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सुख-दुख

बीता साल और रवीश कुमार : ‘ना’ कहना सीख गया, हमारे जैसे कई पत्रकार अपने करियर के अंतिम बिंदु पर हैं!

रवीश कुमार-

अपनी बात- आप सभी को नया साल मुबारक!

नया साल मुबारक। आप सभी के लिए आने वाला साल मनोनुकूल हो। 2024 को खिन्नता के साथ विदा करने वालों में मैं नहीं हूँ। ठीक है कि इस साल ने दुनिया की बेहतरी के लिए कुछ ख़ास हासिल नहीं किया लेकिन अच्छी बात यह रही है कि इस साल भी ऐसे सपने ज़िंदा रहे और देखे जाते रहे। ग़ज़ा में बच्चों का मरना जारी रहा और अस्पतालों पर बमबारी में कमी नहीं आई। लेकिन लोग दक्षिण कोरिया में तानाशाही के ख़िलाफ़ सड़कों पर आ गए। अमरीका की यूनिवर्सिटी में ग़ज़ा में हिंसा रोकने का आंदोलन चला। 2025 को लेकर उम्मीदों का पहाड़ मत खड़ा कीजिए। यह साल आएगा और धीरे-धीरे जीएसटी की तरह आपसे बहुत कुछ लेकर चला जाएगा। आपका काम होगा सरकार के लिए टैक्स पैदा करना और सरकार का काम होगा आपका गला घोंटना। आपकी आकांक्षाएं कुचली जाती रहेगी। कहीं लाठी खाती रहेगी तो कहीं ठगी जाती रहेगी।

मेरे लिए निजी तौर पर यह साल अच्छा रहा। जितना बुरा हो सकता था, उतना नहीं हुआ। यह साल अपने एकांत को वापस पाने का संघर्ष और मिल जाने पर उससे जूझने का रहा। कई साल से लग रहा था कि लगातार लोगों के बीच रहना मेरे स्वभाव के विपरीत है। मैं इतना ज़्यादा ध्यानाकर्षण के केंद्र में रहने का आदी नहीं हूँ। मैं अकेला रहना भूल गया था। मैं ख़ुद को बेहतर तरीके से समझना चाहता था। अचानक से कुछ भी नहीं किया लेकिन धीरे-धीरे करने लगा। सबसे पहले मैंने सभा-सेमिनारों और कार्यक्रमों में जाने से परहेज करने लगा। यात्राएँ बंद कर दी। मिलना-जुलना भी बंद करने लगा। पहले लगा कि मुझसे नहीं हो पाएगा लेकिन हर दिन इस दिशा में कुछ न कुछ सफलता मिलती चली गई। नए साल में इसे और सख्ती से लागू करूंगा।

मेरे लिए अकेलेपन का यह मतलब नहीं कि किसी से नहीं मिलना है। कभी नहीं मिलना है। यह सब बकवास और बेवकूफी भरी बातें हैं। लेकिन अगर मिलने की या लगातार बात करने की आदत हो जाए तो उस आदत को कंट्रोल करना चाहता था। यात्राओं के लिए एयरपोर्ट पर भटकते हुए लगा कि क्या कर रहा हूँ। मैं क्यों जा रहा हूँ।मैं एक असंभव सा काम करने लगा। अपने प्रिय और सम्मानित लोगों को ना कहने लगा। हर ना के बाद जान निकल जाती थी लेकिन उस तड़प को संभालना आ गया लेकिन अपने ना से नहीं हिला। मैं किसी को भी ना कह सकता हूँ। लोग तो बुलाएंगे ही, लेकिन मेरा काम ना कहना है।मैं मंच पर नहीं जाना चाहता। मेरे करीब के दोस्त मानते नहीं हैं, किसी न किसी कार्यक्रम की रुप रेखा बनाकर दबाव डालने लग जाते हैं। घर के निजी कार्यक्रमों में बुलाने लग जाते हैं। उन्हें ऐसा नहीं करना चाहिए लेकिन उनसे कोई शिकायत नहीं। अगर किसी कार्यक्रम में चला गया तो तूफान नहीं आ जाएगा लेकिन मैं नहीं जाना चाहता।

