आपको शायद यह आसान लगे… लेकिन अखबारी दुनिया में काम करने वाले जानते हैं… कि एक अखबार का संपादक होने के मायने क्या होते हैं… असल वाले तो विलुप्त ही हो गए… कुर्सी वाले भी अब तलाशे नहीं मिलते… ऐसे में एक फोटोग्राफर वहां तक पहुंच जाए… यह किसी चमत्कार से कम नहीं… और प्रभात सिंह ने यह चमत्कार कर दिया था… सालों पहले…
विनीत कुमार सिंह-
चलो… लौट चलें घाट की ओर…
प्रभात सिंह… एक बार फिर चर्चाओं में हैं। हमेशा की तरह। देश और दुनिया में उनकी तूती बोल रही है….। प्रभात सिंह की चर्चाओं के लिए इस बार जिम्मेदार हैं विख्यात लेखिका अरुंधति रॉय… और उनकी किताब ‘मदर मैरी कम्स टू मी’। इस किताब का 45 भाषाओं में अनुवाद हुआ है और ‘मेरी माँ मेरी गैंगस्टर’ नाम से छपा हिंदी अनुवाद हर किसी की जुबान पर है। हिंदी अनुवादक हैं प्रभात सिंह।
कुछ लोगों के लिए एक सवाल हो सकते हैं प्रभात सिंह…। कि, आखिर वह हैं कौन… कोई अनुवादक… लेखक या कुछ और…। दरअसल, प्रभात सिंह को पकड़ पाना ठीक पानी को छलनी में छानने जैसा ही है। किताबी चर्चाओं का दौर है तो ज्यादातर लोग उनका परिचय मार्क टुली के कहानी संग्रह और रस्किन बॉन्ड की आत्मकथा का हिंदी अनुवादक बताएंगे। कुछ और जानने वाले थारू जनजाति पर एक मोनोग्राफ़, कुंभ के मेले पर एक किताब लिखने कुछ फोटो खींचने वाला कहेंगे…। कुछ और करीब से जानने वाले अख़बारनवीस, अरसे तक अमर उजाला का संपादक रहा शख्स और इन दिनों संवाद न्यूज़ के संपादक के तौर पर उनका तार्रुफ करवाएंगे।
दरअसल मैं जिस प्रभात सिंह को जानता हूं उन्हें एक चितेरा कहूंगा…। आत्मा में उतर जाने वाला शख्स। एक कलाकार….। धड़कन…।
बरेली मेरी आत्मा में बसी है… या कहूं कि आज जो भी हूं वो बरेली ही है…। उसी बरेली में बसी तमाम महान शख्सियतों में से एक हैं प्रभात सिंह। दर्जनों नाम तैर जाते हैं जुबान पर बरेली का नाम आते ही, लेकिन आज बात सिर्फ प्रभात सिंह और उनकी बरेली की।
प्रभात सिंह… मेरे जेहन में इन दो शब्दों के उभरते ही जो पहली छवि उतरती है वह है… एक कालजयी फोटोग्राफर की…. इसके बाद एक फोटोग्राफर से हिंदी भाषी अखबार के संपादक तक का उनका सफर… आज के दौर में तो संपादक पुरातन व्यवस्था का एक शब्द भर रह गया है…। उस पर भी एक बड़े हिंदी भाषी अखबार का संपादक बनना… फोटोग्राफर होकर भी… उनके प्रति मेरे सम्मान की पहली वजह बना…।
आपको शायद यह आसान लगे… लेकिन अखबारी दुनिया में काम करने वाले जानते हैं… कि एक अखबार का संपादक होने के मायने क्या होते हैं… असल वाले तो विलुप्त ही हो गए… कुर्सी वाले भी अब तलाशे नहीं मिलते… ऐसे में एक फोटोग्राफर वहां तक पहुंच जाए… यह किसी चमत्कार से कम नहीं… और प्रभात सिंह ने यह चमत्कार कर दिया था… सालों पहले…।
मैंने उनका अखबार छोड़ना भी देखा है… सुना है… समझा है और फिर संवाद जैसी एजेंसी खड़ी करना भी…। तमाम लोगों को उनका यह कौशल प्रभावी करता हो, लेकिन मैं इससे रत्ती भर प्रभावित नहीं हुआ… क्योंकि यह आपके व्यवसायिक कौशल की उपलब्धता दर्शाता है और मैं जिस प्रभात सिंह से प्रभावित हुआ… बड़ा भाई माना वह… यह था ही नहीं…।
वह तो था… जनजातियों… जंगलों…वीरानों…लेखकों…किस्सों…कहानियों…के पीछे भटकने वाला प्रभात सिंह…. वो प्रभात सिंह जो सांसें तलाशता था… वो प्रभात सिंह जो आत्माएं काबू करता… वो प्रभात सिंह जो धड़कनें उकेरता… वो प्रभात सिंह जो खुद खामोश रहता और उसका काम बोलता…।
मुखौटे के पीछे खड़े प्रभात सिंह की तस्वीर आज भी मेरी उनकी सबसे पसंदीदा तस्वीरों में से एक है… अखबार के दफ्तर में कुर्सी पर बैठे प्रभात सिंह से मैं कभी नहीं मिला… मुझे वह विंडमेयर के अंधेरे में ही भाए…।
कुल मिलाकर आसान नहीं होता प्रभात सिंह होना…. उसके लिए आपको अपनी चाहतों की चादर पर इच्छाओं की कैंचियां चलानी पड़ती हैं। भयावह शोर में भी खुद को खामोश करना और किसी बिलखती धड़कन को सुनने महसूस करने के लिए संयमित करना होता है…। रोज डूबना…रोज उबरना पड़ता है…। सन्यासी सरीखा है… प्रभात सिंह होना…।
मेरा सौभाग्य है… कि मैंने अपने जीवन में ऐसे लोग भी देखे हैं…। कुछ बेहद निजी और खास वक्त गुजारा है उनके साथ.. जीए हैं कुछ पल उनके सानिध्य में… छाया में।
प्रभात भैया… बधाई आपको बहुत-बहुत… बधाई। हमेशा की तरह इस बार भी दूर हूं… आपसे…। लेकिन, महसूस कर पा रहा हूं… उस खुशी… उस संतुष्टि को… अरुंधति राय का तो मुझे नहीं पता कि उनकी मां उनके लिए क्या थीं… लेकिन इतना जरूर पता है कि अपना भाई… भी इरादों का “गैंगस्टर” है।
लोगों से बस इतना ही कहना चाहूंगा कि कभी मिलें वो प्रभात सिंह से तो उनकी उपलब्धियों पर तो रत्ती भर भी चर्चा न करें… कुछ हासिल करने की आकांक्षा से जा रहे हों तो सिर्फ एक ही इच्छा रखिए… उनके दर्शन को समझने और महसूस करने की…। वो समझ आ गया तो समझ लीजिए… तमाम यात्राएं उसी क्षण पूरी हो जाएंगी। तमाम तृष्णाएं भी निपट जाएंगी बिना वक्त गंवाए।
बचे रह जाएंगे तो सिर्फ और सिर्फ आप… ठीक वैसे ही… जैसे गंगा में डुबकी लगाने के बाद कोई लौटता है घाट की ओर….।


