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उत्तर प्रदेश

आईपीएस अमिताभ यश द्वारा वरिष्ठ पत्रकार मनोज राजन त्रिपाठी पर किया गया मानहानि का मुकदमा हाईकोर्ट में किस आधार पर हुआ ख़ारिज, पूरी कहानी विस्तार से जानें!

हालांकि ये केस पुराना है, डेढ़ साल पुराना, फिर भी मीडिया वालों के लिए इसे जानना ज़रूरी है क्योंकि मीडिया के साथी आए दिन मानहानि के मुकदमों से जूझते रहते हैं। अमिताभ यश-मनोज राजन त्रिपाठी प्रकरण में हाईकोर्ट के फ़ैसले का हूबहू हिंदी अनुवाद दिया जा रहा है ताकि हिंदीभाषी पत्रकार समझ सकें। किसी फैक्चुअल मिस्टेक या अस्पष्ट वाक्यों के लिए मूल अंग्रेज़ी के ऑर्डर को पढ़ें जिसका लिंक नीचे सबसे लास्ट में दिया गया है।


इलाहाबाद उच्च न्यायालय, लखनऊ खंडपीठ

तटस्थ उद्धरण संख्या – 2023:AHC-LKO:58684

आरक्षित आदेश: 06.07.2023

आदेश पारित: 11.09.2023

न्यायालय संख्या – 12

मामला: आवेदन (धारा 482) संख्या – 1109/2020

आवेदक: मनोज राजन त्रिपाठी व अन्य

विरोधी पक्ष: उत्तर प्रदेश राज्य (प्रधान सचिव, गृह विभाग) व अन्य

आवेदकों के वकील: नदीम मुर्तजा, अंजनी कुमार मिश्रा, शीरान एम. अल्वी

विरोधी पक्ष के वकील: जी.ए., ईशान बघेल, मोहम्मद खालिद

सम्माननीय न्यायाधीश: राजीव सिंह, जे.

1. सुनवाई और दस्तावेज़ों का अवलोकन:

न्यायालय ने आवेदकों के वकील मोहम्मद नदीम मुर्तजा, निजी प्रतिवादी के वकील श्री ईशान बघेल, और राज्य के लिए उपस्थित अतिरिक्त सरकारी अधिवक्ता (ए.जी.ए.) की दलीलें सुनीं और मामले से संबंधित रिकॉर्ड की जांच की।

2. आवेदन का उद्देश्य:

यह आवेदन शिकायत मामला संख्या 1308/2018 (अमिताभ यश बनाम मनोज राजन त्रिपाठी व अन्य) को समाप्त करने और लखनऊ के अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, कोर्ट संख्या 32 द्वारा 12.12.2018 को भारतीय दंड संहिता (आई.पी.सी.) की धारा 500 और 501(बी) के तहत पारित समन आदेश को रद्द करने के लिए दायर किया गया था।

3. आवेदकों का पक्ष:

• आवेदकों के वकील ने तर्क दिया कि संबंधित समाचार को “अच्छे विश्वास” में जनता को जानकारी देने के उद्देश्य से प्रसारित किया गया था।

• आवेदक क्रमशः वरिष्ठ संपादक, राजनीतिक रिपोर्टर, अपराध रिपोर्टर और ईटीवी उत्तर प्रदेश/उत्तराखंड के संवाददाता के रूप में कार्यरत थे।

4. शिकायत का विवरण:

• शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया कि 20.09.2017 को ईटीवी उत्तर प्रदेश/उत्तराखंड पर प्रसारित समाचार में उन्हें अपराधियों से अवैध धन प्राप्त करने का आरोपी बताया गया।

• यह समाचार तीन बार प्रसारित हुआ (दोपहर 2:00 बजे, 2:41 बजे, और 6:17 बजे), जिससे उनकी प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचा।

• यह भी आरोप लगाया गया कि समाचार जानबूझकर प्रसारित किए गए थे।

5. पृष्ठभूमि:

• वकील ने तर्क दिया कि इस समाचार से पहले विभिन्न समाचार पत्रों (जैसे ट्रिब्यून और दैनिक जागरण) में खबर प्रकाशित हुई थी कि “नाभा जेल ब्रेक” का मास्टरमाइंड गुरप्रीत सिंह उर्फ गोपी घनश्यामपुरिया को यूपी पुलिस ने गिरफ्तार किया, लेकिन एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने रिश्वत लेकर उसे रिहा कर दिया।

• इस खबर के बाद राज्य सरकार ने जांच का आदेश दिया, जो एडीजी (कानून एवं व्यवस्था), यूपी द्वारा की गई।

6. जांच की प्रक्रिया:

