Connect with us

Hi, what are you looking for?

Local News Community

सियासत

तीन दशक तक भाकपा (माले) में सक्रिय रहने के बाद मैंने कांग्रेसी झंडा क्यों उठाया?

दिनेश सिंह-

भाकपा (माले) में तीन दशक लम्बी वामपंथी सक्रियता के बाद, कोई सात साल पहले, मैंने अपने कई और साथियों के साथ कांग्रेस का झंडा उठाने का फैसला किया, तो निस्संदेह इसका सबसे बड़ा कारण राष्ट्रीय स्वयंसेवक सेवक संघ और उसकी राजनीतिक फ्रंट भारतीय जनता पार्टी की देश को बहुसंख्यक साम्प्रदायिकता, धर्मांधता, नफ़रत व फासीवाद की काली आंधी के हवाले करने की साजिशों से दो-दो हाथ करने में कांग्रेस की केन्द्रीय भूमिका की अपरिहार्यता और उसके सर्वमान्य नेता राहुल गांधी जी की दृढ़ता द्वारा जगाई गई उम्मीदें थीं। लेकिन अपनी व्यक्तिगत बात करूं तो मेरे लिए यह अपनी जड़ों की ओर लौटना भी था।

मेरे पिता स्वर्गीय प्रह्लाद सिंह राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के पक्के अनुयायी और कांग्रेस के प्रतिबद्ध कार्यकर्ता थे। वे 1942 में महात्मा द्वारा ‘अंग्रेजो भारत छोड़ो’ आन्दोलन का आह्वान किये जाने से कई साल पहले से अपने क्षेत्र के गांधी आश्रम से जुड़े हुए थे। गोरी सरकार अचानक सारे गांधी आश्रमों को बन्द करने का फरमान ले आई तो उनके क्षोभ का पारावार नहीं रह गया था। अनंतर, वे प्राणप्रण से ‘अंग्रेजो भारत छोड़ो’ आंदोलन को गति प्रदान करने में लग गये थे। आजादी के बाद क्षेत्र के प्रायः सभी कांग्रेसी मंत्रियों व विधायकों का मेरे घर निरंतर आना-जाना रहता था।

जाहिर है कि घर का वातावरण पूरी तरह राजनीतिक था, जिसमें महात्मा के अलावा पं. जवाहरलाल नेहरू, लालबहादुर शास्त्री और श्रीमती इंदिरा गांधी वगैरह की देशसेवाओं की चर्चा हुआ करती थी। बचपन में मेरे मन मस्तिष्क पर उन चर्चाओं का जो प्रभाव पड़ा, विश्वविद्यालय के जीवन में विभिन्न मोर्चों पर मेरी वामपंथी सक्रियताओं के बावजूद अमिट रहा।

आज जब पीछे मुड़कर देखता और कांग्रेस के संघर्षों से पराभूत राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ व भाजपा को अपने कदम पीछे खींचते देखता हूं तो कांग्रेस में आने के अपने निर्णय पर बड़े संतोष का अनुभव होता है। अपने पर गर्व भी होता है कि मैंने सही वक्त पर सही फैसला किया।

यह देखकर और खुशी होती है कि उस वक्त कांग्रेस का झंडा हाथ में लेते वक्त राहुल गांधी जी से हुई बातचीत में हमने संघर्ष के मुद्दों के लेकर जो प्रतिबद्धता पाई थी, उसमें रंचमात्र भी कमी नहीं आई है। वे उस दिशा में बिना किसी राजनीतिक परिणाम या नफे नुकसान की परवाह किए आगे बढ़ रहे हैं और बढ़ते ही जा रहे हैं।

