
शशि शेखर-
अधूरी बात से हानि ही होगी मित्रो…
“टेस्टोस्टेरोन का स्तर कम हो रहा है,जीवन निरर्थक लग रहा है: दिनेश श्रीनेत”
दिनेश श्रीनेत जी का यह पोस्ट पूरा पढ़ा. अच्छा लगा. लेकिन अधूरा लगा. कुछ ऐसा, जो किसी के मनोविज्ञान को बदल कर उसे निराशा के मोड में भेज सकता है. मुझे उम्मीद है, श्रीनेत जी, मेरी बातों का बुरा नहीं मानेंगे, उलटे वे इसे एक और विचार के तौर पर स्वीकार करेंगे.
बुद्ध ने यह नहीं सोचा था कि मैं कौन हूँ? न ही उन्होंने कभी किसी को उसके अस्तित्व से परिचित कराया. उन्होंने सीधे कहा, सर्वम दुखम और इसका कारण अज्ञान है और जिसे ज्ञान मिल जाएगा, वह दुखों से छुटकारा पा लेगा.

29 साल की उम्र में हर कोई बुद्ध नहीं बन सकता. बनना भी नहीं चाहिए. क्योंकि भारतीय दर्शन-अध्यात्म-धर्म गृहस्थ धर्म को सबसे बड़ा धर्म मानता है. और जिसने गृहस्थ धर्म निभा लिया, उसे दुनिया में कोई जप-तप करने की जरूरत नहीं.
कर्म को ले कर पूरा हिन्दुस्तान और सनातन एक्सपर्ट ने आज तक हिन्दुस्तान के लोगों को मूर्ख बनाया है. गीता के श्लोक की गलत व्याख्या की है. कर्म करो फल की चिंता नहीं. ये सरासर गलत है. गीता में कहीं भी भगवान कृष्ण ने यह नहीं कहा है. रात को सोते समय भी इंसान अपना हाथ मच्छर मारने के लिए उठाता है. निष्काम कर्म भ्रम है. इसे फैलाया गया है, साजिश के तहत.
काम करो, कामना नहीं और वास करो वासना नहीं. यही जीवन का मूल है. गीता अगर वैराग्य सीखाती तो युद्ध के बाद युद्धिष्ठ्रर जब सत्ता पर बैठने को ले कर अनिच्छुक दिखे तो अर्जुन ने ही कहा, आपको सत्ता संभालनी चाहिए. जबकि, गीता का सीधा ज्ञान अर्जुन को मिला था. वो चाहता तो युद्ध के बाद तुरंत जंगल चला जाता. लेकिन, नहीं. सबने राजधर्म का पालन किया, गृहस्थ धर्म को निभाया.
अब काम कैसा हो? कर्म कैसा हो. इसे गांधी ने सबसे अच्छा बताया है अपने गीता भाष्य में. अनासक्ति भाव. वाकई इस भाव में इंसान कर्म करें तो कहीं कोई समस्या नहीं. अब हम अज्ञानी रह जाते है, हम अपने शास्त्रों को नहीं जानते है, फिर 50 की उम्र के बाद पछताते है तो इसमें हमारी गलती है. भारतीय दर्शन का नहीं, अध्यात्म का नहीं.
भारतीय दर्शन जीवन के हर पहलू को समेटे हुए है. यह मात्र एक पक्ष नहीं है. यह व्यक्ति के धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को भी अपने में समेटता है. इससे आगे कुछ नहीं. मैं कौन हूं और मुझे मोक्ष कैसे मिलेगा यह सवाल अनिवार्य रूप से किसी बच्चे या युवा के मन में आए जरूरी नहीं. यह कभी भी किसी के भी मन में आ सकता है. यह बाल नचिकेता के मन में भी सकता है और वृद्ध जनक के मन में भी. और अष्टावक्र का ज्ञान पार कर जनक जीतेजी मोक्ष पा भी जाते है और विदेह कहलाते है.
तो सवाल है कि क्या भगवान की मूर्ती के सामने घंटी बजाने के साथ-साथ कभी अष्टावक्र गीता का अध्ययन किया है. नहीं, तो फिर यह आपकी गलती है. यह सेक्स हार्मोन के घटते स्तर के कारण नहीं है. आप अगर बेचैन हो रहे है तो नितांत आप अपने ज्ञान की कमी के कारण हो रहे है. ज्ञान बढ़ाइए, दुखों से छुटकारा पाइए, जैसाकि बुद्ध ने भी कहा.
