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क्या इलाहाबाद हाईकोर्ट कन्फ्यूज है? लिव-इन पर एक हफ्ते में दो विरोधाभासी फैसले! आख़िर पुरुष सच किसे माने?

शादीशुदा के लिव-इन को लेकर हाई कोर्ट की विरोधाभासी टिप्पणियों ने खड़े किए बड़े सवाल!

Can the Judges of Allahabad High Court please be kind to sit together and decide once and for all what exactly is the law ?

These are absolutely contradictory judgments on the same issue within a week.

-Deepika Narayan Bhardwaj

इलाहाबाद हाई कोर्ट के दो ताजा आदेशों ने लिव-इन रिलेशनशिप और शादी से जुड़े कानून को लेकर नई बहस छेड़ दी है, एक ही सप्ताह में कोर्ट की अलग अलग बेंचों ने बिल्कुल विपरीत रुख अपनाया, जिससे यह सवाल उठ रहा है कि आखिर कानून साफ है या न्यायिक व्याख्या में ही भ्रम है।

पहले मामले में हाई कोर्ट की एक बेंच ने स्पष्ट कहा कि शादीशुदा व्यक्ति बिना तलाक लिए किसी अन्य के साथ लिव-इन रिलेशनशिप में नहीं रह सकता और ऐसे रिश्ते को संरक्षण नहीं दिया जा सकता, इस आदेश में वैवाहिक संस्था और पति पत्नी के अधिकारों को प्राथमिकता दी गई।

वहीं कुछ ही दिनों बाद एक डिवीजन बेंच ने सुनवाई करते हुए कहा कि यदि दो वयस्क अपनी सहमति से साथ रह रहे हैं तो यह कोई अपराध नहीं है, अदालत ने साफ शब्दों में कहा कि नैतिकता और कानून अलग अलग हैं और केवल सामाजिक नैतिकता के आधार पर किसी को अपराधी नहीं ठहराया जा सकता। 

इस दूसरे मामले में कोर्ट ने न केवल लिव-इन कपल को राहत दी बल्कि पुलिस को उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करने के निर्देश भी दिए, साथ ही यह भी कहा कि यदि कानून के तहत कोई अपराध नहीं बनता तो समाज की राय अदालत के फैसले को प्रभावित नहीं कर सकती। 

इन दोनों आदेशों के बाद सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या न्यायपालिका खुद कंफ्यूज है या फिर मामला कानून की अलग अलग व्याख्या का है, दरअसल दोनों फैसलों की बुनियाद अलग है, एक में विवाह संस्था और कानूनी वैधता पर जोर है जबकि दूसरे में व्यक्तिगत स्वतंत्रता और सुरक्षा को प्राथमिकता दी गई है।

कानूनी जानकारों के मुताबिक भारत में लिव-इन रिलेशनशिप अवैध नहीं है लेकिन शादी रहते दूसरा रिश्ता कानूनी मान्यता नहीं पाता, ऐसे में कोर्ट अक्सर केस के तथ्यों के आधार पर अलग अलग निष्कर्ष पर पहुंचती है, यही वजह है कि एक ही मुद्दे पर अलग बेंचों के फैसले विरोधाभासी नजर आते हैं।

यह पूरा घटनाक्रम इस बात की ओर इशारा करता है कि लिव-इन और विवाह से जुड़े कानून अभी भी स्पष्ट नहीं हैं और जब तक सुप्रीम कोर्ट या संसद इस पर स्पष्ट दिशा तय नहीं करती तब तक ऐसे विरोधाभास सामने आते रहेंगे।

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