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मजीठिया : अब आया ऊंट पहाड़ के नीचे

लोगों का माननीय है भगवान के घर देर है अंथेर नहीं। हम डाक्टर और अदालत की शरण में जाते हैं तो एक तरह से उन्हें भगवान मानकर। पत्रकारों के लिए गठित वेज बोर्ड के मामले में अदालत और उसकी कार्यवाही भी कदम-कदम पर हम पत्रकारों के पक्ष में रही। मालिकानों ने सारे घोड़े खोल डाले लेकिन हर सुनवाई में हर तारीख में उन्हें और उनके वकीलों को मुंहकी खानी पड़ी है। अखबार मालिकों ने घाघ वकीलों की फौज खड़ी कर रखी थी।

लोगों का माननीय है भगवान के घर देर है अंथेर नहीं। हम डाक्टर और अदालत की शरण में जाते हैं तो एक तरह से उन्हें भगवान मानकर। पत्रकारों के लिए गठित वेज बोर्ड के मामले में अदालत और उसकी कार्यवाही भी कदम-कदम पर हम पत्रकारों के पक्ष में रही। मालिकानों ने सारे घोड़े खोल डाले लेकिन हर सुनवाई में हर तारीख में उन्हें और उनके वकीलों को मुंहकी खानी पड़ी है। अखबार मालिकों ने घाघ वकीलों की फौज खड़ी कर रखी थी।

मजीठिया मामले में उत्तराखंड सरकार अपने बडे़ भाई उत्तर प्रदेश से दो कदम आगे रहा है। कुछ प्रदेश की सरकारों ने खानापूरी के लिए ही सही, अखबारों को नोटिस दिया, निरीक्षण कियाा, अधिसूचना जारी की। महाराष्ट्र सरकार ने दावे के भुगतान के लिए क्लेम फार्म जारी किया लेकिन अपने को देवभूमि कहने वाली उत्तराखंड सरकार के श्रम विभाग ने तो कुछ भी नहीं किया। इसी का नतीजा है लेबर कमिश्नर के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट द्वारा गिरफ्तारी का वारंट जारी होना।

गौरतलब है कि अपने मामले में मैं खुद क्लेम फार्म मांगने श्रम विभाग गया और एक जिम्मेदार अधिकारी का ध्यान जब इस ओर दिलाया कि प्रगति रिपोर्ट न सौंपने पर प्रदेश के मुख्य / प्रमुख सचिव को कोर्ट-कचहरी में तलब होना पड़ेगा, तब इस अधिकारी ने बात को बड़े हल्के में लिया। हो सकता है कि उसका अनुमान रहा हो कि हम या हमारे विभाग का तो कोई तलब होना नहीं। बहरहाल, श्रम विभाग मजीठिया को लेकर शुरू से कितना उदासीन रहा इसका अंदाजा सूचना के अधिकार अधिनियम के तहत ली गई कुछ जानकारी से लगाया जा सकता है।

२-९-२०१४ को एक आरटीआई कार्यकर्ता को पत्रक संख्या ४६६९/दे.दून-सू.अधि.अधि./नि.प.-६१/२०१४दिनांक-२-९-१४ में विभाग ने बताया कि वेज बोर्ड की संस्तुतियों के कार्यान्वयन की प्रगति के अनुश्रवण के लिए प्रदेश के दोनों मंडलों (जब दो मंडल हैं तब यह हाल है, यूपी की तरह दर्जनों होते तो क्या होता) में विशेष प्रकोष्ठों का गठन किया गया है। कुमायूं मंडल में उप श्रमायुक्त हल्द्वानी अध्यक्ष, सहायक श्रम आयुक्त ऊधम. सिंह नगर सदस्य तथा श्रम प्रवर्तन अधिकारी हल्द्वानी सदस्य बनाए गए हैं।

इसी तरह गढ़वाली मंडल में उप श्रम आयुक्त गढ़वाली क्षेत्र देहरादून अध्यक्ष, सहा. श्रम आयुक्त देहरादून सदस्य तथा सहायक श्रम आयुक्त हल्द्वानी को सदस्य बनाया गया। इसी पत्रक में यह भी बताया गया कि प्रगति की समीक्षा साप्ताहिक आधार पर की जाएगी। तद विषयक रिपोर्ट श्रम आयुक्त उत्तराखंड को सप्ताह की समाप्ति के तीन दिन के अंदर अनिवार्य रूप से प्रस्तुत की जाएगी।

अब साप्ताहिक समीक्षा की कितनी रिपोर्ट सप्ताह की समाप्ति के तीन दिन के भीतर अनिवार्य रूप से भेजी गई, यह तो अभी नहीं मालूम लेकिन कितनी बैठक हुई और उस में क्या हुआ, इस पर भी एक नजर डाल लें। २३-०८-२०१४, ३०-०८-१४ व ०४-१०-१४ को बैठक हुई। पहली बैठक में सामान्य चर्चा हुई। दूसरी बैठक स्मरण पत्र जारी करने के साथ स्थगित हो गई। तीसरी बैठक में पत्र-प्रतिष्ठानों को बुलाया जाए व उन बिंदुओ पर चर्चा किया जाए का फैसला लेते हुए बैठक स्थगित कर दी गई। बताते चलें कि सभी बैठकों की कार्रवाई एक ही कागज पर और एक ही हैंडराइटिंग में है। शायद एक ही दिन में तैयार की गई है।

यही नहीं, राजधानी देहरादून के श्रम विभाग ने तो अमर उजाला, दैनिक जागरण और हिंदुस्तान अखबार में वेज बोर्ड को कागजों में लागू भी करा दिया है। लागू कराने की सूचना भी २-९-१४ के अपने पत्र में दी है। जानकारी तो दी लेकिन कई लोगों द्वारा कई बार किये गए पत्र व्यवहार की सत्यापित प्रति नहीं उपलब्ध करायी।

मित्रों, इस बार भी सुनहरा अवसर है। वारंट जारी होना वो भी श्रम आयुक्त के खिलाफ कोई हंसी ठट्ठा नही है।  जारी होना ही पर्याप्त संदेश देता है कि यही हाल रहा तो आगे गिरफ्तार हो जाएगी। जो साथी क्लेम तैयार न करा पाये हों वे चार्टर्ड एकाउंटेंट से तैयार कराएं और क्लेम करें। चार्टर्ड एकाउंटेंट और क्लेम के बारे में ज्यादा जानकारी के लिए मुझे फोन कर सकते हैं।

अरुण श्रीवास्तव
पत्रकार एवं आरटीआई कार्यकर्ता
देहरादून
९४५८१४८१९४

मूल खबर….

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1 Comment

1 Comment

  1. vandana

    August 25, 2016 at 5:16 am

    वाराणसी के लेबर कमिशनर ने भी अमर उजाला से 200000 रूपये खा कर सुप्रीम कोट के फैसले की धज्जियां उड़ा दी।

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