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प्रेमचंद को हिंदी का संस्कार आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने सिखाया!

नयी दिल्ली।  “प्रेमचंद मूल रूप से उर्दू के लेखक थे, उन्हें हिंदी के संस्कार सिखाने वाले आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ही थे। हिंदी भाषा को मानक रूप देने में आचार्य द्विवेदी का महत्वपूर्ण योगदान रहा और उन्होंने ही प्रेमचंद के बलिदान और पंच परमेश्वर का संशोधन किया था। आचार्य द्विवेदी ने एक-एक पंक्ति में बारह से चौदह तक संशोधन किए और कई वाक्यों में क्रिया समेत पूरा विशेषण ही बदल दिया। कहा जा सकता है कि आचार्य द्विवेदी ने उर्दू से हिंदी में आ रहे लेखक प्रेमचंद को हिंदी के संस्कार देने में बहुत बड़ा योगदान दिया। लेकिन आज का हिंदी समाज अपने मूर्धन्य लेखकों के प्रति उदासीन है जो बेहद दुखद स्थिति है।

नयी दिल्ली।  “प्रेमचंद मूल रूप से उर्दू के लेखक थे, उन्हें हिंदी के संस्कार सिखाने वाले आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ही थे। हिंदी भाषा को मानक रूप देने में आचार्य द्विवेदी का महत्वपूर्ण योगदान रहा और उन्होंने ही प्रेमचंद के बलिदान और पंच परमेश्वर का संशोधन किया था। आचार्य द्विवेदी ने एक-एक पंक्ति में बारह से चौदह तक संशोधन किए और कई वाक्यों में क्रिया समेत पूरा विशेषण ही बदल दिया। कहा जा सकता है कि आचार्य द्विवेदी ने उर्दू से हिंदी में आ रहे लेखक प्रेमचंद को हिंदी के संस्कार देने में बहुत बड़ा योगदान दिया। लेकिन आज का हिंदी समाज अपने मूर्धन्य लेखकों के प्रति उदासीन है जो बेहद दुखद स्थिति है।

हिंदी के विकास का दावा करने वाले और लाखों रुपए का वेतन लेने वाले तमाम प्रोफ़ेसर स्वयं पढ़ते लिखते नहीं हैं। ” यह उद्गार थे केंद्रीय हिंदी संस्थान के उपाध्यक्ष डॉ. कमल किशोर गोयनका के जो आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी की 153 वीं जयंती के उपलक्ष्य में दिल्ली के गांधी शांति प्रतिष्ठान में आयोजित सम्मान समारोह में  मुख्य अतिथि के रूप में बोल रहे थे । राइटर्स एंड जर्नलिस्ट एसोसिएशन (वाजा) दिल्ली और आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी राष्ट्रीय स्मारक समिति, रायबरेली के संयुक्त तत्वाधान में आयोजित इस समारोह की अध्यक्षता प्रख्यात लेखक दिनेश कुमार शुक्ल ने की जबकि जाने माने लेखक प्रेमपाल शर्मा विशिष्ट अतिथि थे।

समारोह का प्रारंभ आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी राष्ट्रीय स्मारक समिति के संयोजक गौरव अवस्थी द्वारा संस्था और आयोजन कि विस्त्रत रूपरेखा प्रस्तुति से हुआ। वहीं प्रेमपाल शर्मा ने कहा कि आज देश में अपनी भाषा, अपने साहित्य को नयी पीढ़ी तक पहुँचाने के लिए सुगठित पुस्तकालय आन्दोलन की आवश्यकता है। मुख्य अतिथि श्री गोयनका ने कहा कि प्रेमचंद के निर्माण में आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी का बहुत बड़ा योगदान था। प्रेमचंद ने उन पर दो संस्मरण भी लिखे हैं। प्रेमचंद ने पंचों में ईश्वर शीर्षक के साथ जो कहानी आचार्य द्विवेदी को प्रकाशित करने को भेजी थी, वह पंच परमेश्वर नाम से छपी। द्विवेदी जी ने नाम बदल कर कहानी में जो चमक पैदा की वो अद्भुत था।

