियों पर गिने जाने लायक दंगो की ही बात की जो तो भी इन दंगों के चलते ही हमारे देश की तस्वीर काफी भयावह नजर आती है। 

जब दंगो की चर्चा चलती है तो अनायास ही वर्ष  1946 में कलकत्ता में हुए इन दंगों की याद ताजा हो हाती है। वर्ष 1946 को “डायरेक्ट एक्शन दिवस” के नाम से भी जाना जाता है. इसमें 4,000 लोगों ने अपनी जानें गंवाई थी। 10,000 से भी ज्यादा लोग घायल हो गये थे हिंदू-मुस्लिम समुदाय के बीच यह दंगा हुआ था। 31 अक्टूबर, 1984 को इंदिरा गांधी की मौत पर सिख दंगो की आग देश ने झेली। इंदिरा गांधी की हत्या की वारदात को उनके तीन-चार सिख अंगरक्षकों ने अंजाम दिया था, लेकिन इसका खामियाजा पूरी सिख कौम को भुगतना पड़ा। पूरे देश में जगह-जगह सिक्खों को निशाना बना गया।  इस दंगे में 900 के करीब सिखों की हत्या हुई थी और उनकी हजारों करोड़ की सम्पति को नुकसान पहंुचाया गया।

1986 में हुए कश्मीर दंगा मुस्लिम कट्टरपंथियों द्वारा कश्मीरी पंडितों को राज्य से बाहर निकालने के कारण हुआ था। इस दंगे में एक हजार से भी ज्यादा लोगों की जानें गयी थीं और कई हजार कश्मीरी पंडित बेघर हो गये थे। बाबा भोलेनाथ की नगरी वाराणसी में  1989, 1990 और 1992 में भयंकर दंगे हुए थे। इस हिंसा में कई लोगों की जानें गईं और कई लोग बेघर हुए थे।

अक्टूबर 1989 में बिहार के भागलपुर में हुआ दंगा 1947 के बाद, भारतीय इतिहास के सबसे बड़े दंगों में से एक था। इसमें हिन्दू और मुस्लिम समुदाय के लोग शामिल थे। दंगे में सैकड़ों निर्दोषों को जानें गंवानी पड़ी थी। इसी प्रकार से 1992 में पूरे देश मे कई शहरों सहित  मुंबई में हुआ दंगा कभी भुलाया नहीं जा सकता है। यह दंगा भगवान राम की नगरी अयोध्या में  बाबरी मस्जिद का विवादित ढांचा विध्वंस के बाद भड़का था। इस दंगे की शुरुआत 06 दिसंबर 1992 को ढांचा गिराने जाने के बाद हुई थी जो 1993 के जनवरी तक चलता रहा. इसमें हजारों लोंगो की जानें गईं। आज भी इसको लेकर सियासत का तानाबाना बुना जाता है। वर्ष 2002 में मोदी के शासनकाल में गुजरात में हुए दंगों के कारण देश और बीजेपी की काफी किरकिरी हुई। इसकी शुरुआत तब हुई जब अयोध्या से लौट रहे कारसेवकों की टेªन (साबरमती एक्सप्रेस) में गोधरा स्टेशन के पास कुछ असामाजिक तत्वों ने पेट्रोल डालकर आग लगा दी थी। इस घटना में 59 कारसेवकों की मौत हो गई. बाद में इस घटना ने बड़ा साम्प्रदायिक रूप ले लिया। गुजरात का बड़ा इलाका हिंसा की चपेट में आ गया । इन दंगों में हजारों लोगों की जानें गईं और लाखों लोगों को बेघर होना पड़ा था।

इसी तरह से 2010 में पश्चिम बंगाल के देगंगा में कुछ अतिवादियों ने हिन्दू मंदिरों को तोड़ दिया, और मंदिर के खजाने को लूट लिया. इसके परिणाम में कई लोगों की हत्याएं हुईं और कई लोगों को बेघर होना पड़ा।  वर्ष 2012 में असम के कोकराझार में रह रहे बोडो जनजाती और बांग्लादेशी घुसपैठियों के बीच हिंसा भड़क गई। इस हिंसा में करीब 80 लोगों की मौत हुई और लाखों लोग बेघर हुए।

