यूपी में मुंह के बल गिरेगी भाजपा, मुस्लिम-दलित बाहुल्य सीटें बिगाड़ेंगी गणित!

अजय कुमार, लखनऊ पिछले लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश भाजपा के लिए ‘सोने का अंडा’ देने वाली मुर्गी साबित हुआ था। 80 में से 73 सीटें भाजपा गठबंधन के खाते में गई थीं। समाजवादी पार्टी को पांच और कांग्रेस को दो सीटों पर संतोष करना पड़ा था तो बसपा का खाता ही नहीं खुल पाया …

यूपी में आधी से अधिक सीटों पर ‘एमवाईडी’ गेम चेंजर!

अजय कुमार, लखनऊ उत्तर प्रदेश में सियासी पारा चढ़ा हुआ है। तमाम सीटों पर विभिन्न दलों ने प्रत्याशियों की घोषणा कर दी है। उम्मीदवारों का नाम सामने आने के साथ ही यह भी साफ हो गया है कि भले ही सभी पार्टिंयां के आका विकास के दावे का ढिंढोरा पीट रहे हों, लेकिन कोई भी …

पीएम के नाम पर सपा-बसपा एक राय नहीं

लखनऊ : अयोध्या में भगवान राम का मंदिर कब बनेगा, इसको लेकर विरोधी दलों के नेता अक्सर बीजेपी तंज कसते हुए कहते रहते हैंं,‘मंदिर वहीं बनाएंगे,पर तारीख नहीं बतायेंगे।‘ अब चुनावी मौसम में इसी तरह का तंज बीजेपी विरोधी दलों के नेता विरोधियों पर कसते हुए कहने लगे हैं,‘ प्रधानमंत्री हम बनवाएगें, पर नाम नहीं …

मुलायम कहां से चुनाव लड़ेंगे यह भी माया-अखिलेश तय करेंगे!

लखनऊ : समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के बीच गठबंधन को लेकर बसपा में भले ही सुगबुगाहट नहीं हो रही हो, लेकिन समाजवादी पार्टी में इस गठबंधन को लेकर विरोध के स्वर सुनाई पड़ने लगे हैं। आजम खान का नाम इसमें सबसे ऊपर है तो अपर्णा यादव भी गठबंधन को लेकर ज्यादा उत्साहित नजर …

अवैध खनन घोटाले में सपा के कई नेताओं पर शिकंजा

चन्द्रकला का बयान सामने लायेगा अखिलेश का कारनामा, चचा शिवपाल भी बोले भतीजा बेदाग नहीं, ईडी का अखिलेश के मंत्री रहे प्रजापति पर भी शिकंजा अजय कुमार, लखनऊ उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने अपने पांच वर्षो के शासनकाल में मिस्टर क्लीन की जो छवि बनाई थी, वह उनके ऊपर अवैध खनन घोटाले …

अस्तांचल की ओर ‘मुलायम’ समाजवाद!

अजय कुमार, लखनऊ उत्तर प्रदेश की राजनीति में पिछले पांच वर्षो में कई बदलाव देखने को मिले। इस दौरान कई दोस्तियों में दरारें पड़ गईं तो कई दुश्मनों को दोस्त बनते भी भी देखा गया। सियासत की चकाचैंध में किसी ने नई पारी शुरू की तो मुलायम सिंह यादव जैसे नेताओं को उसी बेटे अखिलेश …

योगी की सख्ती से 11 लाख नकलची छात्र-छात्राओं ने परीक्षा से तौबा किया

अजय कुमार, लखनऊ 

बेरोजगारी देश की एक बड़ी समस्या है. सरकार की इतनी क्षमता नहीं है कि वह सरकारी सेवाओं में सबको समाहित कर पाये. इसके बाद भी सरकारी नौकरियों के इच्छुक युवाओं की लम्बी-लम्बी कतारें कहीं भी देखी जा सकती हैं. सरकार किसी की भी रही हो,उसे बेरोजगारी रूपी ‘सांप’ हर समय डसने को तैयार रहता है.युवाओं को रोजगार चाहिए होता है तो विपक्ष के लिये बेरोजगारी, सियासी रोटियां सेंकने का सबसे सुनहरा मौका रहता है. बेरोजगार युवा इसके चलते स्वयं तो कुंठित रहते ही हैं. इसका सामाजिक और कानून व्यवस्था पर भी काफी विपरीत प्रभाव पड़ता है. बेरोजगारी से मुफलिसी और भुखमरी बढ़ती है और भुखमरी और मुफलिसी अपराध की जननी बन जाती है. तो सरकार पर यह कथित पढ़े-लिखे बेरोजगार अनायास बोझ बन जाते हैं.