अपनी सीमाओं को जान लेना भी जीवन का ज़रूरी कार्य है। मैं कई विषयों पर अधिकार से बोलने में ख़ुद को असमर्थ पाता हूँ। मेरी राय में किसी को बोलने के लिए हाँ तभी कहना चाहिए जब उसके पास भाषण के लिए तैयारी की सामग्री और समय हो। ऐसे किसी भी विषय पर बोलने के लिए नहीं जाना चाहिए। यू ट्यूब काफी समय माँगता है। इस काम को करते हुए मैं भाषण तैयार नहीं कर पा रहा था। बिना तैयारी के लिए मैं नहीं बोल सकता हूँ। बस यहां से शुरू हुआ उन सभी को ना बोलने का दुस्साहस। ना मेरे लिए 2024 ना बोलने का साल रहा। मैंने सारा सुख इस ना से पाया। कई कार्यक्रमों के प्रस्तावों को साफ़ मना करते करते मैंने ना कहने की शक्ति का साक्षात्कार किया। ना कहना बहुत रचनात्मक होता है। आप पल भर में संबंधों की संपूर्ण समीक्षा कर लेते हैं, सब कुछ दांव पर लगा देते हैं और फिर उन सबसे इस तरह से विदा हो जाते हैं जैसे अचानक जैसे ह्रदयगति रुक गई हो। लेकिन कई लोगों ने इसे सराहा और उसके बाद भी कुछ नहीं बदला। कई लोगों ने मुझे ठीक कर देने के लिए किसी वक्त के लिए याद रखा। उन्हें शुभकामनाएँ। मैं तब भी हाँ नहीं बोलने वाला।

दरअसल माँ के जाने के बाद के साल में ख़ुद के भीतर की हलचलों को पहचान नहीं पा रहा था। मुझे लगा कि समेटना चाहिए। जिनसे मिलता था, उनसे मन नहीं भरता था। और ख़ाली हो जाता था। तो लगा कि सब कुछ पहले ख़ुद को भीतर से ठीक किया जाए। तत्काल एक रास्ता नज़र आया, काम में खो जाने का रास्ता। शाम को किसी से फोन पर बात करने की बेचैनी पूरी तरह समाप्त तो नहीं हुई लेकिन काफी कुछ नियंत्रण पा लिया गया है। किसी से उचक कर मिलने के पीछे के कारणों को समझा तो धीरे-धीरे भावनाओं को संयोजित करने लगा। तमाम तरह की आशंकाओं के बीच मैं उस क्षण में संभावनाओं की तलाश करने लगा। अगर यह क्षण अंतिम है तो इसी में जी लिया जाए। इसी जोश के साथ लैपटॉप खुल जाता था। आप यू ट्यूब में बहुत कमाल नहीं कर सकते लेकिन जब तक इस चैनल को सरकार तरह-तरह के नियमों का जुगाड़ लगाकर बंद करने या भोथरा करने का रास्ता नहीं निकाल लेती तब तक जम कर और जुट कर काम करना चाहिए। बस मज़ा आने लगा। हज़ारों शब्दों को पन्ने पर उतारने के लिए दस उंगलियाँ लाखों उंगलियों की तरह दौड़ने भागने लगीं।

मैंने इस प्रक्रिया में एक बदलाव देखा। ज़्यादा लिखने से आपकी भाषा ख़राब हो जाती है। आप शब्द भूलने लग जाते हैं। भाषा ज़हन में रहने टहलने की चीज़ है। झट से बाहर निकल कर छप जाने के लिए ही नहीं बनी है। इसे लिखने से पहले अपने भीतर पालना पोसना होता है। उसे टटोलना होता है। तराशना होता है लेकिन मैं केवल टाइप कर रहा था। ख़ुद का टाइपिस्ट बन गया। इस साल इसे स्लो करना है या इस पर नज़र रखनी है। धीमी आँच पर अपनी भाषा को पकने देना है न कि तेज़ आँच पर पकाना है। तेज़ आँच पर पका खाना वैसे भी स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होता है।

