नितिन त्रिपाठी-
सफलता के सौ बाप होते हैं, असफलता अनाथ होती है.
अब कुछ दिन एनालिसिस होगी और हर व्यक्ति अपने अपने चश्मे से भाजपा की कम सीटों के ज़िम्मेदार कारक बताएगा.
कॉमन कारण घमंड, ऑथरीटेटिव एटीट्यूड, अपने कोर वोटर की अनदेखी आदि आदि बताये जाएँगे. हक़ीक़त में ये सब मौक़े पर चौका मारने वाली बातें हैं. अगर इनमें कोई भी कारण होते तो up के बग़ल में मध्य प्रदेश में सौ प्रतिशत सीट नहीं आती. मोदी सरकार ने काम सबसे ज्यादा यूपी में किया, हवाई अड्डे, एक्सप्रेस वे, वाराणसी मंदिर, अयोध्या भव्य नगरी जैसे मुद्दों पर पूरे देश में वोट मिले शिवाय यूपी हरियाणा के.
तो ऐसा नहीं है कि सरकार की कोई पालिसी गड़बड़ थी. वो होती तो इतनी सीटें न आतीं. सरकार की पालिसी पूरे देश के लिए एक जैसी थी. इसी पालिसी ने दिल्ली, एमपी, गुजरात, कर्नाटक, उड़ीसा में बम्पर सफलता दिलायी. बस ये दो तीन प्रदेश संभल जाते 2019 से बेटर जीत थी.
अंतर केवल एक है स्थानीय भाजपा इन दो तीन प्रदेशों में अपनी उपलब्धियां जनता को समझा नहीं पाई. जनता के पास चुनाव के वक्त विकल्प होता है उसे दूसरा पक्ष अच्छे से समझा ले गया, भाजपा नहीं समझा पाई. स्थानीय नेतृत्व और संगठन. सुपर फेल रहा मोदी सरकार के विजन, उपलब्धियों को अंत तक समझा पाने में. यदि हिन्दू वादी राजनीति जातीय राजनीति के आगे ढेर हुई तो कहीं न कहीं यह वर्तमान स्थानीय नेतृत्व और संगठन को देखना है कि ऐसा क्या है कि 2014 से 2019 तक समझा ले गये तीन चुनावों में और फिर इसके बाद नहीं समझा पा रहे हैं. ऐसा क्या है कि शेष भारत समझ / समझा रहा है, पर आप अपने प्रदेश में नहीं समझा पा रहे हो.
बस इस कारण की समीक्षा कर बेहतर कर लिया जाये यही एकमात्र अंतर है यूपी और अन्य प्रदेशों में.
अनिल सिंह-
यह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हार नहीं है! यह उस मीडिया जनित चाणक्य की हार है, जिसने सत्ता के अहंकार में बंसल के निर्देशन में उत्तर प्रदेश में उम्मीदवार तय किये थे! प्रदेश की जनता को मूर्ख समझा! बंगाल, तेलंगाना में चाणक्यगिरी नहीं चली, फिर भी अहंकार था कि कम ना हुआ!
एक उदाहरण! चंदौली की जनता अपने सांसद से बेहद नाराज थी, इसकी रिपोर्ट भी पार्टी के पास थी, लेकिन उम्मीदवार बदलने की बजाय चाणक्य और उनके चिंटू ने प्रत्याशी नहीं बदला, नतीजा सामने है! ऐसा दर्जनों सीटों पर हुआ! मोदी को विपक्ष से नहीं अपने इन्हीं उम्मीदवारों से लड़ना पड़ा!
दूसरे, हिंदुत्व के नाम पर जनता से वोट मांगने के बाद हिस्सेदारी देने की बात आई तो गुजरात-राजस्थान कंपनी ने काबिल, जनता से जुड़े नेताओं, अपने कार्यकर्ताओं को लाभ देने की बजाय जातीय आधार पर तमाम तरह के लाभ लेकर बाहर से आने वालों को कुर्सी दी! तो फिर जातियों ने लंका लगा दी!