कासगंज में चंदन गुप्ता को मारने वाले शूटर वसीम जावेद का सपा कनेक्शन!

अजय कुमार, लखनऊ

योगी सरकार पर भी दंगों का दाग… आम चुनाव से पूर्व फिर दंगा ‘वोट बैंक’ वाला… उत्तर प्रदेश के जिला कासगंज में हुई साम्प्रदायिक हिंसा और एक युवक की मौत ने पूरे प्रदेश को एक बार फिर शर्मशार कर दिया। ऐसा लगता है कि यूपी और दंगा एक-दूसरे के पूरक बन गये हैं। सरकार कोई भी हो, दंगाई कभी सियासी संरक्षण में तो अक्सर धर्म की आड़ में अपना काम करते रहते हैं। बीजेपी सरकार भी इससे अछूती नहीं रह पाई है। बीजेपी सरकार में हुए दो बड़े दंगों की कहानी तो यही कहती है। यूपी को दंगामुक्त रखने के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के दावे तार-तार हो गये, अब योगी इस बात का दंभ नहीं भर सकेंगे कि उनका शासनकाल दंगा मुक्त है। योगी को सत्ता संभाले एक वर्ष भी नहीं हुआ है और प्रदेश दो बार बड़ी साम्प्रदायिक हिंसा की आग में झुलस चुका है। पिछले वर्ष सहारनपुर में पहले बाबा साहब के जन्मदिन के मौके पर उसके 15 दिनों बाद दलित-ठाकुरों के बीच हुई हिंसा और अब नये साल के पहले महीने की  26 जनवरी यानी गणतंत्र दिवस पर तिंरगा यात्रा के दौरान हुआ हिन्दू-मुस्लिम दंगा काफी कुछ इशारे करता है।

तो ओपी सिंह को डीजीपी बनाने में योगी सरकार को ये दिक्कत महसूस हो रही है….

अजय कुमार, लखनऊ

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जनहित के तमाम फैसले तो धड़ाधड़ ले रहे हैं, लेकिन जमीन पर यह फैसले उम्मीद के अनुसार फलीभूत होते नहीं दिख रहे हैं, जिसका गलत मैसेज जनता के बीच जा रहा है, तो विपक्ष को सरकार पर हमलावर होने का मौका मिल रहा है। सवाल यह उठ रहा है कि चूक कहां हो रही है?  क्या सरकारी मशीनरी योगी सरकार के मंसूबों पर पानी नहीं फेर रही है ? योगी की बार-बार की डांट-डपट के बाद भी नौकरशाही के कानों पर जूं क्यों नहीं रेंग रही है ? चर्चा यह भी है कि ब्यूरोक्रेसी के दिलो-दिमाग में यह बात घर कर गई है कि यूपी की सरकार पीएमओ से चल रही है ? सरकार के गठन के समय प्रमुख और मुख्य सचिव से लेकर अब पुलिस महानिदेशक की नियुक्ति तक में जिस तरह की फजीहत योगी सरकार की हो रही है, उससे ब्यूरोक्रेसी के बीच यही मैसेज गया है कि यूपी में सभी प्रमुख पदों पर नौकरशाही की नियुक्ति में योगी नहीं, केन्द्र की मोदी सरकार की चल रही है. वह महत्वपूर्ण पदों पर अपने हिसाब से अपने पसंद के अधिकारियों का बैठा रहा है, ताकि केन्द्रीय योजनाओं को पीएम की इच्छा के अनुरूप लागू किया जा सके. 2019 के लोकसभा चुनावों को देखते हुए ऐसा आवश्यक भी बताया जा रहा है.

यूपी : दारू के धंधे में फिर आयेगा सिंडीकेट राज!

