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सुख-दुख

टेस्टोस्टेरोन का स्तर कम हो रहा है और जीवन निरर्थक लग रहा है!

दिनेश श्रीनेत-

यदि आप 55-60 की उम्र पार कर चुके हैं, जीवन में जी भरकर सारे अच्छे बुरे काम किए, कभी सोचा ही नहीं कि जो कर रहे हैं किसलिए कर रहे हैं? क्यों कर रहे हैं? तो अचानक धर्म-आध्यात्म में रुचि वास्तव में किसी सार्थक जवाब की तलाश न होकर ‘केमिकल लोचा’ भर है. टेस्टोस्टेरोन का स्तर कम हो रहा है और जीवन आपको निरर्थक लग रहा है.

सच्ची जिज्ञासा तो तब हो जब आपने 29 वर्ष की उम्र में बुद्ध की तरह घर छोड़ा हो. एक उम्र के बाद जब सेक्स जीवन के केंद्र में नहीं रह जाता, कामकाज में भी नई ऊर्जा के साथ आए युवा आपकी जगह लेने लगते हैं तो आम भारतीय गृहस्थ भक्ति भाव में डूबने लगता है. सुबह शाम दो-दो घंटा मंदिर के आगे बैठने लगेगा. या तो ऐसा करके वह अपनी इंपार्टेंस दिखाना चाहता है या फिर शैलेंद्र के शब्दों में ‘बुढ़ापा देखकर रोया’ वाली स्थिति को प्राप्त हो जाता है.

बहुत प्रामाणिक ऑब्जर्वेशन तो नहीं है मगर मैंने पाया है कि पश्चिमी देशों के बुजुर्ग इस उम्र में आने पर ज्यादातर वक्त अपने शौक वाले कामों में बिताते हैं. जैसे बागवानी, छोटे बच्चों को कुछ बताना-समझाना, फोटोग्राफी या फिर कुछ ऐसा हुनर सीखना जिसे जीवन भर दूसरे कामों में व्यस्त होने के कारण नहीं हासिल कर पाए थे.

यूरोपियन देशों में एक बड़ी पीढ़ी बुजुर्ग हो चली है, मगर उनका जीवन के प्रति नज़रिया बहुत अलग है. पश्चिमी दुनिया से आए अधिकतर टूरिस्ट 50 पार के ज्यादा दिखेंगे युवा कम. मुझे याद है कि जिन दिनों मोबाइल नहीं था तब भी भारत के तमाम इलाकों में हाथ में बड़े-बड़े मैप लिए, गले में कैमरा लटकाए, 60-70 वर्ष तक के कपल सड़कों पर घूमते मिल जाते. वे बच्चों जैसे उत्साह से जीव-जंतुओं, जंगल, पहाड़ और आर्किटेक्चर को देखा करते हैं. ऐसा लगता है कि वे जीवन का एक-एक पल जी लेना चाहते हैं, न कि जीवन के प्रति उदासीन होकर किसी अन्य ‘हाइपोथेटिकल संसार’ (परलोक आदि) के बारे में सोचते हैं.

दर्शन जीवन का एक पक्ष है. मैं कौन हूँ? इस संसार में क्यों आया हूँ? मेरे जीने का मकसद क्या है? यह सवाल तो एक बच्चे या य़ुवा के मन में उठना चाहिए… जब आप जीवन का बड़ा हिस्सा जी चुके तो ‘मेरे जीवन का अर्थ क्या है’ ये जानकर क्या करेंगे?

सहज जिज्ञासा हो तो स्वागत है मगर ज्यादातर मिडिल क्लास हिंदुस्तानियों के लिए यह अपने दोहरे चरित्र को छुपाने का आसान तरीका है. सारा जीवन झूठ बोला, मक्कारी की, रिश्वत खाई, खुद के आगे किसी को कुछ समझा नहीं और जब लगा कि अब मैं पहले की तरह प्रासंगिक नहीं रह गया तो खुद का आदरणीय बनाए रखने का स्वांग शुरु हो गया. रातों-रात सर्वभक्षी से शाकाहारी हो गए. जवानी में मां-बाप के पास फटकते नहीं, अचानक से अपने पुरखों की याद आने लगी, नए तौर-तरीकों को शक की नज़र से देखने लगे.

मैं सोचा करता था कि पिछली पीढ़ी के मुकाबले मेरी पीढ़ी के लोग बेहतर अभिभावक और ज्यादा जागरूक वरिष्ठ नागरिक साबित होंगे, मगर वे पिछली पीढ़ी से ज्यादा मूढ़ साबित हो रहे हैं.