हमारे जैसे कई पत्रकार अपने करियर के अंतिम बिंदु पर हैं। उन्हें यह भ्रम नहीं होना चाहिए और न है कि फेसबुक पर लिखने से आप पत्रकारिता की कमी की भरपाई कर रहे हैं। लिखना पत्रकारिता का हिस्सा है मगर अपने आप में पत्रकारिता नहीं है।

जो लोग आज इस पेशे में आ रहे हैं, उनके पास किस चैनल में पत्रकार बनने का विकल्प है, इस सवाल का जवाब हम अच्छे से जानते हैं लेकिन सभी अपनी-अपनी प्रासंगिकता बनाए रखना चाहते हैं इसलिए ऐसे सवालों को निराशावादी बता कर ख़ुद को बचा ले जाते हैं। पहले भी यही होता था, हमने ऐसा ज़माना देखा था, हमारे घर पुलिस पहुंच गई थी, ऐसी मूर्खता भरी दलीलों से आप एक पेशे के पार्थिव शरीर को जीवित घोषित नहीं कर सकते हैं।

आज कई पत्रकारों के लिए इस पेशे में कोई जगह नहीं। जो कम पैसे में काम करके, महीनों लगाकर शानदार रिपोर्ट कर रहे है। रिपोटर्स कलेक्टिव, आर्टिकल 14,स्क्रोल में काम करने वाले पत्रकारों के लिए किस अखबार में जगह है? किसी के पास कोई जवाब नहीं है। मुझे कहा नहीं जाता कि हो सके तो पेशा छोड़ दीजिए लेकिन यह भी नहीं कह पाता कि कोशिश कीजिए कि इसमें आप बने रहें।मैं भाग्यवादी जवाब से ख़ुद को संतुष्ट नहीं कर पाता कि कुछ न कुछ हो जाएगा। क्या हो जाएगा? क्या एक डॉक्टर बिना अस्पताल के डॉक्टर बन सकता है? क्लिनिक से ख़ास तरह की ज़रूरत पूरी होती है, क्लिनिक अस्पताल का विकल्प नहीं हो सकता है। कई लोग किताब पढ़ कर सार बता रहे हैं, पॉडकास्ट चालू कर छोले भटूरे का ब्यौरा बता रहे हैं, यह काम है, इसमें बुराई नहीं लेकिन यह पत्रकारिता नहीं है। उनके चैनलों में मुख्य पत्रकारिता बंद है। ख़बरों को खोजने की होड़ बंद है। यह भी सच है। उसी के विकल्प में यह सब बकवास चल रहा है जिसे आप डिबेट तो अब आप विश्लेषण के नाम पर किया जाने वाला पोडकास्ट कहते हैं। यह तब अच्छा लगता जब मुख्य रूप से पत्रकारिता भी हो रही होती। क्या आपने नोट किया है कि मीडिया के किसी बड़े संस्थान ने कब से कोई अपनी और बड़ी स्टोरी नहीं की है?

अगले साल यह पेशा थोड़ा और मृत्यु के करीब जाएगा। सरकार इसका गला घोंटने का और प्रयास करेगी। उसे इस काम में लगातार सफलता मिलती जा रही है। पत्रकारिता को मृतपाय: घोषित कर देना चाहिए। इसलिए जब तक और जिस मात्रा में कुछ करने की संभावना बची है, ख़ुद को झोंक दीजिए। सारा काम छोड़ कर इस काम को कीजिए। जितना भी हो सकता है, उतना ही कीजिए। उम्मीद, हताशा, निराशा को छोड़ दीजिए। बस करते चलिए। नया साल शानदार रहे।

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