मनोज अभिज्ञान-
दुर्लभ खनिजों की दौलत पर अब देश के सबसे बड़े कॉरपोरेट शिकारी की नजर है—कहीं ऐसा न हो कि भारतीय सरकारी खनन कंपनी IREL की धीमी रफ्तार और सरकारी रणनीति की आड़ में rare earths की पूरी तिजोरी अडानी के हवाले कर दी जाए! जिस संपदा को चीन ने हथियार बना रखा है, उसे भारत कॉरपोरेट सौदेबाज़ी में झोंक दे, तो समझिए देश को अगला झटका टेक्नोलॉजी, रक्षा और आत्मनिर्भरता को लगेगा। याद रखिए, चीन ने इन्हीं rare earths के दम पर अमेरिका को टैरिफ कम करने पर मजबूर किया—मतलब ये खनिज सिर्फ धातु नहीं, जियो पॉलिटिक्स की रीढ़ हैं। यह वक्त है भारतीय सरकारी खनन कंपनी IREL को मज़बूत करने का, न कि उसे दरकिनार करके महत्वपूर्ण स्ट्रेटेजिक रिसोर्सेज को कॉरपोरेट्स की प्लेट में परोसने का।
अंदर की खबर ये है कि सरकार के भीतर उच्च स्तर पर चर्चा चल रही है कि दुर्लभ खनिजों की प्रोसेसिंग और मैग्नेट निर्माण को बड़े कॉरपोरेट्स के हवाले कर दिया जाए, ताकि तेज़ी से बुनियादी ढांचा खड़ा किया जा सके—और इसी क्रम में अडानी समूह का नाम बार-बार सामने आ रहा है। कहा जा रहा है कि IREL की तकनीकी सीमाओं और धीमी गति को देखते हुए कुछ नीति-निर्माता इसे रणनीतिक प्राइवेट पार्टनरशिप में बदलने के पक्ष में हैं। हालांकि सार्वजनिक रूप से अभी तक कोई घोषणा नहीं हुई है, लेकिन जिस तरह की लॉबिंग चल रही है, उससे संकेत मिलते हैं कि देश की दुर्लभ खनिज संपदा एक बार फिर राष्ट्रीय हित के नाम पर निजी हाथों में सौंपे जाने की तैयारी में है।
पिछले 13 वर्षों से जापान के साथ चल रहे एक महत्वपूर्ण समझौते को भारत ने निलंबित करने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। यह समझौता भारतीय सरकारी खनन कंपनी IREL और जापानी फर्म Toyota Tsusho के बीच था, जिसके तहत IREL द्वारा खनन किए गए दुर्लभ खनिज, विशेषकर नियोडिमियम (neodymium), जापान भेजे जाते थे। लेकिन अब भारत ने तय किया है कि वह अपने घरेलू उद्योगों की ज़रूरतों को प्राथमिकता देगा, और चीन पर अपनी निर्भरता कम करेगा।
दुनिया की ऑटो और हाई-टेक इंडस्ट्री के लिए दुर्लभ खनिजों की सबसे बड़ी आपूर्ति चीन से होती है। लेकिन बीते कुछ महीनों से चीन ने इन खनिजों के निर्यात पर नियंत्रण कड़ा कर दिया है। अप्रैल से चीन ने अपने एक्सपोर्ट पर लगाम कस दी, जिससे वैश्विक कंपनियों में खलबली मच गई है। ऑटोमोबाइल उद्योग को विशेष रूप से झटका लगा है क्योंकि इलेक्ट्रिक वाहनों में इस्तेमाल होने वाले शक्तिशाली मैग्नेट नियोडिमियम से बनते हैं। इस हालात को देखते हुए भारत ने अपने दुर्लभ खनिजों को रणनीतिक संपत्ति की तरह देखना शुरू कर दिया है।
IREL की ओर से जापान को अभी जो आपूर्ति हो रही है, वह 2012 में हुए द्विपक्षीय समझौते के तहत है। 2024 में जापान को 1,000 मीट्रिक टन से अधिक दुर्लभ खनिज भेजे गए थे, जो IREL के कुल उत्पादन का लगभग एक-तिहाई हिस्सा है। हालांकि यह आंकड़ा चीन की तुलना में बहुत छोटा है, लेकिन जापान के लिए यह वैकल्पिक स्रोत बेहद जरूरी है—खासकर तब जब चीन अनिश्चित नीति अपनाए।
