
शम्भूनाथ शुक्ला-
मुझे लगता है, दिलीप मंडल को अब उनके मन का काम मिल गया है। वे जाति-पात तोड़क मंडल से थे। यह ध्यान रखना चाहिये, कि उन्होंने कभी नहीं लिखा कि वे संघ या बीजेपी के विरोधी हैं। अगर वे बीजेपी व मोदी को अपने अनुकूल ढाल सके तो यह उनकी बहुत बड़ी जीत होगी।
शायद लैटरल एंट्री को उनके दबाव में ही एग्जिट किया गया। अगर इस एंट्री में जाति को आरक्षण दिया जायेगा तो यह उनकी जीत होगी। जब पहले भी पत्रकारों को सूचना सलाहकार पद पर नियुक्ति को लेकर कोई हंगामा नहीं हुआ तो दिलीप मंडल को ले कर क्यों? उन्हें सवर्ण पसंद नहीं करते।
शायद इसलिए कि वे सवर्णों और ख़ासकर ब्राह्मणों को जातिवाद फैलाने के लिए कोसते रहे हैं। यह उनका स्टैंड ग़लत तो नहीं। उन्होंने कभी ख़ुद को मार्क्सवादी नहीं कहा। इसलिए वे आरएसएस की परिधि बीजेपी में सूचना सलाहकार बनते हैं तो यह उनकी और उनके अनुयायियों की उपलब्धि है।
संदीप यादव- ये आदमी RSS को ब्राह्मणों की संस्था बताता रहा है… और अब संघ के लिए काम करेगा! अगर ब्राह्मणों से आपत्ति नहीं तो कथित तौर पर ‘क्रांति’ क्यों की? अगर है तो नौकरी क्यों ली? इस आदमी ने जाति को काटने का नहीं बांटने का काम किया है सिर्फ ब्राह्मणों को टारगेट किया! मेरा सवाल ये है कि क्या ब्लैकमेलिंग करके नौकरी पाने तक की ‘क्रांति’ थी? खैर ये यहां भी ठगे गए हमें तो कुछ बड़े की उम्मीद थी।
प्रमोद कुमार पांडेय- Dilip C Mandal जी विशिष्ट प्रातिभ हैं।
भाजपा और मोदी सरकार के बड़े-बड़े नेताओं, प्रवक्ताओं से कहीं ज्यादा उन्होंने प्रधानमंत्री के स्टैंड को अकाट्य तथ्य, तर्क, विचार से सुरक्षा कवच प्रदान किया है। कभी ‘तुम्हीं पक्ष, तुम्हीं विपक्ष’ के सिद्धांतकार रहे दिलीप जी से अनेक बातों को लेकर असहमति हो सकती है –पर, वह महत्त्वपूर्ण बौद्धिक हैं इससे इनकार नहीं किया जा सकता! संघ और भाजपा ने ऐसे-वैसे अनेक अपने आलोचकों, विरोधियों के प्रति समय-समय पर राजनीति-रणनीति वश उदारता बरती है –दिलीप मंडल तो फिर भी विद्वान हैं।
शिव प्रकाश यादव- दिलीप मंडल को दिलीप कमंडल होने का पुरस्कार मिला है, काफी दिनों से सरकार की तरफ से बैंटिंग कर रहे थे अब उसका पुरस्कार मिला है, शायद अब खुल के खेल सकते हैं
महेंद्र सिंह- इनकी सारी बौद्धिकता पहले दस साल लगातार ब्राह्मणों को गरियाकर उन्हें कट्टरपंथी संघी ख़ेमे में भेजने के बाद अब मुसलमानों को गरियाकर उन्हें और भी कट्टरपंथी बनाने के आस पास सिमटी हुई है! बाक़ी ख़ुद जायसवाल बनिया होकर इतने सालों तक ये दलितों और पिछड़ों को यह समझाने में कामयाब रहे कि वे ही उन वर्गों के सच्चे प्रतिनिधि हैं यह भारतीय राजनीतिक इतिहास में एक उपलब्धि तो है ही!