भोपाल से पधारे प्रख्यात पत्रकार पद्मश्री विजय दत्त श्रीधर ने मौजूदा दौर में पत्रकारिता की दुर्दशा के लिए कुछ हद तक पाठकों को भी जिम्मेदार बताया। उनका कहना था कि बाज़ार हर दौर में समाज का हिस्सा रहा है, लेकिन बाज़ार को सहायक या सेवक रहना चाहिए न कि शासक। उन्होंने कहा कि पाठक को अपनी भूमिका निभाते हुए घटिया सामग्री को अस्वीकार करना शुरू करना होगा, तभी समाचार पत्रों की सामग्री, भाषा अदि का परिष्करण संभव है।

कार्यक्रम में आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी स्मृति राष्ट्रीय पुरस्कार से सप्रे संग्रहालय, भोपाल के संस्थापक पद्मश्री विजयदत्त श्रीधर को सम्मानित किया गया।  उनके द्वारा स्थापित और संचालित सप्रे संग्रहालय विश्व का अपने तरीके का अनूठा प्रयोग है। वहीं मामा बालेश्वर स्मृति पुरस्कार से सम्मानित हापुड़ के समाजिक कार्यकर्ता कर्मवीर लम्बे समय से किसानों और जमीनी मुद्दों पर संघर्षरत हैं। अनुपम मिश्र स्मृति पर्यावरण पुरस्कार पाने वाले  दिल्ली के वरिष्ठ पत्रकार पंकज चतुर्वेदी बीते तीन दशकों से जल, विशेष तौर पर पारंपरिक तालाबों के लिए काम कर रहे हैं और उनके प्रयासों से उत्तर प्रदेश में तालाब विकास प्राधिकरण का गठन होने जा रहा है। अरविंद घोष स्मृति पुरस्कार से सम्मानित दैनिक जागरण के विशेष संवाददाता संजय सिंह करीब ढाई दशकों से सामजिक सरोकारों के साथ परिवहन क्षेत्र पर बेहतरीन काम  लिए जाने जाते हैं। आज पटरियों पर दौड़ रही “गरीब रथ” ट्रेन के चलने में भी उऩका योगदान रहा है। वहीं सामाजिक सरोकारो के साथ तेज़ाब पीड़ित लड़कियों के लिए सतत लेखन करने वाली सुश्री प्रतिभा ज्योति को कंचना स्मृति पुरस्कार से सम्मानित किया गया। वहीं हिंदी और अंग्रेजी दोनों पत्रकारिता में अपने सकारात्मक रुख और निष्पक्ष नज़रिए के लिए विवेक शुक्ल को देवेन्द्र उपाध्याय स्मृति सम्मान प्रदान किया गया। रमई काका सम्मान अवधी के प्रख्यात कवि आचार्य सूर्यप्रकाश शर्मा “निशिहर” को दिया गया।

अध्यक्षीय आसंदी से श्री दिनेश कुमार शुक्ल ने कहा कि आचार्य जी केवल हिंदी ही नहीं , भारतीय साहित्य के मार्गदर्शक थे और उस दौर के के कई लेखकों को उनका मार्गदर्शन मिला।  भावी योजना पर प्रकाश डालने के साथ समारोह का संचालन राइटर्स एंड जर्नलिस्ट एसोसिएशन दिल्ली के अध्यक्ष अरविन्द कुमार सिंह ने किया। धन्यवाद ज्ञान वाजा के महासचिव शिवेंद्र प्रकाश द्विवेदी ने किया।

समारोह में वरिष्ठ पत्रकार अवधेश कुमार, सदानंद पांडेय, गोपाल गोयल, टिल्लन रिछारिया, अरुण तिवारी, राकेश पांडेय, अरविंद विद्रोही, फजल इमाम मलिक, नलिन चौहान, आशुतोष कुमार सिंह, एसएस डोगरा,चित्रा फुलोरिया, सविता आनंद, अलका सिंह, देवेंद्र सिंह राजपूत, जाने माने किसान नेता नरेश सिरोही, वेक्टस समूह की निदेशक सारिका बाहेती, कृषि वैज्ञानिक प्रो.एन.के. सिंह और विभिन्न क्षेत्रों के जाने माने लोग मौजूद थे। समारोह में रायबरेली से भी विभिन्न क्षेत्रों के लोग पहुंचे थे।

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