बात उत्तर प्रदेश की कि जाये तो यह राज्य तो राजनेताओं के लिये दंगो की प्रयोगशाला जैसा रहा। बरेली, बागपत, लखनऊ, वाराणसी, बाराबंकी, गोरखपुर, मऊ, गाजीपुर सहित यूपी का कोई जिला ऐसा नहीं बचा होगा जो कभी न कभी दंगों की चपेट में न आया हो। यहां हिन्दू – मुस्लिम, शिया – सुन्नी, अगड़े-पिछड़ों, दलित-ब्राहमण-ठाकुरों,जाट-मुसलमानों आदि को कई मौकों पर एक-दूसरे के खून का प्यासा होते देखा गया है। यूपी में बड़े दंगों की बात की जाये तो 13 अगस्त 1980 को पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जिला मुरादाबाद में उस समय दंगा भड़क गया जब ईद की नमाज के दौरान ईदगाह में एक सुअर घुस गया था। इस मामले ने इतना तूल पकड़ा की वर्षो से साथ उठने-बैठने वाले मरने-मारने पर उतारू हो गये। अगस्त से शुरू हुई दंगे की आग नवंबर तक सुलगती रही। इस दंगे में लगभग 400 लोग मारे गए थे।

1987 में जिला मेरठ दंगों के चलते पहली बार उस समय सुर्खियों में आया था,जब तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी के आदेश पर अयोध्या में पूजा अर्चना के लिये राम जन्मभूमि का ताला खोला गया था। इस फैसले से दूसरे पक्ष के लोग भड़क गए। उस समय प्रदेश में वीर बहादुर सिंह की सरकार थी। दंगा भड़का तो दोनों ही ओर से लोगों को बड़ी संख्या में जान देकर इसकी कीमत चुकानी पड़ी, उस समय मेरठ के हाशिमपुरा मोहल्ले और मलियाना गांव में जो हुआ, उसने लोगों का दिल दहला दिया, यहां बड़े पैमाने पर जान-माल का नुकसान हुआ था।

मेरठ के हाशिमपुरा में 22 मई, 1987 की रात पीएसी के जवानों ने 50 मुसलमानों को गिरफ्तार किया और पास ही एक पीपल के पेड़ के पास ले जाकर कतार में खड़ा कर दिया। उसमें से बच्चों और बूढ़ों को अलग कर उन्हें जाने दिया गया। शेष 42 मुसलमान युवकों को पास ही गुलमर्ग सिनेमा हाल पर खड़े पीएसी के ट्रक में बैठाकर थाने ले जाने के लिए रवाना किया गया, लेकिन थाने के बजाय पीएसी के जवान उस ट्रक को प्लाटून कमांडर सुरिंदर पाल सिंह के नेतृत्व में दिल्ली-मेरठ हाइवे पर ले गए और वहां गंग नहर के किनारे एक आम के पेड़ के नीचे सभी को उतारा और फिर कतार में खड़ा करके उन्हें गोली मार दी गई और उनकी लाशें नहर में बहा दी गईं। कुछ युवकों ने शोर मचाया और ट्रक से नहीं उतरे, उन्हें फिर माकनपुर गांव के नजदीक हिंडन नहर के पास उतार कर गोली मारी गई और उनकी लाशें नहर में फेंक दी गईं। इस पूरे घटनाक्रम में किसी तरह से पांच लोग बच पाए, जिन्हें पीएसी के जवानों ने गोली मारने के बाद मरा समझ कर छोड़ दिया था, जिन्होंने बाद में इस लोमहर्षक घटना का खुलासा किया। मलियाना गांव में भी कुछ ऐसा ही हुआ था। हाशिमपुरा के इस चर्चित मामले में 21 मार्च 2015 को दिल्ली की तीस हजारी कोर्ट ने सभी 16 आरोपी पीएसी वालों को साक्ष्य के अभाव में बरी कर दिया।

