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सियासत

अब शुद्ध पेट्रोल के दाम में मिलेगा मिलावटी पेट्रोल! सरकार की ‘हरित लूट’ स्कीम!

अब आप जब पेट्रोल पंप पर अपनी गाड़ी में पेट्रोल भरवाएंगे, तो समझ लीजिए शुद्ध नहीं, बल्कि मिलावटी ईंधन ले जा रहे हैं — और वो भी पूरी कीमत चुकाकर! मोदी सरकार की “ग्रीन एनर्जी” के नाम पर चलाई जा रही E27 ब्लेंडिंग स्कीम को लेकर ज़बरदस्त विरोध के सुर उठने लगे हैं। दावा है कि इस स्कीम में जनता को धोखे में रखकर सस्ते एथनॉल को महंगे पेट्रोल में मिलाकर बेचा जा रहा है।

इंजन की सेहत से खिलवाड़, उपभोक्ता की जेब पर वार!
विशेषज्ञों के मुताबिक एथनॉल मिश्रित पेट्रोल से गाड़ियों की माइलेज में 25% तक की गिरावट देखी जा रही है। यही नहीं, यह ईंधन इंजन को अंदर से खोखला कर रहा है, खासकर उन गाड़ियों में जो 2023 से पहले बनी हैं। यानी, न तो उपभोक्ताओं को कीमत में कोई राहत मिल रही है, और ऊपर से गाड़ियों की मुरम्मत में खर्चा और बढ़ रहा है।

‘ग्रीन एनर्जी’ या ‘ग्रीन डकैती’?
सरकार की इस नीति को लेकर सवाल उठ रहे हैं कि जब एथनॉल पेट्रोल से सस्ता है, तो कीमतें कम क्यों नहीं हुईं? क्या ये ‘ग्रीन एनर्जी’ के नाम पर दिनदहाड़े डकैती नहीं? आलोचकों का आरोप है कि इसका असली फायदा कुछ चुनिंदा शुगर लॉबी को मिल रहा है, जो एथनॉल सप्लाई कर रही हैं। यानी ‘हरित क्रांति’ की आड़ में हो रही है हरित बंदरबांट।

जनता भुगतेगी खामियाज़ा
सरकार की योजना है कि अगस्त 2025 तक देशभर में E27 यानी 27% एथनॉल मिश्रण लागू कर दिया जाए। लेकिन ज़्यादातर पुराने वाहन अभी इसके लायक नहीं हैं। इसका सीधा असर आम लोगों पर पड़ेगा, जिनकी गाड़ियां जल्दी ब्रेकडाउन होने लगेंगी और रिपेयर कॉस्ट बढ़ जाएगी।


आईपी सिंह-

एथनोल को गडकरी जी प्रमोट क्यों कर रहे है, उसका कारण ये हैं। नितिन गडकरी की 17 चीनी मिलें हैं, मुख्यतः विदर्भ में।

उनके परिवार की कंपनी Manas Agro हर साल 2 करोड़ लीटर एथनॉल बनाती है। बेटा एथनॉल प्रोडक्शन में शामिल है।

गडकरी खुद एथनॉल पॉलिसी को प्रमोट करते हैं — पेट्रोल में 20% एथनॉल मिलाने का समर्थन।

उन्होंने एथनॉल पर GST घटाने की मांग भी की है (18% → 5%)।

नितिन गडकरी जी ने पेट्रोल में 20 प्रतिशत एथेनॉल मिलाने की नीति बनाई है जबकि भारत में कार निर्माता कंपनिया एथेनॉल मिक्स पेट्रोल से चलने वाले इंजन अबतक नहीं बने हैं ऐसे में एथेनॉल मिक्स पेट्रोल कारों के इंजन को भारी नुकसान पहुंचा रहा है।

सवाल: क्या नीतियां जनता के लिए बन रही हैं, या निजी मुनाफ़े के लिए…..


लॉयर रवीश-

जब सरकार एथनॉल को पेट्रोल में 20% तक मिलाने की नीति बनाती है और उसके सबसे बड़े प्रवक्ता खुद नितिन गडकरी होते हैं, तो यह सवाल उठना लाज़मी है कि आखिर इसके पीछे लाभ किसे हो रहा है … देश को या किसी व्यक्ति विशेष को?

