दया शंकर राय-
किसी हत्यारे को जब किसी की हत्या की सुपारी दी जाती है तो भरसक उस सुपारी के एवज में वह अपना काम पूरी ईमानदारी से करता है। कारपोरेट नियंत्रित मीडिया के दौर में भी यही हुआ है। अब पत्रकारिता की हत्या की सुपारी इन कारपोरेट मीडिया घरानों को न्यूज रूम को नियंत्रित करने वाले कथित प्रधान संपादकों /संपादकों के जरिये दे दी जाती है..! अब उस सुपारी के एवज में उसे अपना काम तो करना ही है। उसे किसी व्यक्ति की हत्या नहीं करनी है बल्कि उस सच को सामने न लाने का काम करना है जो उसके पेशे से ठीक उलट है और जो हत्या से भी अधिक जघन्य है..!
अन्यथा आप देखिए कि भगदड़ के बाद हुई मौतों और घायलों की स्थिति को मुख्य लीड न बनाकर इतने बड़े हादसे में भी स्नान को लीड खबर बनाते हुए शीर्षकों में लालित्य पैदा किया जा रहा है..!
और यहीं पर आप हिंदी और अंग्रेजी पत्रकारिता में थोड़ा फर्क भी देख सकते हैं। अंग्रेजी अखबारों ने लीड भगदड़ को बनाया है जो स्वाभाविक है लेकिन हिंदी अखबार इतने बड़े हादसे के बाद भी स्नान में लालित्य खोज रहे हैं। और यह फर्क शायद इसलिए भी है कि पाठकीय संख्या की दृष्टि से अंग्रेजी अखबारों की तुलना में सत्ता प्रतिष्ठान के लिए हिंदी अखबार ज्यादा महत्व रखते हैं। इसलिए उन पर नियंत्रण उन्हें ज्यादा जरूरी लगता है. !
पिछले ढाई तीन दशकों से कारपोरेट नियंत्रित हिंदी पत्रकारिता जिस तरह हिन्दू पत्रकारिता में बदलती गई है वह आज के सर्वसत्तावादी निजाम के लिए स्वाभाविक तौर पर मुफीद साबित हो रहा है. !
सोचिये कि इसी कारपोरेट मीडिया ने अपने तमाम पत्रकारीय पतन के बावजूद 2013 के कुम्भ में इलाहाबाद स्टेशन पर हुई मौतों के बाद किस तरह का रुख अपनाया था..! तब भाजपा और मीडिया के दबाव में उस समय के नगर विकास मंत्री और कुम्भ प्रभारी आजम खान को इस्तीफा देना पड़ा था।
ये तो हिंदी प्रिंट मीडिया का हाल है। चैनलों का हाल इस हादसे के बाद जो है उस पर तो कुछ लिखते हुए भी शर्म आती है. ! उनके भजन कीर्तन पर कुछ कहना इसलिए भी बेकार है क्योंकि उनकी सुपारी और ज्यादा वजनदार होती है..!
इस हादसे की असलियत और हताहतों की सही स्थिति आप शायद ही जान पाएं, फिर भी सच हासिल करने के प्रयास में लगे रहिये. ! शायद देर-सबेर कुछ मिल ही जाए. ! लेकिन उससे भी जरूरी है कि इस सुपारी पत्रकारिता से खुद को बचाये रखिये क्योंकि यह तो सच जानने के आपके नागरिक अधिकार की ही हत्या कर रहा है..! उसका विवेक तो वैसे भी सत्ता की चकाचौंध और महाकुंभ की आस्था में डुबकी लगा ही चुका है..!







बचपन में कलकत्ता गया था और किसी व्यस्त चौराहे पर बिना लाल बत्ती सिपाही को ट्राफिक संचालित करते हुए देखकर बहुत प्रभावित हुआ था। तभी समझ में आ गया था कि नौकरी कोई भी आसान नहीं है। मुझे डर था कि सिपाही अनुभवी नहीं हो तो वाहनों को भिन्न दिशाओं में भेजने की बजाय सबको अपने ऊपर बुला ले। वर्षों बाद कुम्भ में उत्तर प्रदेश का जो हाल है उससे यही लगता है। ट्रैफिक वाले ने अपनी योग्यता स्थापित करने के लिए दुनिया भर की ट्रैफिक को न्यौत दिया है। काम खुद तो करना नहीं है जो टीम मिली है उसी से करवाना है और दुनिया देख चुकी है कि जंगल जैसी मूंछ वाले पुलिसिये को फूल बरसाने में लगा दिया गया था। पता नहीं अफसरों को काम नहीं मालूम है या काम करवाने वाले को काम बांटना नहीं आता। जो भी हो, सारी दुनिया उत्तर प्रदेश में घुसी जा रही है। सब हक्के-बक्के खड़े हैं। -संजय कुमार सिंह