अलीगढ़ को उत्तर प्रदेश का सांप्रदायिक दंगों से ग्रस्त शहर भी कहा जाता है। 5 अप्रैल 2006 को हिन्दुओं के पवित्र पर्व रामनवमी के अवसर पर हिंदू और मुसलमानों के बीच बहुत हिंसक दंगा हुआ, जिसमें 6-7 लोगों की मौत हो गई. यहां अकसर इस तरह की घटनाएं होती रहती हैं। इस कड़ी में 2013 में पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरपुर में हुए दंगों को भी नहीं भुलाया जा सकता है। अखिलेश  के सत्ता संभालने के करीब डेढ़ साल बाद 27 अगस्त 2013 को हुए इन दंगों की तपिश पूरे शासनकाल के दौरान अखिलेश को सताती रही। जिले के कवाल गांव में एक जाट लड़की को मुस्लिम लड़कों द्वारा छेड़ने की घटना के बाद यह दंगा भड़का था, जिसमें 49 लोगों की जानें गईं और 93 लोग घायल हुए थे। बाद में इस पर सियासत भी खूब हुई। बीजेपी ने लोकसभा चुनाव के समय हिन्दू वोटरों को लामबंद करने के लिये इसे खूब भुनाया, जिसका समाजवादी पार्टी को बड़ा नुकसान उठाना पड़ा था। बसपा सुप्रीमों मायावती की भी सियासत इन दंगों से बच नहीं पाई थी। हॉ, मायावती को इस बात का जरूर श्रेय दिया जा सकता है कि उनके शासनकाल में जब हाईकोर्ट ने अयोध्या विवाद पर फैसला सुनाया था तो पूरे उत्तर प्रदेश में कहीं भी हिंसा की कोई वारदात नहीं हुई थी। यह उनकी सरकार की बड़ी उपलब्धि थी। फिर भी तमाम मौकों पर  ऐसा लगता रहता है कि नेतागण अपना वोट बैंक मजबूत करने के लिये दंगों की आग में भोली-भाली जनता की झोंकने में जरा भी गुरेज नहीं करते हैं। इसी लिये यूपी और दंगा एक-दूसरे के पूरक बन गये हैं…

सियासी रंग भी चढ़ा…  कासगंज हिंसा में राज्यपाल रामनाईक के बयान और खुफिया इकाइयों की रिपोर्ट के बाद बीजेपी और विरोधी दलों के बीच राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का दौर तेज हो गया हैं। रिपोर्ट में इस घटना को विपक्षी दलों की साजिश करार दिया गया है। सपा ने जहां इस पर पलटवार करते हुए कहा है कि सरकार अपनी अकर्मण्यता का ठीकरा विपक्ष पर फोड़ रही है, वहीं बसपा और कांग्रेस के निशाने पर भी सरकार है। समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय सचिव राजेन्द्र चौधरी कहते हैं कि उत्तर प्रदेश के हालात सरकार के नियंत्रण से बाहर हो गये हैं। कासगंज की घटना से भाजपा सरकार अपनी जिम्मेदारी से भाग नहीं सकती है। सपा का कहना था ‘कासगंज की घटना कलंक है’ वाला राज्यपाल का बयान सच्चाई के बेहद नजदीक है। वहीं कांग्रेस ने पूरे मामले की उच्च स्तर पर न्यायिक जांच कराये जाने की बात कही।