• जांच में शिकायतकर्ता (अमिताभ यश), जो उस समय एसटीएफ यूपी के आईजी थे, और अन्य वरिष्ठ अधिकारियों (आईजी एटीएस असीम अरुण, आईजी सूचना आर.के. चतुर्वेदी, एसपी के.बी. सिंह और एएसपी दिनेश त्रिपाठी) के बयान दर्ज किए गए।

7. वकील का तर्क:

• वकील ने अदालत का ध्यान इस बात पर दिलाया कि शिकायतकर्ता ने जांच रिपोर्ट में स्वीकार किया कि उन्होंने 19.09.2017 को दैनिक जागरण और ट्रिब्यून में खबरें देखीं।

• इन खबरों के बाद उन्होंने आरोपों का खंडन करते हुए एक प्रेस नोट जारी किया और राज्य सरकार ने जांच का आदेश दिया।

• आवेदकों ने केवल राज्य सरकार द्वारा आदेशित जांच और पहले से प्रकाशित खबरों की सूचना को रिपोर्ट किया था।

7. यह प्रस्तुत किया गया कि उस समय के आई.जी., ए.टी.एस., श्री असीम अरुण के बयान के अनुसार, 15.09.2017 को लगभग 12:00 बजे उन्हें सूचना मिली कि एक आतंकवादी के बदले बड़ी धनराशि के लेन-देन की संभावना है। इसके बाद, एक टीम को खोज अभियान पर लगाया गया। मोबाइल फोन के स्थान का पता लगाने के बाद यह पाया गया कि कुछ लोग सीतापुर की ओर जा रहे हैं। बाद में, दो व्यक्तियों—अमनदीप सिंह (पुत्र राजपाल सिंह, निवासी भगबड़ा, रुद्रपुर, ऊधमसिंह नगर, उत्तराखंड) और हरजिंदर सिंह (पुत्र गुरुदयाल सिंह, निवासी 28, वसुंधरा कॉलोनी, पीलीभीत)—को सीतापुर टोल प्लाजा पर रोका गया। इन दोनों ने बताया कि पंजाब से आए व्यक्ति पिछली रात वापस लौट गए थे। इन दोनों व्यक्तियों को ए.टी.एस. कार्यालय लाया गया और उन्होंने स्वीकार किया कि गुरप्रीत सिंह उर्फ गोपी घनश्यामपुरिया की रिहाई के लिए संदीप तिवारी उर्फ पिंटू सिंह (पुत्र स्व. सुरेंद्रनाथ तिवारी, निवासी सिविल लाइन, सुल्तानपुर; वर्तमान पता: कुमार एनक्लेव, वज़ीरहसन रोड, लखनऊ) से बातचीत हुई थी। इसके बाद, टीम हरजिंदर सिंह के साथ गई और संदीप तिवारी को ए.टी.एस. कार्यालय लाया। फिर, पंजाब पुलिस की टीम ने दोपहर 2:05 बजे अमनदीप सिंह, हरजिंदर सिंह, और संदीप तिवारी को धारा 364, 382, 386, 387, 212, 216, 216-ए, 414, 416, 120-बी आईपीसी के तहत अपराध संख्या 22/2017 में वारंट के आधार पर हिरासत में लिया।

8. आवेदकों के वकील ने तर्क दिया कि उस समय के आई.जी. इंटेलिजेंस, श्री आर.के. चतुर्वेदी के बयान के अनुसार, उन्होंने यह स्वीकार किया कि संदीप तिवारी उर्फ पिंटू (पुत्र स्व. एस.एन. तिवारी, निवासी लाल दिग्गी, सुल्तानपुर) उनका नज़दीकी रिश्तेदार (उनकी पत्नी का चचेरा भाई) है, जो उनके परिवार में अक्सर आता-जाता था। उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि 12.09.2017 को रात 9:00 से 9:30 बजे के बीच संदीप तिवारी ने उनके मोबाइल नंबर 9627916006 पर फोन किया था और बताया कि उनके मित्र के एक रिश्तेदार को पुलिस ने हिरासत में लिया है, और जानकारी लेने का अनुरोध किया। श्री चतुर्वेदी ने जानकारी लेने के बजाय, संदीप तिवारी को डांटा और ऐसी बातों में न पड़ने की चेतावनी दी। कुछ समय बाद, श्री चतुर्वेदी ने स्वयं संदीप तिवारी को फोन किया और उनका स्थान पूछा। उन्हें बताया गया कि संदीप तिवारी उस समय पीलीभीत में थे। उन्होंने फिर से उन्हें ऐसी बातों में न पड़ने की चेतावनी दी। श्री चतुर्वेदी ने यह भी स्वीकार किया कि उन्होंने शिकायतकर्ता/निजी प्रतिवादी के साथ आधिकारिक कार्य के संबंध में बातचीत की थी, लेकिन उक्त मुद्दे पर नहीं।