अजय कुमार, लखनऊ

आबकारी नीति में बदलाव के संकेत… उत्तर प्रदेश के दारू के धंधे में आगामी वित्तीय वर्ष 2018-19 से समाजवादी रंग उतार कर भगवा रंग चढ़ाने की तैयारी की जा रही है। इस बदलाव से किसको कितना फायदा होगा,यह तो समय ही बतायेगा,लेकिन जो तस्वीर उभर कर आ रही है,उससे यही लगता है कि एक बार फिर यूपी में फोंटी की कम्पनी का दबदबा बढ़ सकता है। सिंडिकेट राज पुनः लौटेगा? क्योंकि नई पॉलिसी कुछ ऐसी बनाई जा रही है जिससे आर्थिक रूप से कमजोर शराब कारोबारियों  के पास अपना धंधा समेटने के अलावा कोई चारा बचेगा ही नहीं।

यूपी में अब ‘भू-जेहाद’ का फलसफा

अजय कुमार, लखनऊ

सरकारी जमीन पर अवैध कब्जा। कुछ दशकों पूर्व यह एक समस्या भर थी, लेकिन अब यह समस्या नासूर बन गई है। पहले तो शहर-गांव में छोटी-छोटी जमीन कब्जाई जाती थी, लेकिन धीरे-धीरे यह संगठित अपराध बन गया। हर शहर और गांव में भू-माफिया पैदा हो गये। कुछ सरकारी कर्मचारियों और जनप्रतिनिधियों ने इन भू-माफियाओं के मंसूबों को ‘चार चांद’ लगाने का काम किया। फिर तो सरकारी-नजूल की जमीन पर बड़े-बड़े प्रोजेक्ट तक खड़े होने लगे। यह भूमाफिया कब्जाई हुई जमीन के ले-देकर फर्जी कागम तैयार करके, ऐसे प्रोजेक्ट की सम्पतियों को ऊंचे दामों में बेच देते थे। बाद में खरीददार कोर्ट-कचहरी के चक्कर लगाते रहते थे।

राजनीतिज्ञों का दोहरा चरित्र : विकास की बात, विवाद पर विश्वास

अजय कुमार, लखनऊ
राजनीति बिना शोहरत के नहीं चलती है और शोहरत बिना नाम और काम के नहीं मिलती है। सियासत के मैदान में वही नेता लम्ब समय तक टिका रहता है जिमसें धैर्य कूट-कूट कर भरा हो। अपमान का कड़वे से कड़वा घूंट पीने की क्षमता हो। यहां जनता की नब्ज को पकड़ कर चलना कामयाबी की कसौटी होती है तो समय की समझ सफलता का मापदण्ड होता है। इसी लिये राजनीति के मैदान में कूदने वाले तमाम नेता बहुत कुछ हासिल करने के बाद भी राजनैतिक शिखर पर नहीं पहुंच पाते हैं। यह वह नेता होता हैं जो राजनीति को शार्टकट से आगे बढ़ाने पर विश्वास रखते हैं और जब यह रास्ता चुनते हैं तो ऐसे नेताओं का विवादों से नाता जुड़ जाता है।

दिवाली पर भतीजे से चचा को मिला सियासी अंधेरा!

अजय कुमार, लखनऊ

दीपावली खुशियां बांटने का त्योहार है। हर तरफ खुशियांे का आदान-प्रदान देखा जा सकता है,लेकिन सियासी दुनियां यह सब बातें मायने नहीं रखती हैं। इसी लिये दीपावली के दिन एक भतीजे ने चाचा की जिंदगी में ‘सियासी अंधेरा’ कर दिया। बात समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव और उनके चाचा शिवपाल यादव की हो रही है। पिछले वर्ष तो भतीजे ने चाचा की दीवाली ‘काली’ की ही थी,इस बार भी ऐसा ही नजारा देखने को जब मिला तो लोग आह भरने को मजबूर हो गये।

प्रेम के प्रतीक ताजमहल पर ये कौन लोग सेंक रहे हैं सियासी रोटियां?

अजय कुमार, लखनऊ

उत्तर प्रदेश का यह सौभाग्य है कि उसके पास दुनिया का सांतवा अजूबा ताजमहल मौजूद है, जिसको देखने देश भर से ही नहीं, पूरी दुनिया से लोग आते हैं। सफेद संगमरमर के पत्थरों पर की गई खूबसूरत नक्काशी पूरी दुनिया में आज भी बेजोड़ है तो मोहब्बत की निशानी के रूप में भी इसे याद किया जाता है। ताजमहल जितना खूबसूरत है, उतना ही विवादित भी है। इस शानदार मकबरे का निर्माण-कार्य पेचीदा, खर्चीला और कई वर्षों तक चला था। बीस हजार मजदूरों द्वारा 22 साल में इस इमारत का निर्माण संभव हुआ।

पुत्रमोह में फंसे मुलायम अंतत: अखिलेश के ही हुए!