काश, विष्णु सहाय आयोग के सुझाव माने जाते… कासगंज पुलिस ने समाजवादी पार्टी के शासनकाल में 2013 में हुए मुजफ्फरनगर के दंगों के बाद गठित विष्णु सहाय आयोग की सिफारिशों पर अमल किया होता तो शायद हालात इतने खराब न होते। एक तरफ सांप्रदायिक तनाव की पूर्व जानकारी देने में खुफिया तंत्र पूरी तरह विफल रहा, वहीं पुलिस प्रशासन ने भी मुजफ्फरनगर आयोग के दिए सुझावों को याद नहीं रखा।  कासगंज हिंसा के बाद आरोपियों की गिरफ्तारी के लिए पुलिस की दबिश में कई बार ऐसा लगा कि जैसे अराजक तत्व पहले से पूरी तैयारी में थे। उनके घरों से असलहों के अलावा बम तक बरामद हुए। प्रशासन को हिंसा पर काबू पाने में तीन दिन लग गए। लगातार तीन दिनों तक हुई हिंसक घटनाओं ने योगी सरकार की काफी किरकिरी कराई।। हालांकि कासगंज में प्रशासन ने इतना हिंसा के बाद अफवाहों पर रोक लगाने के लिए इंटरनेट सेवाएं बंद कराई थीं,लेकिन इसमें भी तेजी से काम नहीं हुआ। इसी लिये दंगे में दो युवकों के मारे जाने की खबर सोशल मीडिया में सुर्खियां बटोरती रहीं।

गौरतलब हो, वर्ष 2013 में मुजफ्फरनगर और आसपास के जिलों में हुए दंगों की जांच के लिए गठित जस्टिस विष्णु सहाय आयोग ने अपनी रिपोर्ट में दंगों की वजह और उससे निपटने में हुई चूक की तरफ इशारा किया था। आयोग का मुख्य जोर इस बात पर था कि प्रशासन की कार्रवाई में निष्पक्षता नहीं था, जिससे एक संप्रदाय के लोगों में आक्रोश बढ़ता गया। आयोग की रिपोर्ट पर तब विधानसभा में चर्चा भी हुई थी और अखिलेश सरकार ने उसकी ओर से दिए गए सुझावों पर अमल करने का भरोसा दिलाया था। हालांकि इस रिपोर्ट पर कभी गंभीरता से मंथन नहीं हुआ था। आयोग ने दंगे के समय तत्कालीन प्रमुख सचिव गृह एवं जिलों के अफसरों की भूमिका को उचित नहीं माना था।

डीजीपी ओपी सिंह के सख्त आदेश… उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक ओम प्रकाश सिंह ने प्रदेश के सभी पुलिस कप्तानों को सांप्रदायिक सद्भाव बनाए रखने के लिए निष्पक्ष होकर तेजी से प्रभावी कार्रवाई करने की हिदायत दी है। यह भी कहा है कि उस पक्ष को चिति कर कार्रवाई की जाए, जिसकी गलती से सांप्रदायिक तनाव पैदा हुआ है। प्रदेश में कानून-व्यवस्था सुदृढ़ रखने और सांप्रदायिक सौहार्द बनाए रखने के लिए जारी अपने सकरुलर में डीजीपी ने विस्तृत दिशा-निर्देश दिए हैं। उन्होंने कहा कि संप्रदायों के बीच आपसी संवाद से बड़े संघर्ष को टाला जा सकता है। सांप्रदायिक तनाव के कारणों का पता लगाकर दोनों पक्षों में संवाद कराते हुए मामलों का समाधान समय से कराया जाए।
पुलिस मैनुयल भी सख्ती से लागू नहीं होता

यदि पुलिस चाहे तो दंगों की धार को कुंद भले ही न किया जा सके,परंतु इसे कम जरूर किया जा सकता है। कानून व्यवस्था और इस तरह के दंगों से निपटने के लिये पुलिस के पास अंग्रेजों के समय से यह कानून  मौजूद है कि जिस क्षेत्र में दंगा होगा, वहां हुए सरकारी या निजी सम्पति के नुकसान की भरपाई उसी क्षेत्र की जनता को करना पड़ेगी, लेकिन अपवाद को छोड़कर कभी इसे सख्ती के साथ लागू नहीं किया गया, इस वजह से आगजनी और लूटपाट की घटनाएं ज्यादा बढ़ती जा रही हैं।

लेखक अजय कुमार लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं.

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