
मृत्युंजय कुमार-
दिलीप मंडल का विरोध हमने भी किया था। वह सिर्फ सोशल मीडिया वाला विरोध नहीं था। विरोध ऐसा कि उसके चक्कर में कॉलेज से निकाले भी गए।
तब की कांग्रेस सरकार ने उन्हें हमारी यूनिवर्सिटी (माखनलाल पत्रकारिता विश्वविद्यालय) में एडजंक्ट प्रोफेसर रखा था। इस फैसले का हमारे नोएडा कैंपस में खूब विरोध हुआ, नतीजतन वहां उनकी एक भी क्लास नहीं लगी। विरोध के चक्कर में कई छात्र निष्कासित भी हुए, जिनमें एक मैं भी था। भोपाल कैंपस में तो पुलिस बुलाने तक की नौबत आई थी।
अब दिलीप मंडल केंद्र सरकार में सलाहकार हो गए हैं। अब न मेरी विरोध की इच्छा है और न ही मैं इसे जरूरी समझता हूं। कुछ लोग उनका विरोध कर रहे हैं, वे अपनी जगह पर सही हो सकते हैं।
अतीत में दिलीप जी की भाषा को लेकर सवाल उठाए जा सकते हैं। लेकिन ये सब सिक्के का सिर्फ एक पहलू है। अगर दिलीप मंडल जैसे विचारक दलितों-पिछड़ों का हित मोदी सरकार में देख रहे हैं तो यह सरकार की वैचारिक जीत है।
यह उन लोगों के मुंह पर तमाचा है, जो अगड़ा बनाम पिछड़ा और मंडल बनाम कमंडल का विद्वेषी राग अलापते हैं, जो राम को माया-मुलायम की जोड़ी के खिलाफ खड़ा करते हैं।
विचार के रूप में यह सावरकरवादी हिंदुत्व की बड़ी जीत है। ऐसा हिंदुत्व जिसमें समाज के सभी अंग समरस हैं, जहां सभी का सम्मान है और सभी को अधिकार है।
रही बात कार्यकर्ताओं की तो यहां मेरा बिल्कुल अलग मत है। कार्यकर्ता दरी बिछाने के लिए ही होते हैं। जो दरी बिछाने के बदले पारिश्रमिक चाहते हैं वे कार्यकर्ता नहीं, राजनीतिक मजदूर हो सकते हैं। राजनीतिक मदद के बदले उन्हें पार्टी और सरकार से पद, प्रतिष्ठा और पुरस्कार मांगने का पूरा हक है। वे डिजर्व भी करते हैं।
लेकिन यह सब ‘कार्यकर्ता’ के नाम पर नहीं होना चाहिए। 2014 के बाद बने कार्यकर्ताओं की एक समस्या यह भी है कि वे सभी चीजों को लाभ के पद से ही जोड़ते हैं।
मसलन, कार्यकर्ता का परम् लक्ष्य सरकार की मदद से किसी पद को पाना ही हो। इस सोच को पुष्ट करने में भाजपा ने नए कॉर्पोरेट बुद्धि वाले नेताओं की बड़ी भूमिका रही है। श्रद्धेय ठेंगड़ी जी ने कार्यकर्ताओं को परिभाषित करते हुए साधन, साध्य, साधक और साधना की बात कही थी।
समरस समाज और मातृभूम का परम् वैभव कार्यकर्ताओं का साध्य यानी अंतिम लक्ष्य है। सभी कार्यकर्ता, पार्टी, सरकार, संगठन, समाज और दिलीप मंडल इस साध्य को पाने के साधन यानी उपाय मात्र हैं और ये पूरी प्रक्रिया अपनी साधना है। जो इस प्रक्रिया में है, वह साधक यानी कार्यकर्ता है।
लेकिन पिछले एक दशक में किसी भी तरह फूल छाप वाली सरकार बनाने को साध्य और पद पाने को साधना मान लिया गया है। इसके पीछे भी कार्पोरेट बुद्धि वाले नेता ही हैं।
दिलीप मंडल से मेरी तमाम असहमति है। लेकिन उस आदमी के लोकतांत्रिक व्यवहार पर सवाल नहीं उठाया जा सकता। कार्यकर्ताओं को चाहिए कि वे सलाहकार साहब से वक्त लें और उनके दफ्तर जाकर मिलें, उन्हें थोड़ा हिंदुत्व सिखाएं और खुद वंचित वर्गों की समस्याओं पर गौर करें। यह मौका विद्वेषी राजनीतिक दलों का न दें। मैंने सुना है कि दिलीप जी अच्छे मेजबान हैं।
बाकी मुझे Dilip C Mandal जी का चेला घोषित मत करिएगा, मैंने सेकेंड ईयर में निष्कासित होने तक उनका विरोध किया था। निष्कासन के बाद री-एडमिशन के लिए सी-वोटर में पार्ट टाइम काम किए थे। घर पर पूरा मामला बताने की हिस्मत नहीं थी।
बाघ और बकरी एक घाट पर जुट कर दिलीप मंडल को ट्रॉल कर रहे हैं! अगर संजय बारू और पंकज पचौरी प्रधानमंत्री के मीडिया सलाहकार बन सकते हैं तो दिलीप मंडल सूचना-प्रसारण मंत्री के मीडिया सलाहकार क्यों नहीं बन सकते? क्या उनका मीडिया का वर्क एक्स कमजोर है? इसके अलावा दिलीप जी के पास सोशलमीडिया कैपिटल भी है जिसकी सभी दलों को जरूरत है। फिलहाल मेरा इतना ही कहना है। अभी तक इस खबर की पुष्टि नहीं हुई है। पुष्टि होने के बाद इस विषय पर विस्तार से बात होगी। -रंगनाथ सिंह
जो कथित ट्रोल कर रहे हैं, वे ट्रोलर मात्र हैं, न बाघ हैं न बकरी। दिलीप जी ने खंडन नहीं किया है अभी तक, इसका अर्थ है कि सही है। अगर सही नहीं निकला तो इसे आप लिटमस टेस्ट के लिए उड़ायी गई खबर समझ सकते हैं, जिस पर आगे सच होने की बुनियाद होगी। इसलिए स्वागत अशेष। -पंकज कुमार झा