अजय कुमार, लखनऊ

आगरा में समाजवादी पार्टी का अधिवेशन अखिलेश यादव को नई उर्जा दे गया। वह न केवल समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बन गये बल्कि उन्हें पिता मुलायम सिंह यादव का आशीर्वाद भी मिल गया जिन्होंने ऐन वक्त पर अलग राजनैतिक दल बनाने का अपना इरादा बदल दिया। सूत्र बताते हैं कि जब आगरा में सपा को अधिवेशन हो रहा था, उसी समय लखनऊ में मुलायम के नेतृत्व में नई पार्टी बनाने की नींव एक तरह से रख ली गई थी, जिसकी रूपरेखा 25 सितंबर को तय कर ली गई थी, लेकिन अखिलेश की चतुराई से ऐसा हो नहीं सका। अन्यथा अखिलेश के लिये बड़ी मुश्किल खडी हो जाती।

मुलायम ने तो शिवपाल की सियासत पर ग्रहण लगा दिया!

अजय कुमार, लखनऊ


सियासत भी अबूझ पहेली जैसी है। यहां रिश्तों की अहमियत नहीं होती है ओर दोस्ती-दुश्मनी की परिभाषा बदलती रहती है। सियासत के बाजार जो दिखता है वह बिकता नहीं है और जो बिकता है वह दिखता नहीं है। इसी लिये समाजवादी पार्टी में बाप-बेटे के बीच के  झगड़ों को कोई गंभीरता से ले रहा है। तमाम लोंगो को तो लगता है कि दिग्गज मुलायम अपने बेटे अखिलेश के सियासी सफर को आसान बनाने के लिये एक तय स्क्रिप्ट पर काम कर रहे है, जिसमें भाई शिवपाल यादव की ‘सियासी आहूति’ दी जा रही है।

गोरखपुर से ‘योगी के बाद कौन’ की चर्चा गरम

अजय कुमार, लखनऊ
उत्तराखंड के एक युवा अजय सिंह बिष्ट के योगी आदित्यनाथ बनने तक का सफर अगर करीब से किसी ने देखा है तो उसमें पहला नाम गोरखपुर का आता है। यहीं से उनके पहले सन्यासी और उसके बाद सियासी जीवन की शुरूआत हुई थी। 1993 में पढ़ाई के दौरान गुरु गोरखनाथ पर शोध करने गोरखपुर पहुंचे अजय बिष्ट यहां अपने प्रवास के दौरान महंत अवैद्यनाथ के संपर्क में आए और कुछ समय के भीतर ह ीवह महंत अवैद्यनाथ की शरण में ही चले गए। महंत अवैद्यनाथ से  दीक्षा लेने के बाद 1994 में अजय बिष्ट पूर्ण संन्यासी बन गए, जिसके बाद इनका नाम अजय सिंह बिष्ट से योगी आदित्यनाथ हो गया।

नौकरशाही ने खूब कराई योगी सरकार की किरकिरी

अजय कुमार, लखनऊ

उत्तर प्रदेश की योगी सरकार का छह माह का कार्यकाल पूरा हो चुका है। प्रदेश की जनता पहली बार एक संत की सत्ता का अनुभव प्राप्त हासिल रही हैं। संत की सत्ता के कई अच्छे पहलू हैं तो कुछ खामियां भी नजर आ रही है। पिछली सरकारों के मुकाबले इस सरकार के कामकाज का तरीका काफी बदला-बदला है। विकास का प्राथमिकता दी जा रही है। भयमुक्त प्रदेश बनाने के लिये अपराधियों से सख्ती से निपटा जा रहा है।

मोदी राज में भी महंगाई डायन बनी हुई है!