9. आवेदकों के वकील ने यह तर्क दिया कि अमनदीप सिंह के बयान के अनुसार, 12.09.2017 को उनके साले (गुरप्रीत) ने, जो कि रिंपल का साझेदार और मित्र था, अमनदीप को फोन कर बताया कि उनके एक परिचित को उत्तर प्रदेश या पंजाब पुलिस ने हिरासत में लिया है और किसी भी तरह उसे रिहा कराना होगा। रिंपल ने यह भी स्वीकार किया कि अमनदीप के यूपी में कुछ संपर्क हैं और वही उनकी मदद कर सकते हैं। उसी समय, अमनदीप, हरजिंदर सिंह काहलो और संदीप तिवारी उर्फ पिंटू के साथ पीलीभीत में हरजिंदर सिंह के घर पर बैठे थे। यह भी स्वीकार किया गया कि कुछ समय बाद अमनदीप को रूबल से व्हाट्सएप कॉल आया और उन्होंने मदद मांगी। संदीप तिवारी ने रिहाई के लिए मदद का आश्वासन दिया और गुरप्रीत सिंह उर्फ गोपी घनश्यामपुरिया की रिहाई के लिए धन की व्यवस्था करने को कहा।

10. आवेदकों के वकील ने तर्क दिया कि संदीप तिवारी उर्फ पिंटू के बयान के अनुसार, 12.09.2017 को जब वह अपने मित्र हरजिंदर सिंह काहलो के घर पर अमनदीप के साथ पीलीभीत में थे, उन्हें अमनदीप से सूचना मिली कि 10.09.2017 को सुबह के समय, शाहजहांपुर बस स्टेशन से गुरप्रीत सिंह उर्फ गोपी घनश्यामपुरिया को गिरफ्तार किया गया था। उन्होंने गुरप्रीत सिंह की रिहाई के प्रयास का आश्वासन दिया। इसके बाद, संदीप तिवारी ने शाहजहांपुर के अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक श्री दिनेश त्रिपाठी से मुलाकात की और जानकारी जुटाई। फिर वह 13.09.2017 की शाम को लखनऊ आए। उन्होंने 12.09.2017 की रात को अपने जीजा (आई.जी., इंटेलिजेंस श्री आर.के. चतुर्वेदी) को फोन किया, लेकिन उन्हें डांट पड़ी।

11. आवेदकों के वकील ने यह भी प्रस्तुत किया कि अमनदीप, पिंटू उर्फ संदीप तिवारी (आई.जी. इंटेलिजेंस श्री आर.के. चतुर्वेदी के साले), और रिंपल के बयानों के सभी पहलुओं की जांच किए बिना रिपोर्ट प्रस्तुत की गई। रिपोर्ट में यह स्वीकार किया गया कि हरजिंदर सिंह काहलो, अमनदीप, पिंटू उर्फ संदीप तिवारी और रिंपल ने गुरप्रीत सिंह उर्फ गोपी घनश्यामपुरिया की रिहाई के प्रयास किए। जांच के निष्कर्ष में यह पाया गया कि गिरफ्तारी के बाद गुरप्रीत सिंह से पूछताछ की जाएगी। यह नहीं कहा जा सकता कि गुरप्रीत सिंह की रिहाई के बारे में कोई बातचीत नहीं हुई थी।

12. आवेदकों के वकील ने भारतीय सर्वोच्च न्यायालय के निम्नलिखित निर्णयों का हवाला दिया:

(i) जवाहरलाल दरड़ा बनाम मनोहरराव गणपताराव कप्सिकर (1998) 4 SCC 112, पैराग्राफ 5,

(ii) अरुण पुरी बनाम एन.सी.टी. दिल्ली राज्य 2022 SCC OnLine SC 1491,

(iii) विजय व अन्य बनाम रवींद्र घीसुलाल गुप्ता 2022 SCC OnLine Bom 1315,

(iv) सुब्रमण्यम स्वामी बनाम भारत संघ (2016) 7 SCC 221,

(v) इंडियन पोटाश लिमिटेड बनाम मीडिया कंटेंट्स एंड कम्युनिकेशन सर्विसेज 2019 SCC OnLine Del 11991।

13. आवेदकों के वकील ने यह तर्क दिया कि सूचना के अधिकार के युग में, प्रेस या मीडिया के व्यक्ति को मुकदमे के डर में नहीं रखा जा सकता। उन्होंने आगे कहा कि धारा 499 आईपीसी के पहले और दूसरे अपवाद का लाभ परीक्षण के दौरान दिया जाना चाहिए। इसलिए, प्रस्तुत कार्यवाही को रद्द किया जाना चाहिए।