दरअसल, भारत के पास विश्व में पांचवां सबसे बड़ा दुर्लभ खनिज भंडार है—करीब 6.9 मिलियन मीट्रिक टन। लेकिन यह विडंबना है कि भारत अभी तक एक भी ऐसा संयंत्र नहीं खड़ा कर पाया है जो इन खनिजों से मैग्नेट बनाकर खुद की ज़रूरतें पूरी कर सके। भारत में जितने भी दुर्लभ अर्थ मैग्नेट उपयोग में आते हैं, वे अधिकतर चीन से आयात किए जाते हैं। पिछले वित्तीय वर्ष में भारत ने करीब 53,748 मीट्रिक टन मैग्नेट आयात किए, जो ऑटोमोबाइल, विंड टरबाइन, मेडिकल डिवाइसेज़ और रक्षा उत्पादों में काम आते हैं।
IREL का कहना है कि वह अब घरेलू स्तर पर प्रसंस्करण (processing) और रिफाइनिंग की क्षमता विकसित करना चाहता है, ताकि विदेशी निर्भरता से मुक्ति पाई जा सके। इसके लिए वह चार नए खदानों के लिए मंजूरी की प्रतीक्षा कर रहा है। कंपनी ने ओडिशा में एक एक्सट्रैक्शन प्लांट और केरल में एक रिफाइनिंग यूनिट स्थापित की है। उसका लक्ष्य है कि 2026 तक वह 450 मीट्रिक टन नियोडिमियम का उत्पादन करे और 2030 तक इसे दोगुना कर दे।
लेकिन खनिज निकालना ही काफी नहीं है—उससे मैग्नेट बनाना, फिर उन्हें औद्योगिक उपयोग के योग्य बनाना एक लंबी तकनीकी प्रक्रिया है। इसके लिए IREL एक कॉर्पोरेट साझेदार की तलाश में है, जो मैग्नेट निर्माण में सहयोग दे सके, खासकर ऑटो और फार्मास्युटिकल सेक्टर के लिए। सरकार भी इस दिशा में सक्रिय हुई है और जल्द ही दुर्लभ खनिजों के प्रसंस्करण तथा मैग्नेट निर्माण इकाइयों को स्थापित करने वाली कंपनियों को प्रोत्साहन देने की योजना तैयार कर रही है।
IREL जैसे सार्वजनिक उपक्रमों को विकसित कर आत्मनिर्भर भारत का सपना साकार किया जा सकता है, लेकिन यदि नीति निर्धारक इस रणनीतिक क्षेत्र को Ease of Doing Business के नाम पर निजीकरण की तरफ मोड़ दें, तो खतरा है कि देश की दुर्लभ खनिज संपदा भी उन कुछ हाथों में चली जाए, जिनके पास पहले से ही बंदरगाह, हवाई अड्डे, बिजली और रक्षा निर्माण की चाबियाँ हैं। अडानी समूह पहले ही ऊर्जा और खनिज संसाधनों के क्षेत्र में आक्रामक विस्तार कर रहा है—ऐसे में यह आशंका स्वाभाविक है कि rare earth जैसे रणनीतिक संसाधनों की प्रोसेसिंग और आपूर्ति का एकाधिकार भी उनके हाथों में न चला जाए।
दुर्लभ खनिज सिर्फ व्यापारिक संसाधन नहीं हैं, ये तकनीकी संप्रभुता, रक्षा तैयारियों और भविष्य की औद्योगिक नीतियों की रीढ़ हैं। इसलिए इस पूरे क्षेत्र में पारदर्शिता, वैज्ञानिक नेतृत्व और सार्वजनिक हिस्सेदारी जरूरी है। भारत को चाहिए कि वह चीन के centralized model से अलग, लोकतांत्रिक और सार्वजनिक हित आधारित मॉडल अपनाए—जिसमें राज्य के स्वामित्व वाली कंपनियाँ, वैज्ञानिक संस्थान और MSMEs मिलकर स्थायी आपूर्ति श्रृंखला तैयार करें। यही रास्ता भारत को आत्मनिर्भर बनाएगा।