देश में जिन कंपनियों को एथनॉल उत्पादन के लाइसेंस दिए गए हैं, उनमें प्रमुख रूप से Mahatma Sugar and Power Ltd, Purti Alternative Fuels Pvt Ltd, Purti Power and Sugar Ltd, Wainaganga Sugar and Power Ltd, CIAN Agro Industries & Infrastructure Ltd, Manas Agro Industries, Purti Agrotech, और Yash Agro Energy जैसे नाम शामिल हैं। ये सभी कंपनियाँ नितिन गडकरी और उनके परिवार के प्रत्यक्ष या परोक्ष स्वामित्व वाली हैं।

उदाहरण के लिए, Purti Group की स्थापना स्वयं नितिन गडकरी ने की थी। बाद में उन्होंने अपने पद से इस्तीफा तो दे दिया, लेकिन कंपनी के संचालन और लाभांश से परिवार आज भी जुड़ा है। Manas Agro और Wainaganga Power जैसी कंपनियाँ उनके बेहद करीबी लोगों के नाम पर हैं।

CIAN Agro Industries & Infrastructure Ltd एक सार्वजनिक सूचीबद्ध कंपनी है, जिसके निदेशक मंडल में नितिन गडकरी के पुत्र निखिल गडकरी सक्रिय हैं। यही कंपनी दक्षिण भारत के Ram Charan Group के साथ समझौता कर चुकी है, ताकि भविष्य में CO₂ से एथनॉल बनाया जा सके …. यानि केवल गन्ने पर निर्भर न रहना पड़े, और भविष्य में भी एथनॉल के बाजार पर पकड़ बनी रहे।

अब सवाल उठता है कि जब एथनॉल सरकार के लिए इतना महत्वपूर्ण बना दिया गया है कि हर वाहन में 20% तक अनिवार्य किया जा रहा है, तब क्या यह नीति देशहित में है या एक औद्योगिक परिवार के फायदे के लिए बनाई गई है?

एथनॉल, पेट्रोल की तुलना में सस्ता है, लेकिन इसके मिश्रण से गाड़ी के इंजन पर बुरा असर पड़ता है। खासकर पुरानी गाड़ियों में यह जल्द इंजन को जर्जर कर देता है। अब चूंकि सरकार ने इसका 20% मिश्रण अनिवार्य कर दिया है, तो ग्राहक को दोहरा नुकसान होता है .. एक तो गाड़ी जल्दी खराब होगी, दूसरा मरम्मत या नई गाड़ी खरीदने में उसे अतिरिक्त खर्च उठाना होगा।

इससे फायदा किसे होगा? ऑटो कंपनियों को जो नई गाड़ियाँ बेचेंगी, और उन कंपनियों को जो एथनॉल बेचेंगी .. और वे कंपनियाँ वही हैं जिनका नाम ऊपर लिया गया है।

दूसरी ओर, आप गौर करें तो कई महीनों से पेट्रोल के दाम स्थिर हैं, जबकि कच्चे तेल की कीमतें बढ़ी हैं। दरअसल, इसमें भी एक चाल है। पेट्रोल को सस्ता दिखाने के लिए उसमें सस्ता एथनॉल मिलाया जा रहा है, जिससे कुल लागत में गिरावट आती है। लेकिन उपभोक्ता को बताया नहीं जाता कि अब वह शुद्ध पेट्रोल नहीं भरवा रहा, बल्कि एक ऐसा मिश्रण जो उसकी गाड़ी के लिए नुकसानदेह है।

इससे सरकार को क्या फायदा? कोई विरोध नहीं होता। जनता को लगता है कि महंगाई नहीं बढ़ी, लेकिन धीरे-धीरे उसका इंजन खराब हो रहा है। और जब इंजन खत्म होगा, तो ग्राहक नई गाड़ी खरीदेगा। इस तरह हर स्तर पर मुनाफा उन्हीं लोगों को जो इस चक्र की हर कड़ी में शामिल हैं नीति निर्माता, उद्योगपति, और वाहन निर्माता।

इस पूरे सिस्टम में जनता सबसे आख़िर में खड़ी है जिसे न तो एथनॉल का लाभ मिलता है, न पेट्रोल की शुद्धता, और न ही किसी योजना की पारदर्शिता।

अब सवाल है…इस नीतिगत फैसले से सबसे ज़्यादा किसे फायदा हुआ? जवाब साफ़ है: नितिन गडकरी और उनका व्यापारिक नेटवर्क। एक तरफ सड़क मंत्रालय, दूसरी तरफ एथनॉल उत्पादन और गाड़ी निर्माण से जुड़ी कंपनियाँ …. यानी नीति भी उन्हीं की, लाभ भी उन्हीं का।

जनता को लगा कि देश आत्मनिर्भर बन रहा है, लेकिन असल में आत्मनिर्भर सिर्फ कुछ परिवार हो रहे हैं। एथनॉल, सीमेंटेड रोड्स, और इलेक्ट्रिक व्हीकल सब्सिडी…. ये सब धीरे-धीरे एक बहुत बड़े कॉरपोरेट-पॉलिटिकल गठजोड़ की परतें खोल रहे हैं। और जब ये परतें पूरी तरह खुलेंगी, तो यह आज़ाद भारत का सबसे बड़ा घोटाला कहलाएगा।

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