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हमेशा यादों में रहेंगे विजय राय!

09 May 2025 मई‚ शुक्रवार को दिल्ली का लोधी रोड स्थित चिन्मय मिशन सभागार शोकाकुल था। मंच पर डॉक्टर विजय प्रताप राय का चित्र लगा हुआ था जिस पर माला चढ़ी हुई थी। सभागार में परिजनों के साथ–साथ दिल्ली के सभी न्यायालय के न्यायाधीश‚ बार काउंसिल के सदस्यगण‚ प्रिंट और टीवी के पत्रकार‚ नौकरशाह‚ राजनेता आदि बड़ी संख्या में उपस्थित थे‚ अपने प्रिय वरिष्ठ पत्रकार राष्ट्रीय सहारा के समूह संपादक को अंतिम प्रणाम करने के लिए‚ अपनी श्रद्धांजलि अर्पित करने के लिए।

६ जुलाई‚ १९६७ को जन्मे विजय राय ने मात्र ५८ वर्ष की आयु में हृदय गति रुकने के कारण ४ मई २०२५ को अंतिम सांस ली। वह पिछले कुछ समय से अस्वस्थ थे। सभा में डॉ विजय राय को याद करते हुए उनसे जुड़े संस्मरण सुनाए जा रहे थे। उनके मानवीय और व्यावसायिक गुणों का स्मरण किया जा रहा था। किसी ने कहा कि वह मस्तमौला और खुशमिजाज व्यक्ति थे।

किसी ने उन्हें हर समस्या को सुलझाने में सिद्धहस्त और हर मर्ज की दवा बताया तो किसी ने उन्हें सरल‚ सहज और फक्कड़ किस्म के व्यक्ति के रूप में निरूपित किया तो किसी ने उन्हें बेहद खुद्दार बताया तो किसी ने उन्हें अपने पत्रकारीय व्यवसाय के प्रति निष्ठावान और अपने समय के महत्वपूर्ण पत्रकार के रूप में प्रतिष्ठित किया। वास्तव विजय राय के बारे में जो कुछ भी कहा जा रहा था उसमें अतिश्योक्ति नहीं थी। विजय राय थे भी ऐसे ही। हर वक्तव्य बता रहा था कि सबको अपनी उपस्थिति का अहसास करने वाला एक व्यक्तित्व असमय ही विदा ले गया है। विजय राय का जन्म उत्तर प्रदेश के कुशीनगर जिले में हुआ था। उनके पिता उत्तर प्रदेश पुलिस की सेवा में थे।

विजय राय ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा गृह जनपद कुशीनगर तथा निकटवर्ती जनपद देवरिया के स्कूलों में प्राप्त की और इसके बाद वह बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के छात्र बने। इस दौर की साहित्यिक और सार्वजनिक गतिविधियों में भागीदारी ने उनके भविष्य की दिशा निश्चित कर दी। हालांकि उन्होंने अपना पेशेवर जीवन एक अध्यापक के तौर पर शुरू किया था‚ लेकिन उनका वास्तविक कर्म क्षेत्र समाचार की दुनिया में था।

वह राष्ट्रीय सहारा अखबार से एक संवाददाता के तौर पर जुड़े और बाद में टेलीविजन तथा प्रिंट पत्रकारिता में अनेक पदों की जिम्मेदारियाां संभालते हुए अंततः राष्ट्रीय सहारा अखबार के समूह संपादक बने। सहारा मीडिया में प्रमुख पदों पर रहते हुए टेलीविजन तथा प्रिंट पत्रकारिता को तेजी से बदलती हुई परिस्थितियों के अनुकूल ढालने और उसे निरंतर प्रभावी रखने में उनकी भूमिका बेहद महत्वपूर्ण थी।