मेरे समय की प्रेम विवाह करने वाली कन्याएं, जो अब अम्माएं बन चुकी हैं, प्रेम विवाह के नाम मरखनी गाय की तरह बिदकती हैं. अपने दौर के आवारा पिताजी अपनी कन्याओं पर खुद के पिताओं और चाचाओं से ज्यादा कड़ी नज़र रखते हैं.

इतना ही नहीं, अभी इस दौर के हाथ में मोबाइल लिए वो माता-पिता जिनके बच्चे थोड़े छोटे हैं, पुराने माता-पिताओं से ज्यादा डॉमिनेटिंग साबित हो रहे हैं. गनीमत है नई टेक्नोलॉजी और अर्थव्यवस्था ने इस पीढ़ी को आजाद रहने के अनगिनत रास्ते दिए हैं.

जिस तरह पुराना सब कुछ अच्छा ही था एक मूर्खतापूर्ण धारणा है, उसी तरह से मौजूदा पीढ़ी पिछली से ज्यादा समझदार, प्रगतिशील और प्रबुद्ध है, इसका सामान्यीकरण करना दूसरी बड़ी मूर्खता है. देखें तो भारतीय मध्यवर्ग में पिछले 20-30 सालों में ढपोरशंखों की ऐतिहासिक बाढ़ आई है.

निर्मल ने एक साक्षात्कार में कहा था कि वे समाज में वयस्कता के सर्वसत्तावादी स्वरूप से असहमत हैं. ऐसे समाज में बुजुर्ग और बच्चे हाशिये पर रहते हैं. इसलिए भारत के मिडिल क्लास के लिए अधेड़ उम्र पार करने का मतलब है किसी फ्रस्टेशन में जीना या पाखंडी बन जाना.

हमारे समाज में अनावश्यक आदर भी बुजुर्गों को हाशिये पर धकेल देता है. वे अगर अपने तरीके से जीना भी चाहें तो सामाजिक अपेक्षाओं के चलते जी नहीं सकते.

जैसे नए-नए किशोर को सतर्क रहना पड़ता है कि कोई उसे यह न कहे कि बच्चों जैसी हरकतें कर रहे हो, वैसे ही उन्हें भी दूसरों की अपेक्षाओं पर खुद को खरा साबित करते रहना पड़ता है. वे क्या पहन रहे हैं, किस तरह के शौक रखते हैं, कैसा संगीत सुनते हैं, अपना समय कैसे बिताते हैं… इन सब पर सोसाइटी की नज़र रहती है.

गौर करें तो बच्चों-बुजुर्गों को अपने तरीके से चलाने और उनको एक मानसिक आइसोलेशन में धकेलना भी इस समाज से उपजी एक किस्म की वैचारिक और भावनात्मक हिंसा है. शुरू में जिस पाखंड का मैंने जिक्र किया वह अनायास ही नहीं आता, उसकी जड़ें इन्हीं सामाजिक मानदंडों में समाहित हैं. इसीलिए हर पीढ़ी कुंठित बुजुर्गों से भरी मिलती है.

बदलाव आया है, इंस्टाग्राम पर ऐसे कई इन्फ्लूएंसर हैं जो अपने तरीके से जीते हैं. बीते दिनों की एक्ट्रेस जीनत अमान भी उनमें से एक हैं. जो लोग उम्र के अंतिम दौर तक सक्रिय हैं, उन्होंने जीवन में संतुष्टि और सम्मान दोनों हासिल किया है.

जीने का तरीका इस बात से निर्धारित नहीं होना चाहिए कि दूसरे क्या चाहते हैं, बल्कि इससे होना चाहिए कि आप किस तरह जीना चाहते हैं. जब लोग दूसरों की इच्छा से सिर्फ ‘जीने’ लगते हैं, तो इकनॉमिक्स की भाषा में कहें तो सोसाइटी के लिए ‘अनप्रोडक्टिव’ बन जाते हैं.

ग़र अपनी मर्जी से जीते रहते तो शायद दूसरों के जीवन में भी कुछ नए रंग शामिल कर रहे होते.

भारत के आने वाले 30 से 50 सालों में दुनिया की यह सबसे बड़ी युवा आबादी उम्रदराज़ होने लगेगी. जैसी अंधश्रद्धा में डूबी पीढ़ी हम देख रहे हैं, तो बहुत बदलाव की उम्मीद कहाँ हैं?

अब भी सही से जीना नहीं सीख पाए तो चिड़चिड़े, पाखंडी, कुंठित और दूसरों पर बोझ बने बुजुर्गों से भला कौन-सा बेहतर समाज तैयार होगा…

(साथ में तस्वीर रघु राय के इंस्टाग्राम अकाउंट से, जो अपनी उम्र के 81वें वर्ष में भी कैमरे के जरिये अपनी निगाह से दुनिया देख रहे हैं)

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