पहले कन्याकुमारी से कश्मीर तक की हजारों किलोमीटर लंबी ‘भारत जोड़ो’ और उसके बाद ‘भारत जोड़ो न्याय यात्रा’ में वे सच्चे जननायक की तरह उभरे हैं। इससे देश के नौजवानों, बेरोजगारों, दलितों-पिछड़ों, किसानों, कामगारों और व्यापारियों समेत विभिन्न तबकों में उनके प्रति विश्वास भी बढ़ा है और उम्मीद भी। उन्होंने सबकी, कहना चाहिए, सारे हिन्दुस्तान की बात संसद से लेकर सड़क तक पूरी शक्ति और साहस से उठाई है।

कांग्रेस में मेरी एक और खुशकिस्मती यह भी है कि मुझे राहुल गांधी जी के साथ प्रियंका गांधी जी का समुचित मार्गदर्शन भी सहजता से उपलब्ध है और मुझे ही क्यों, हमारी समूची टीम का अनुभव ऐसा ही है।

जब हम वामपंथी थे, हमारे लिए वामपंथ का मतलब सबसे अंतिम आदमी के साथ खड़े होना हुआ करता था और अब हम देख रहे हैं कि कांग्रेस भी सबसे ज्यादा उस अंतिम आदमी के लिए ही चिंतित है।

इसी चिंता के तहत गत लोकसभा चुनाव में उसने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ परिवार के साम्प्रदायिक फासीवादी अभियान को लगाम लगाने के लिए इंडिया का गठन कर राष्ट्रीय स्तर पर साझा विपक्षी मोर्चा बनाया और चुनाव नतीजे बताते हैं कि अपने उद्देश्य में सफल रही।

अब यह तो आज की तारीख में एक खुला हुआ तथ्य है कि राहुल गाँधी जी पं. नेहरू के बाद पहले ऐसे काँग्रेस नेता हैं जो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर सीधे हमले करते हैं और जिनके भाषणों में मनुवाद से लड़ने का खुला संकल्प दिखता है। इतना ही नहीं, वे काँग्रेस को बहुत साफ तौर पर वामपंथी मिज़ाज दे रहे हैं।
इस कारण हम पार्टियों में काँग्रेस और काँग्रेस में राहुल गाँधी जी को मज़बूत बनाने की दोहरी ऐतिहासिक ज़िम्मेदारी निभाने में लगे हैं।

मुझे याद आता है, हम कांग्रेस में आए तो राहुल ने पहली ही बातचीत में हमसे कह दिया था-‘कांग्रेस सबकी है, आप लोग आइए, कांग्रेस में काम करिए, अच्छे लोग होंगे तो अच्छा कम होगा।’

उन्होंने कांग्रेस द्वारा किए गए अच्छे कार्यों के बारे में भी विस्तार से बताया था। समय, परिस्थितियों और नेताओं के बारे में भी। ग़लत लोगों और ग़लत कार्यों को भी खुलकर स्वीकार किया था। पूरी सहजता और बेबाकी से समाज, राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय विषयों व ताकतर राष्ट्रों के बारे में अपनी बात रखी थी।

मोदी सरकार द्वारा लोकतांत्रिक संस्थाओं पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की विचारधारा को थोपने की चेष्टाओं पर गंभीर चिंता भी व्यक्त की थी। उनसे कैसे मुकाबला किया जाए और कांग्रेस को कैसे जमीनी स्तर पर उससे मुकाबला करने लायक बनाया जाए, इस पर भी चर्चा की थी।उन्होंने पूरे धैर्य के साथ एक-एक कर हम सभी लोगों की बातों को सुना और दूरदर्शी मार्गदर्शक की तरह अपनी बात समझाई थी। यह भी कि कांग्रेस को आगे बढ़ाने का संघर्ष कैसे हम सबके लिए अपरिहार्य है। उन्होंने इस संघर्ष को आगे बढ़ाने वाले युवाओं को आगे लाने की मंशा भी प्रकट की थी।
जमीनी लड़ाई की चिंताएँ उन्हें साफ दिख रही थीं तो उसमें जीत का आत्मविश्वास भी उनमें हिलोरें ले रहा था। इसलिए हमें इन चिंताओं से निपटने की उनकी कोशिशों के साथ एकाकार होने में कोई असुविधा नहीं थी। आज भी नहीं है और इस लड़ाई में जीत को लेकर हम पूरी तरह आश्वस्त हैं। मंजिल की आहट भी हमें सुनाई पड़ने लगी है।