वह पत्रकार के रूप में एक संवाददाता रहे हों या संपादक‚ अपनी क्षमता की अधिकारिता से अपना विशिष्ट स्थान बनाए रहे। अपने चढ़ते पदानुक्रम में वह वरिष्ठों से स्नेह पाते रहे तो कनिष्ठों को स्नेह लुटाते भी रहे। खबरों की जैसी समझ रखते थे वैसी कम लोगों में ही होती है। उनकी एक खबर बहुत चर्चित रही थी‚ जिसमें उन्होंने सुरक्षा कर्मियों को कड़ी धूप में बचाने के लिए उन्हें छतरी प्रदान करने का सुझाव दिया था। उनका यह सुझाव मान भी लिया गया था। उनका व्यावसायिक पक्ष जितना मजबूत था उतना ही व्यावहारिक पक्ष भी।

वह जिंदादिल इंसान थे जो विषम परिस्थितियों में भी बिना घबराए अपने सहकर्मियों के संबल बने रहते थे। निश्छल और हंसमुख किस्सागोई इस तरह कि आप उन्हें सुनना शुरू करें तो सुनते ही रहें और बीच–बीच में ठहाके भी लगाते रहें। वह विनम्र थे और उदार भी। अपने सहकर्मियों के सुख–दुख में शामिल रहना उनके स्वभाव का हिस्सा था।

बहुत कम लोग होते हैं जिन्हें अपने सहकर्मियीं का सहज सम्मान प्राप्त होता है‚ बिना किसी मिलावट–बनावट के। विजय राय को यह सम्मान प्राप्त था। किसी भी अधीनस्थ कर्मी को उनसे मिलने और अपनी किसी भी समस्या को उनके सामने रखने में कभी भी संकोच नहीं होता था। कारण यह कि उन्हें भरोसा होता था कि उनकी समस्या सुनी भी जाएगी और समुचित तरीके से सुलझाई भी जाएगी। अपने पूरे कार्यकाल के दौरान वह प्रबंधन और अखबारकर्मियों के मध्य सेतु का काम करते रहे। वह ऐसे व्यक्ति थे जिन पर प्रबंधन तंत्र को भी उतना ही भरोसा था जितना की अखबार से संबंधित विभिन्न विभागों के कार्यकर्तागण को। अनेकानेक पत्रकारीय पदों पर कार्य करते हुए उन्होंने राजनीतिक–सामाजिक जीवन में गहरी पैठ बनाई थी। स्थाई संबंध स्थापित किए थे और गहरे मित्र बनाए थे।

उनके निधन पर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू‚ लोक सभा अध्यक्ष ओम बिरला‚ उत्तर प्रदेश की राज्यपाल आनंदीबेन‚ हरियाणा के राज्यपाल बंडारू दत्तात्रेय‚ हिमाचल प्रदेश के राज्यपाल शिव प्रताप शुक्ला‚ उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ‚ हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी‚ उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी आदि अनेक शीर्षस्थ महानुभावों ने जो शोक संदेश प्रेषित किए वे ड़ॉ. विजय राय की लोकप्रियता के ही प्रतीक थे।

श्री विजय राय का निधन उनकी पत्नी श्वेता राय‚ पुत्री शिवी राय‚ माता कलावती व पिता महिमा राय और भाइयों प्रदीप राय और विनय राय आदि परिजनों की व्यक्तिगत क्षति तो है ही‚ उनके सहकर्मियों ‚ मित्रों और परिचितों की भी क्षति है जिसकी भरपाई कभी नहीं हो सकती। वह उन सभी की स्मृतियों में बने रहेंगे जो उन्हें चाहते थे और उनके संपर्क–सान्निध्य से लाभान्वित हुए।
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आपको भारी मन से अलविदा डॉक्टर विजय राय!

राजीव मंडल-

हर दिल अजीज मिजाज था उनका जो कभी नहीं सोचा था‚ वो हो गया। भैया नहीं रहे! अपने विजय भैया! ४ मई को तड़के ३.३० बजे ईश्वर ने उन्हें अपने पास बुला लिया। अभी उनकी जाने की उमर नहीं थी‚ बिल्कुल भी नहीं थी। अभी तो उन्हें बहुत कुछ करना था। समाज के लिए‚ संस्थान के लिए‚ अपने चहेतों और शुभचिंतकों के लिए। बस वो अपने बारे में तनिक मात्र भी नहीं सोचते थे। हां‚ अपने बारे में उन्होंने कभी भी नहीं विचारा।