जीवन का अर्थ है. तब भी जब आप सबकुछ भूल कर दिन रात अपने परिवार के लिए कमाते है और तब भी जब आप इस सब से रिटायर हो कर भक्ति मार्ग पर आ जाते है. जीवन कभी बेकार और अर्थहीन नहीं होता. भक्तिमार्ग पर आना या अध्यात्म के प्रति रूची बढ़नी ढकोसला नहीं है. ढकोसला यह जरूर है कि आप धर्म के नाम पर घंटों धुप अगरबती जलाते रहे और जो सदियों पुरानी ज्ञान परंपरा है, शास्त्र है, उसे न पढ़े.
पश्चिमी देश के वृद्ध समाज सेवा जैसे काम करते है. यह सही है. हमारे देश में भी ऐसा होना चाहिए. छोटे शहरों-गांवों के बूढ़े व्यक्तियों को ऐसा करना चाहिए. लेकिन ऐसा नहीं हो पाता. इसके एक नहीं अनेकानेक कारण है. आर्थिक भी, स्वास्थ संबंधी भी और सामाजिक-सांस्कृतिक भी.
अब देश का हर बूढा आदमी रघु राय जैसा प्रीविलेज्ड तो हो नहीं सकता. इस बात को भी हटा दे, तो हमारे देश में बुढापा को एक बोझ समझने की कुरीती रही है. हालांकि, इस कुरीति को ख़त्म करने के लिए वृद्ध व्यक्तियों को ही आगे आना होगा. क्योंकि ये हमारे समाज के सबसे अमूल्य मानव संपदा है. इस मानव संपदा को हम यूं ही बेकार जाने देते है, तो इसमें उस वृद्ध व्यक्ति की नहीं हमारी, समाज की, सरकार की, कलेक्टिव गलती है.
जीवन का अर्थ अंतिम वक्त में भी समझ आ जाए तो बड़ी उपलब्धि है. हां, शुरू से ही समझ आ जाए तो और बढ़िया. लेकिन, जैसे आपने लिखा कि अपने जमाने प्रेम विवाह कर चुकी लड़कियां आज अपनी बेटी के प्रेम विवाह के नाम पर मरखनी गाय बन जाती है तो सवाल है कि हमने कब अपने बच्चों को शुरू से जीवन का अर्थ और जीवन का मकसद सही से बताने की कोशिश की है.
हमने तो सदा यही कहा है कि बेटा जल्दी इंजीनियर बन जा, डॉक्टर बन जा, आईएएस बन जा, खानदान की इज्जत बढ़ा. अब वो नादाँ बालक कैसे समझेगा कि जीवन का असल अर्थ क्या है? तो यहाँ फिर से हमारी ही गलती है कि हमारे मा-बाप हो या हम, हमने कभी जीवन के अर्थ और मकसद को न समझाने की कोशिश की, न समझाने की.
कौन मना करता है किसी बच्चे को इंजीनियर, डॉक्टर बनने से. शौक से बने. लेकिन, मां-बाप इसे अपनी इज्जत से जोड़ कर क्या बच्चों को अपंग नहीं बना देते, मशीन नहीं बना देते. फिर वह मशीन कैसे कभी सोच पाएगा कि मेरे जीवन का अर्थ क्या है. वह तो तभी सोचेगा, जब 50-60 साल का बूढा हो जाएगा, काम से थक जाएगा. तब भी यह सब सोचने में कोई बुराई नहीं है.
तो, ज्यादा निराश होने की जरूरत नहीं है. शरीर का अपना एक नेचुरल प्रोसेस है. उसी गति से चलिए. बुद्ध बना नहीं जाता. नचिकेता किसी को बनाया नहीं जा सकता. हां, जनक बनने का विकल्प हमेशा आपके पास मौजूद है. जिस उम्र में भी ज्ञान हासिल हो जाए, हासिल कीजिये और अपने जीवन के मकसद को जान लीजिये. जीवन का मकसद फलां उम्र में ही मिल जाना चाहिए, ईश्वर ने कभी ऐसी शर्त नहीं थोपी है.
संबंधित पोस्ट-