अजय कुमार, लखनऊ
2014 के लोकसभा चुनाव समय बीजेपी के प्रधानमंत्री पद के दावेदार नरेन्द्र मोदी ने तत्कालीन यूपीए की मनमोहन सरकार के खिलाफ मंहगाई को बड़ा मुद्दा बनाया था। चुनाव प्रचार के दौरान सबसे पहले हिमाचल प्रदेश की रैली में महंगाई का मुद्दा छेड़कर मोदी ने आम जनता की नब्ज टटोली थी। मंहगाई की मार झेल रही जनता को मोदी ने महंगाई के मोर्चे पर अच्छे दिन लाने का भरोसा दिलाया तो मतदाताओे ने मोदी की झोली वोटों से भर दी। आम चुनाव में दस वर्ष पुरानी यूपीए सरकार को जड़ से उखाड़ फेंकने में मंहगाई फैक्टर सबसे मोदी का सबसे कारगर ‘हथियार’ साबित हुआ था, लेकिन आज करीब साढ़े तीन वर्षो के बाद भी मंहगाई डायन ही बनी हुई है।

मुलायम सिंह यादव ने अपने तीन पुराने पत्रकार मित्रों को चाय पर बुलाया

Ajai Kumar : आज “नेताजी” मुलायम सिंह ने पुराने पत्रकार मित्रों को चाय पर बुलाया। श्री वीरेंद्र सक्सेना, प्रमोद गोस्वामी और मैं। लगभग एक घंटे तक तमाम नई – पुरानी बातें हुईं। वर्तमान राजनीति पर चर्चा हुई।

गठबंधन की कोशिशों पर बहनजी का ग्रहण, माया के एक दांव से ढेर सारे धुरंधर हुए धराशायी

अजय कुमार, लखनऊ

बिहार की सत्ता से बेदखल होने के बाद लालू एंड फेमली जख्मी शेर की तरह दहाड़ रही है। उसको सपनों में भी मोदी-नीतीश दिखाई देते हैं। नीतीश के मुंह फेरने से लालू के दोनों बेटे आसमान से जमीन पर आ गिरे। सत्ता का सुख तो जाता रहा ही, सीबीआई भी बेनामी सम्पति मामले में लालू परिवार के पीछे हाथ धोकर पड़ गई है। ऐसे में लालू का तमतमा जाना बनता है। चारा घोटाले में सजायाफ्ता लालू यादव ने बिहार खोया तो उत्तर प्रदेश में अखिलेश, मायावती और कांग्रेस के सहारे वह मोदी को पटकनी देने की राह तलाशने में लग गये। वैसे भी लालू लम्बे समय से उत्तर प्रदेश में बीजेपी के खिलाफ महागठबंधन की वकालत करते रहे हैं।

अयोध्या विवाद पर अंतिम फैसले की घड़ी!

अजय कुमार, लखनऊ

अयोध्या विवाद (बाबरी मस्जिद-रामजन्मभूमि विवाद) फिर सुर्खिंया बटोर रहा है। देश की सर्वोच्च अदालत कल (11 अगस्त 2017) से इस एतिहासिक विवाद का हल निकालने के लिये नियमित सुनवाई करने जा रही है। अदालत जो भी फैसला करेगा उसे दोंनो ही पक्षों को मानना होगा, लेकिन देश में मोदी और प्रदेश में योगी सरकार बनने के बाद ऐसा लगने लगा है कि अब इस मसले पर सियासत बंद होगी और कोई फैसला सामने आयेगा। उक्त विवाद करोड़ों हिन्दुओं की आस्था से जुड़ा हुआ मसला है तो कुछ मुस्लिम संगठन इस पर अपनी दावेदारी ठोेक रहे हैं। करीब पांच सौ वर्ष पुराने इस विवाद ने कई उतार-चढ़ाव देखे हैं।

भारत के न्यूज चैनल पैसा कमाने और दलगत निष्ठा दिखाने के चक्कर में सही-गलत का पैमाना भूल चुके हैं : अजय कुमार

: इलेक्ट्रानिक न्यूज चैनलों का ‘शोर’ : टेलीविजन रेटिंग प्वांइट(टीआरपी) बढ़ाने की चाहत में निजी इलेक्ट्रानिक न्यूज चैनल अपनी साख खोते जा रहे हैं। समाचार सुनने के लिये जब आम आदमी इन चैंनलों का बटन दबा है तो उसे यह अहसास होने में देरी नहीं लगती कि यह चैनल समाचार प्रेषण की बजाये ध्वनि प्रदूषण यंत्र और विज्ञापन बटोरने का माध्यम बन कर रह गये हैं। इन चैनलों पर समाचार या फिर बहस के नाम पर जो कुछ दिखाया सुनाया जाता है, उससे तो यही लगता है कि यह चैनल न्यूज से अधिक  सनसनी फैलाने में विश्वास रखते हैं।