14. निजी प्रतिवादी के वकील ने आवेदकों की प्रार्थना का जोरदार विरोध किया और तर्क दिया कि जांच में निजी प्रतिवादी निर्दोष पाए गए। उन्होंने आगे कहा कि निजी प्रतिवादी का सेवा रिकॉर्ड अत्यंत सराहनीय था और उन्हें कई पुरस्कार मिले थे। हालांकि, समाचार का प्रसारण उनकी छवि को खराब करने के इरादे से किया गया कि वे अवैध धन अर्जित करने में शामिल थे।

15. निजी प्रतिवादी के वकील ने राजदीप सरदेसाई बनाम आंध्र प्रदेश राज्य एवं अन्य (2015) 8 SCC 239 में माननीय सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय पर भरोसा करते हुए तर्क दिया कि आवेदक ट्रायल कोर्ट के समक्ष उपस्थित होकर इन तथ्यों को उचित समय पर प्रस्तुत कर सकते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि ट्रायल कोर्ट के आदेश में कोई गैरकानूनी बात नहीं है।

16. आवेदकों, निजी प्रतिवादी, और सहायक सरकारी अधिवक्ता के वकीलों के तर्कों पर विचार करते हुए, आवेदन की सामग्री और अन्य प्रासंगिक दस्तावेज़ों, जिसमें जांच रिपोर्ट भी शामिल है, को देखते हुए यह स्पष्ट है कि जांच रिपोर्ट से पता चलता है कि निजी प्रतिवादी के बयान के अनुसार, 19.09.2017 को उन्हें दैनिक जागरण और ट्रिब्यून में प्रकाशित समाचार के बारे में सूचना मिली थी। इस समाचार में कहा गया था कि नाभा जेल ब्रेक के आरोपी गुरप्रीत सिंह उर्फ गोपी घनश्यामपुरिया को उत्तर प्रदेश पुलिस के एक अधिकारी ने पिंटू तिवारी के हस्तक्षेप से और पैसे लेने के बाद रिहा कर दिया। यह भी स्पष्ट है कि निजी प्रतिवादी ने कहा कि वे पिंटू तिवारी और अमनदीप को नहीं जानते। जांच में यह पाया गया कि पिंटू तिवारी उस समय के आई.जी. इंटेलिजेंस श्री आर.के. चतुर्वेदी का रिश्तेदार था। यह भी स्पष्ट हुआ कि पिंटू तिवारी ने अपने मित्र अमनदीप के अनुरोध पर श्री आर.के. चतुर्वेदी को किसी परिचित व्यक्ति की रिहाई के लिए फोन किया था। अमनदीप, पिंटू उर्फ संदीप तिवारी (श्री आर.के. चतुर्वेदी के साले), और रिंपल ने इस संबंध में किए गए प्रयासों से इनकार नहीं किया।

आवेदकों ने राज्य सरकार द्वारा जांच के आदेश से संबंधित समाचार का प्रसारण किया था। जांच अधिकारी ने निष्कर्ष निकाला कि इन आरोपों और तीन गवाहों (अमनदीप, पिंटू, और रिंपल) के बयानों की जांच गुरप्रीत सिंह उर्फ गोपी घनश्यामपुरिया की गिरफ्तारी के बाद ही की जा सकती है। यह विवादित नहीं है कि जांच रिपोर्ट मजिस्ट्रेट के समक्ष प्रस्तुत नहीं की गई थी। ऐसे हालात में, यह आवेदन स्वीकृत किए जाने योग्य है।

17. उपरोक्त के मद्देनज़र, यह स्पष्ट है कि कोई भी झूठा और अप्रमाणित बयान, जिसे जानबूझकर, अनजाने में, या इरादतन किसी की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाने के उद्देश्य से प्रकाशित या बोला गया हो, वह मानहानि के दायरे में आता है। वर्तमान मामले के तथ्यों और घटनाक्रम से यह स्पष्ट है कि आवेदकों का मामला धारा 499 आईपीसी के पहले और दूसरे अपवाद के अंतर्गत पूरी तरह से आता है। इसलिए, कोई भी आरोपित अपराध सिद्ध नहीं होता। अतः लखनऊ की न्यायालय संख्या 32, अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष लंबित शिकायत मामला संख्या 1308/2018 की संपूर्ण कार्यवाही को रद्द किया जाता है।

18. उपरोक्त टिप्पणियों के साथ, प्रस्तुत आवेदन स्वीकृत किया जाता है।

आदेश तिथि: 11.09.2023 / अर्पण


मूल ऑर्डर यहाँ पढ़ें-

https://indiankanoon.org/doc/68438372/


ये प्रकरण फिर से क्यों हुआ ताजा, इसे पढ़िए-

नाभा जेल ब्रेक मुलजिम को छोड़ने के आरोपों की दोबारा जांच की मांग https://www.bhadas4media.com/nabha-jail-break/

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