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सियासत

पूछा जा रहा है कि अगर धर्म की वजह से नरसंहार किया गया तो मरने वालों में एक मुसलमान क्यों है?

अभिषेक पाराशर-

आशंका सही साबित हो रही है! पहलगाम आतंकी हमले का परोक्ष समर्थन किया जा रहा है….क्योंकि वे इसका खुलकर समर्थन नहीं कर सकते!

भारत का सेक्युलर बौद्धिकता के लिहाज से बेईमान और चोट्टा है. उसे चिंता रहती है अपनी फेक विश्वसनीयता की, जो कभी उसके पास थी ही नहीं! इसलिए इस तरह के मामलों में बोलते वक्त उसका बौद्धिक मवाद रिसने लगता है.

सवाल पूछा जा रहा है कि अगर धर्म की वजह से नरसंहार किया गया तो मरने वालों में एक मुसलमान क्यों है?

जवाब है-कोलैटरल डैमेज. बड़ी बिल्डिंग गिरती है, तो आस-पास की इमारतों को नुकसान होता है. गोली जब अंधाधुंध चलेगी तो वह धर्म पूछ कर नहीं लगेगी.तो एक स्थानीय कश्मीर को लग गई.

दूसरा यह कहना कि यह इंटेलिजेंस फेल्योर है. लेकिन यह पूरी घटना में दहाई प्रतिशत का भी वेटेज नहीं रखता है. इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट बताती है कि जिस जगह हमला हुआ, वहां गाड़ी नहीं जा सकती है, पैदल या घोड़े से पहुंचा जा सकता है और यह दूरी पहलगाम से करीब छह किमी की है तो समझा जा सकता है कि उन्होंने कितनी आसानी से पर्यटकों को मारा और फिर उतनी ही आसानी से जंगल में गायब हो गए. इसी टोपोग्राफी का फायदा उठाकर हमला हुआ और इसी का फायदा उठाकर हमले के पहले की रेकी भी हुई होगी. लोकल हैंडलर और सपोर्ट के बिना ऐसा करना मुश्किल है, यह सहज अंदाजा लगाया जा सकता है.

अनुच्छेद 370 हटने के बाद कश्मीर का मुख्य भारत भूमि से एकीकरण हो रहा है और पर्यटकों की संख्या में इसका इजाफा प्रमाण है. 2018 में पर्यटकों की संख्या 1.7 करोड़ थी, जो 2024 में बढ़कर 2.3 करोड़ हो गई. कुछ दिनों पहले एनसीपी के सांसद आगा सैय्यद रुहुल्ला का एक वीडियो देखा, जिसमें वह कह रहा है कि यह यह ‘कश्मीर में टूरिज्म नहीं है, बल्कि कल्चरल इनवैजन’ है. हालांकि हकीकत यह है कि कश्मीर में सबसे बड़ा इनवैजन वहां इस्लाम का आना रहा और अगर कश्मीर में इस्लाम की भूमिका का वहां के आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक परिवेश में किए गए योगदान के आधार पर मूल्यांकन किया जाए तो जो तस्वीर निकल कर सामने आएगी, वह यह बताने के लिए काफी होगा, कि कश्मीर में इस्लाम घड़ी की सुई को पीछे की दिशा में मोड़ने वाला साबित हुआ.

इस सबके पीछे जो मुल्क है, वह है पाकिस्तान, जहां हर आदमी के हाथ में इस्लाम की तलवार है और वह एक दूसरे को काट रहा है. हिंदू, ईसाई, सिख कम पड़ चुके हैं, तो यह शिया, वोहरा, अहमदिया समेत अन्य को कतर रहा है! गाली बन इस मुल्क के प्रधानमंत्री को वास्तविक इस्लामिक देशों में कितनी इज्जत मिलती है, यह छिपी बात नहीं है! कोई समझौता नहीं, कोई ट्रेड और इनोवेशन की बात नहीं! आर्मी चीफ हिंदू-मुस्लिम के दो कौम होने की बात करता है लेकिन उन्हीं आतंकियों से अपने बच्चों की हिफाजत नहीं कर पाता. गली-गली जिहाद की ट्रेनिंग चल रही है, सिविल सोसाएटी की कोई आत्मा नहीं..मामूली महंगाई ने भारत में संपूर्ण क्रांति की अलख जगाई और इंदिरा गांधी की सत्ता चली गई..लेकिन क्या मजाल है कि इस देश में सिविल सोसाएटी सड़कों पर उतर आए? उसे इस्लाम की अलख से मतलब है, इसलिए यहां की सेना और नेताओं को पता है कि कश्मीर और आतंक की अफीम से वह अपने आवाम को शांत रख सकते हैं!

प्रधानमंत्री सऊदी अरब में हैं, ग्रैंड वेलकम मिला है, वह भी उस मुल्क में जो इस्लाम की जननी है..जहां के मोनार्क रेडिकलाइजेशन को उभरने नहीं देना चाहते हैं, वे इनोवेशन और टेक्नोलॉजी अपना रहे हैं, उदारवादी मूल्यों को प्रश्रय दे रहे हैं और पाकिस्तानी कन्वर्टेड मुस्लिम लश्कर ए झांगवी, तैयबा, जैश ए मोहम्मद के जरिए इस्लाम के सबसे दोयम वर्जन को लागू करने की जुगत में लगे हैं, जिसे इस्लाम की पैदाइश वाले देश पीछा छुड़ाने में लगे हैं. भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश का मुस्लिम मदरसों में इब्ने अल तैमिया और वहाब को पढ़ रहा है. यह फालतू का बेतुका ज्ञान है कि आतंकियों के धर्म पूछ कर मारने के बाद देश में हिंदू-मुस्लिम होने लगेगा. भारत ऐसा मुल्क कभी रहा ही नहीं. कश्मीर से जब हिंदू भगाए गए, तो उन्होंने हथियार नहीं उठाया…पाकिस्तान में वह मामूली आबादी बन गए, उन्होंने हथियार नहीं उठाया, बांग्लादेश में वे मारे जा रहे हैं, उन्होंने हथियार नहीं उठाया. भारत में ऐसा कुछ नहीं होगा. जो करना है सरकार करेगी, संस्थाएं करेंगी…क्योंकि उसे लोगों ने चुना है…यह जनता की लोकतांत्रिक आस्था है. साथ ही यह भी कहना जरूरी है कि सभी मुस्लिम एक नहीं है, बेशक वे कुरान और पैगंबर को मानते हो. वह अलग-अलग है. यह सभी समस्या धड़े और फिरके की है. मैं नाम लिखना वाजिब नहीं समझता लेकिन दक्षिण एशिया में रेडिकलाइजेश की समस्या सिर्फ और सिर्फ इस एक धड़े और फिरके की वजह से है.


मूल पोस्ट-

धर्म पूछकर गोली मारने वाली बात झूठी है!

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