हम आज भी राहुल जी के विचारों को रौशनी में अपनी सोच के अनुसार देश में संवैधानिक संकल्पों की पुनर्प्रतिष्ठा और न्यायप्रिय व्यवस्था व सामाजिक सांस्कृतिक एवं साम्प्रदायिक सद्भाव की स्थापना की कांग्रेस की अहर्निश कोशिशों के प्रति पूरी तरह समर्पित हैं।

हमें विश्वास है कि हम राहुल जी के नेतृत्व में उस प्रतिक्रांति की हवा का रुख मोड़कर रहेंगे, जिसे देश का मौसम बनाने की राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ परिवार की साज़िशें अभी हमें आक्रांत किये हुए हैं।

  • दिनेश सिंह फ़ैज़ाबाद के निवासी हैं और उत्तर प्रदेश कांग्रेस के निवर्तमान उपाध्यक्ष और प्रशासन प्रभारी हैं।
CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs
4 Comments

4 Comments

  1. अनुभव सिन्हा

    January 3, 2025 at 6:36 pm

    वामपंथी कितने परजीवी होते हैं यह दिनेश सिंह ने अपनी लेखनी से स्पष्ट ही किया है। राहुल गांधी का साथ देने के लिए अपनी वामपंथी पृष्ठभूमि छोड़ने के कदम को ऐतिहासिक बताने वाले दिनेश सिंह ने यह भी कहा है कि कांग्रेस को वामपंथी विचारधारा की शक्ति से संपृक्त करने का भी प्रयास वह कर रहे हैं। यह विरोधाभास नही है,न मार्क्स के डायलेक्टिकल मटेरियलिज्म से ऊर्जा ग्रहण करने का कोई तत्व प्रकट रूप से विद्यमान है। दरअसल वह चाहे कांग्रेसी हो या वामपंथी,अब अपने मकड़जाल में फंसकर अपने अंत के भय से कांप रहा है। राहुल की भूमिका को सशक्त बताने वाला व्यक्ति तो उससे भी ज्यादा दुर्बल ही होगा जिसे खुद यह नही पता कि लक्ष्य की प्राप्ति कैसे हो सकती है जब संघर्ष की जड़ें आसमान में हों। किसी देश की सहजता को किसी असहजता के साथ स्वीकार कराने में षड्यंत्र का सहारा बूमरैंग ही कर्ता जाएगा। प्रश्न यह है कि इसे कांग्रेसी या वामपंथी मानें तो कैसे ?

    • Dr. Mahendra Singh

      January 8, 2025 at 11:23 am

      फिलहाल आंकलन को संकुचित करने से बेहतर है बृहद्द किया जाए , अयोध्या ,बनारस सहीत पुरी यूपी का चुनाव श्री दिनेश सिंह जी के दिशा निर्देशन में हुआ ,संगठन विस्तार और चुनाव परिणाम आप स्वयं जानते है , साधुवाद

  2. समीर शाही पत्रकार अयोध्या

    January 3, 2025 at 8:44 pm

    जिंदाबाद भैया बहुत दिन बाद पढा बहुत सुकून मिला।। समीर शाही पत्रकार अयोध्या

    • Dr. Mahendra Singh

      January 8, 2025 at 11:30 am

      बेहद कुशल संगठन विस्तारक ,कसे हुए प्रशासक ,शांत नेतृत्वकर्ता और आत्मिक–मिलनसार होने के साथ विराट राजनैतिक समझ वाले दिनेश सिंह जी ने उत्तर प्रदेश कांग्रेस में जान फूकने सा कार्य किया है ।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

भड़ास लीगल टीम : Bhadas Legal Team

भड़ास मेल: [email protected]

Latest 100 भड़ास

विज्ञापन