कितनी भी प्रतिकूल परिस्थितियां आई‚ उन्होंने भगवान शिव की तरह; परेशानी रूपी विष का प्याला अकेले ही पिया‚ अकेले ही दुश्वारियों का सामना किया। बिना किसी को कुछ बताए–जताए‚ वह हल्की सी मधुर किंतु मजबूत मुस्कान के साथ उस संकट को हर लेते थे। यह संकट को हरने वाला स्वभाव उनके खून में था.दूसरों को मदद करने के लिए वो हर उस सीमा को लांघ जाते थे‚ जिसकी कोई कल्पना ही नहीं कर सकता। इस बात के एक या दो नहीं सैकड़ों उदाहरण मौजूद हैं। हर किसी के लिए यह आसान नहीं होता‚ मगर भैया तो दूसरी मिट्टी के बने थे! मदद के लिए हमेशा आगे रहना उनकी फितरत थी।

उनकी छोटी सी मगर असरदार जिंदगी में तीन शहरों का योगदान अप्रतिम रहा। पहला; उनकी जन्मस्थली कुशीनगर। वही कुशीनगर जो भगवान बुद्ध के जीवन का अंतिम चरण था। जहां बुद्ध को मोक्ष प्राप्त हुआ‚ मगर विजय भैया के लिए तो उनका अवतरण स्थल देश–दुनिया पर छा जाने की शुरुआत थी। एक छोटे से जिले से आकर देश के हर खास–ओ–आम के दिल की धड़कन बन जाने का नाम ही विजय राय थे। दूसरा; काशी। ॥ बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय (बीएचयू) में पढ़ाई के दरम्यिान ही काशी उनके दिलोदिमाग में बस गया। वैसे भी‚ जो उन्हें करीब से जानते हैं‚ उन्हें पता होगा कि बनारस उनके मानस पटल पर शायद सबसे ज्यादा प्रभाव ड़ालने वाला शहर रहा। कह सकते हैं कि बनारस के फक्कड़पन में भैया जैसे फकीर भी रम गए।

अल्हड़ बनारस अपनी बेफिक्री और फक्कड़पन के लिए दुनियाभर में मशहूर है। लोगों का ऐसा विश्वास है कि यहां मरने पर मोक्ष मिलता है‚ लेकिन गुरु बनारस मरना नहीं‚ जीना सिखाता है। जीने का यही फलसफा विजय भैया को औरों से अलग दिखाता है। जिओ तो जिंदादिली से–यह उनके जीवन का सूत्र था। तीसरा शहर था दिल्ली। देश की राजधानी जहां की चमक–दमक में कई पत्रकार पत्रकारिता छोड़ कर वो सारे धत्कर्म करते देखे जाते हैं‚ जिससे भैया को सख्त नफरत थी। ईमानदारी से अपने काम को बिना शोर मचाए अंजाम देने वाले गिनती भर पत्रकार आज होंगे। बिना शक–शुबहा के विजय भैया उनमें सबसे अव्वल हैं॥।

काल के क्रूर पंजे ने उस शख्स को हम लोगों से दूर कर दिया‚ जो बेहद मिलनसार‚ हंसमुख‚ प्रेरणादायी और बहुत संवेदनशील था। भैया को बोलने‚ खाने और पहनने का बहुत शौक था। अच्छा बोलना‚ लजीज पकवान के लिए कहीं भी और कितनी भी दूर जाने का मोह वह नहीं त्याग सकते थे। पहनने का सलीका भी उनका लाजवाब था। खासकर पठानी कुर्ता–पायजामा उनपे सबसे ज्यादा फबता था।

ईश्वर की लीला कहें या क्रूरता–कि बीमारी के चलते पिछले अगस्त महीने से ईश्वर ने उनका बोलना‚ खाना और पहनना सब कुछ छीन लिया था। खैर‚ किसी को भी बुलाने का यह ईश्वरीय तरीका है। इस सच से कोई न तो भाग सकता है और न इनकार कर सकता है। बस‚ एक प्रार्थना भगवान से जरूर है कि अगले जन्म में उनके जैसा होने का आशीर्वाद जरूर दे दें। ओम शांति!

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