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साहित्य

नोएडा फिल्म सिटी की गुप्त कहानियों पर शशिकांत मिश्र की किताब “स्किन टेस्ट”!

राकेश कायस्थ-

जो दुनिया मैं बरसों पहले छोड़ आया, उसकी एक कहानी ने अचानक दरवाज़े पर दस्तक दी। नाम है स्किन टेस्ट और लेखक हैं, शशिकांत मिश्र। शशिकांत ने ‘इंडस्ट्री’ कहे जानेवाले इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के आंगन में लंबा वक्त बिताया है। हमने कभी साथ काम नहीं किया लेकिन मैं उन्हें बरसो से जानता हूं।

संतोषी और फक्कड़ मिजाज आदमी है। जमी-जमाई नौकरी मन ना लगने की वजह से छोड़ चुके हैं। अब पूर्ण कालिक व्यवसायिक लेखन में हाथ आजमा रहे हैं। खूब बिकने वाली उनकी किताब नॉन रेजिडेंट बिहारी पर वेब सीरीज़ बन रही है। शशिकांत नहीं चाहते कि कोई उन्हें साहित्यकार कहे। वह पाठकों के मनोरंजन और अपनी व्यवसायिक जरूरतों के लिए लिखते हैं। इतनी ईमानदारी और साफगोई बहुत कम लोगों में होती है।

श्रीलाल शुक्ल ने राग दरबारी में एक ऐसे गुप्त साहित्य का जिक्र किया है, जो गुप्त होकर भी गुप्त नहीं है बल्कि आहार निद्रा और भय में फंसे आदमियों की जिंदगी में सुखद लिटरेरी सप्लीमेंट का काम करता है। आप बस इतना ही समझ लीजिये नोएडा फिल्म सिटी ऐसी गुप्त कहानियों का ठिकाना है।

घंटे दो घंटे में पढ़ी जा सकने वाली शशिकांत मिश्र की किताब ‘इंडस्ट्री’ से छन-छनकर आ रही खबरों में रुचि रखने वालों के लिए ऐसा ही एक सुखद लिटरेरी सप्लीमेंट हो सकता है। खबर के नाम पर परोसा जाने वाला तमाशा, कास्टिंग काउच, स्वभाविक समझौते आदि इत्यादि का भरपूर यथोचित चित्रात्मक और हास्यपरक वर्णन मिलेगा। किसी वेब सीरीज़ के लिए रेडी टू कुक माल लगता है।

हजारी, लखपति नहीं बल्कि एक करोड़पति एंकर संपादक की हॉट केक की तरह बिकने वाली कहानी इस पुस्तक में शामिल है।

किसी विशेष प्रकार की अवस्था में किसी व्यक्ति विशेष के साथ किसी हाइवे पर पकड़े जाने पर जब उन्हें थाने लाया गया तो उन्होंने थानेदार को हड़काया और अपने दफ्तर के सबसे बड़े क्राइम रिपोर्टर फोन मिलाया जिसका नाम सुनते ही थानेदार भी एक पल के लिए डर गया।

जब थानेदार ने फोन थामा तो उधर से बड़ा क्राइम रिपोर्टर हा हूँ.. करता रहा फिर आवाज़ नहीं आ रही कहकर फोन रख दिया।

अस्तु- क्राइम रिपोर्टर ने अपने बॉस को थाने में अच्छी तरह पिट जाने दिया और उसके बाद बदहवास सा भागा-भागा पहुंचा और कहने लगा कि भाई साहब ये सब कैसे हो गया। मैं पुलिस वालों की ईंट से ईंट बजा दूंगा।

इन कथाओं की प्रमाणिकता लेखक ही बता पाएंगे। मुझे जब न्यूज चैनलों के कामकाज में ही दिलचस्पी नहीं है तो वहां काम करने वाले व्यक्तियों में क्या होगी।

फिर भी कोई ज़ोर देकर पूछेगा तो मुझे मोकामा वाले जन नायक अनंत सिंह की शैली उधार लेकर कहना होगा “ अरे कौन केकरा साथे सुत्तल है और कौन जागल है.. कौन इंटर्न के एंकर बनवा रहा है और कोन प्राइम टाइम से हटवा रहा है, इ सब फालतू बात हम कुच्छो जनबे नहीं करते है। टीबी के कोई बेवहार नहीं रह गया है। जे टीवी देखता है, उ पगला है।“

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