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कैलाश विजयवर्गीय ने अनुराग द्वारी को नहीं, एनडीटीवी को घंटा कहा था!

हर्षवर्धन त्रिपाठी-

जिस शहर को देश में सबसे स्वच्छ शहर का दर्जा लगातार मिला हो, वहां जहरीला पानी पीने से लोगों की मौत होने पर सवाल पूछना कैलाश विजयवर्गीय को फोकट का सवाल लगता है। वीडियो सार्वजनिक हो गया तो कैलाश विजयवर्गीय ने माफी मांग ली, लेकिन सच यही है कि, कैलाश विजयवर्गीय “Serial Offender” है। इस आदमी की बददिमागी के किस्से मशहूर हैं। यह व्यक्ति माफी के लायक नहीं है। अनुराग द्वारी ने पत्रकार धर्म निभाया और यह भी ध्यान में रहे कि, अनुराग उसी एनडीटीवी पत्रकार हैं, जिसका स्वामित्व गौतम अदानी समूह के पास है। दुर्भाग्य यही है कि, ऐसे बददिमाग व्यक्ति को न भाजपा दंड दे पा रही है और न जनता। जनता जिता देती है और भाजपा मंत्री बना देती है। दुर्भाग्यपूर्ण है नरेंद्र मोदी जी!


कैलाश जी ने ये बात अनुराग जी के लिए नहीं, आपके लिए कही थी, एनडीटीवी। यकीन मानिए अकेले वो नहीं पूरा देश आपके बारे में यही कह रहा है। -मंजुल (कार्टूनिस्ट)



अरविंद चोटिया-

शाबाश पत्रकार साथी! बीतते हुए साल में सत्ता की हनक और पत्रकारिता की चमक एक साथ देखने को मिली है। निरंकुश सत्ता और शासकों की भाषा तो ऐसी ही होती है लेकिन पत्रकारिता में ऐसी दृढ़ता और ऐसी निडरता दिखना दुर्लभ हो गया है।

मध्यप्रदेश के वरिष्ठ मंत्री कैलाश विजयवर्गीय से जब पत्रकार अनुराग द्वारे ने दूषित पानी से हुई आठ मौतों पर सवाल किया तो मंत्री जी भड़क गए और बोले- अरे छोड़ो यार, फोकट प्रश्न मत पूछा करो।

दुबारा पूछने पर मंत्री जी ने अपने ही इंदौरी अंदाज में उतर आए। घंटा जैसे शब्द बोलने लगे। पत्रकार ने मंत्री जी की इस बदजुबानी का जमकर प्रतिरोध किया। मंत्री जी के चेले-चपाटे भी पत्रकार को ज्ञान देने लगे तो पत्रकार ने उनका भी सामना किया।

मध्यप्रदेश को ठीक से जानने वाले लोग कैलाश विजयवर्गीय को जरूर जानते हैं और उनकी “ताकत” को भी। उनके समर्थकों को भी। और वहां के पत्रकार तो खैर अच्छे से ही जानते हैं।

सब-कुछ जानते समझते हुए भी इस तरह टकरा जाना मैं समझता हूं कि एक साहस वाला काम है।

एक गौर करने वाली बात है कि मध्यप्रदेश में सत्ता भाजपा की है और चैनल अडानी का है। रिपोर्टर ने बहुत दृढ़तापूर्वक सवाल किए हैं।
बेझिझक, बेहिचक, बेधड़क।
बाकी आप समझ जाइए।


संकेत उपाध्याय-

नेताओं की एक ऐसी प्रजाति है जिसको जनता से घंटा फर्क नहीं पड़ता। इसीलिए ज़ुबान भी वैसी हो चली है।

अनुराग जी की पत्रकारिता हमेशा सच्चाई की स्वर्णिम इमारत रही है। इतिहास है लंबा। इतिहास एक और भी है। कैलाश विजयवर्गीय जी के बेतुके बयान का। उनके बैट पसंद पुत्र का भी। ज़ाहिर सी बात है ऐसे लोगों को सच्चाई सुनना अच्छा नहीं लगता।

नेताओं का हौसला इसलिए भी बढ़ता है क्योंकि अधिकांश पत्रकार चरण वंदना में लगे हुए हैं। अनुराग ने ऐसा कभी नहीं किया है। ना करेंगे।

उनकी बेबाकी को सलाम।

मेरी उम्मीद रहेगी अब की उनके पुराने चैनल के नए इंतज़ामिया उनके साथ खड़े रहें। नेताजी के तेज से प्रभावित होकर लिजलिजे न हो जाएँ।

कहीं सच्चाई से काम करने वाले अनुराग जी पर ही आंच न आ जाए।

वैसे उनको घंटा फ़रक नहीं पड़ेगा। हमेशा वैसे ही काम करते रहेंगे।

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