
सत्येंद्र पी एस-
नवभारत टाइम्स सन्डे के संपादक राजेश मित्तल ( Rajesh Mittal ) के पिता श्री गोविंद दास मित्तल का 94 साल उम्र में निधन हो गया। गोविंद जी उम्र सम्बन्धी जटिलताओं से जूझ रहे थे और बुधवार 13 नवम्बर को इस नश्वर संसार को अचानक अलविदा कहकर चुपके से निकल पड़े।
राजेश मित्तल को उनके सम्पादन प्रतिभा के साथ उनकी सादगी, मृदुभाषिता के लिए जाना जाता है। मृदुभाषिता और सादगी भी संस्कार में परिवार मिलती है। स्वाभाविक है कि उन्हें भी अपने पिता से काफी कुछ मिला है।

आज जब गोविंद जी की शोक सभा मे शामिल हुआ तो चौंक गया। मित्तल जी से लंबा सम्बन्ध है। तमाम मित्रों ने उनके अधीन काम किया है और मुझसे भी लंबी वार्ताएं होती थीं। लेकिन यह नहीं पता था कि राजेश मित्तल पाकिस्तान से विस्थापित परिवार की पहली पीढ़ी हैं।
गोविन्ददास मित्तल का जन्म 26 जून 1930 को लाहौर में हुआ। वहीं उन्होंने डीएवी कॉलेज में पढ़ाई की। अभी टीन एज के उरूज पर पहुंचे थे कि उसी दौरान 1947 में देश बंट गया। उन्हें भी विस्थापित होकर भारत आना पड़ा। वह पंजाब के गुरदासपुर ज़िले के बटाला में बस गए और वहां हार्डवेयर का कारोबार किया।
पंजाब से कुछ सपनों के साथ लेकर 1977 में दिल्ली आ गए और चावड़ी बाजार में बिज़नेस शुरू किया। स्वाभाविक है कि उसमें बच्चों को बेहतर शिक्षा दे देने की इच्छा जुड़ी रही होगी।
गोविंद दास जी अपने नाम को सार्थक करते हुए भगवान के दास यानी भक्त थे। चलते-फिरते तकरीबन हर वक्त वह हरिओम-हरिओम बोलते रहते थे। ये दो वाक्य भी उनके मुंह में अक्सर रहते थे – तेरी रजा में राजी हैं। करता तू है कन्हैया, नाम मेरा हो रहा है। गोविंद दास जी एक सात्विक आत्मा थे। उनके मन में हमेशा यह भाव रहता था कि मेरी वजह से किसी को भी जरा-सी भी तकलीफ ना पहुंचे। हमेशा दूसरों की तकलीफ दूर करने की कोशिश करते थेे। सेवाभावी मनोवृति के थे। आखिरी वक्त में पीतमपुरा के डिस्ट्रिक्ट पार्क में नीम की दातुन और गुलाब जल की सेवा कई बरसों तक की।
वह विस्थापित की त्रासदी का दर्द साथ लेकर आए थे, लेकिन उसको पीछे छोड़ दिया। परिवार में 3 बेटों, सतीश मित्तल, संजीव मित्तल और राजेश मित्तल और बेटी मंजू गोयल को खूब पढ़ाया लिखाया। स्थापित किया, संस्कारित किया और एक बेनजीर ज़िंदगी जिए।
राजेश मित्तल ने उनकी श्रद्धांजलि सभा में कहा, “हम सबके लिए यह उत्सव की बात है कि श्री गोविंद दास जी ने 94 वर्ष की यात्रा आनंदपूर्वक दादा-पड़दादा, नाना-पड़नाना की भी भूमिका निभाते हुए पूरी की।”
हमारे नवभारत टाइम्स के कूल कूल सम्पादक को उनके पिता की परिस्थितियों और सादगी के साथ उनकी जिजीविषा ने गढ़ा है। उन्होंने अपने बेटे को देश के प्रतिष्ठित हिंदी अखबार के सम्पादक जैसे प्रतिष्ठित पद तक पहुंचाने में अहम भूमिका निभाई। एक संघर्षशील हार्डवेयर के दुकानदार ने अपने बेटे को उस कुर्सी तक पहुँचाने के लिए तराश दिया जिस पर राजेन्द्र माथुर, एसपी सिंह जैसी विभूतियां विराजमान हो चुकी हैं।
विनम्र श्रद्धांजलि।


