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फ़क़ीर जी का ये नया वाला फोटो सेशन नहीं देखा तो क्या देखा मितरों!

मंजुल-

पहले तो साहब इस तरह के रूप धरेंगे फिर गोयबल्स जोशी सबको फ़ोन करके धमकायेंगे कि साहब का कार्टून ना छापो।


प्रकाश के रे-

नीरो न तो बाँसुरी बजा रहा था और न ही वायलिन.

बहुत से लोग प्रधानमंत्री मोदी की इस तस्वीर को लगाकर उनकी तुलना रोम के महान सम्राट नीरो से कर रहे हैं, जिनके बारे में यह प्रचलित है कि रोम जल रहा था, तो वे बाँसुरी बजा रहे थे.

यह तुलना ग़लत ही नहीं, बेमतलब भी है. तथ्य और तर्क से परे भी है.

नहीं. नीरो न तो बाँसुरी बजा रहा था और न ही वायलिन.

अव्वल तो यह कि उसके बाँसुरी बजाने के शौक़ का कोई ऐतिहासिक स्रोत नहीं है और वायलिन उसके कई सदी बाद आया था. वह सिथरा/कीथरा नामक एक तार वाद्य यंत्र बजाता था. रोमन इतिहासकार टैसिटस ने लिखा है कि रोम को जलते देख नीरो ने ट्रॉय की तबाही का गीत गाया था. हालांकि उसने यह भी लिखा है कि नीरो के साथ मौजूद गवाहों से इसकी पुष्टि नहीं होती है. म

बहरहाल, यह जानना चाहिए कि नीरो को कला, नाटक और साहित्य में बहुत रूचि थी. संभव है, उस त्रासदी को देखकर उसे कोई आख्यान याद आ गया हो. जैसे आज लोग फिर अनजाने में नीरो का हवाला देने लगे हैं.

सनद रहे, टैसिटस आग की उस भयावह घटना के बारे में जानकारी का सबसे भरोसेमंद स्रोत है और वह ख़ुद भी नीरो को पसंद नहीं करता था. इसने नीरो को आग के लिए ज़िम्मेवार नहीं ठहराया है, पर नीरो को नापसंद करनेवाले कुछ अन्य इतिहासकारों ने आग के लिए नीरो को दोष दिया है. नीरो ख़ुद ईसाइयों को इसके लिए दोषी मानता था, जो उस समय एक छोटे संप्रदाय थे और रोमन उन्हें पसंद नहीं करते थे.

अब आते हैं कि जब जुलाई, 64 में छह दिन रोम जलता रहा, तो नीरो ने क्या किया या नहीं किया. जब आग लगी, तो नीरो रोम से 35 मील दूर अपने किसी आवास पर था. यह ख़बर सुनते ही वह लौट आया और राहत व बचाव में लग गया.

उसने अपनी निजी संपत्ति से भी इसके लिए ख़र्च किया था. उसने अपने महलों को राहत शिविरों में बदल दिया था और भूख से मौतों को रोकने के लिए समुचित मात्रा में अनाज की व्यवस्था की थी. रोम का जो बड़ा हिस्सा तबाह हुआ था, उसमें नीरो ने अपने हिसाब से निर्माण कार्य कराया था. वह पहले से ही आभिजात्यों में अलोकप्रिय था और अब निर्माण के लिए धन जुटाने की कोशिशों से भी अमीर-उमरा नाराज़ थे. यही वजह है कि उसके बाद उसका इतिहास लिखने में पूर्वाग्रहों का बड़ा ज़ोर रहा है.

इतिहासकार जोसेफ़स ने भी नीरो से अन्याय करने के लिए इतिहासकारों को लताड़ा है. फिर भी टैसिटस लिखता है कि नीरो की मौत से ग़रीब, ग़ुलाम और रंगमंच के लोग दुखी थे. रोमन साम्राज्य के पूर्वी हिस्से के लोग भी उदास थे, क्योंकि उसने उन्हें बहुत अधिकार दिए थे. आधुनिक इतिहासकार भी इन बातों से सहमत हैं.


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