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दिल्ली

10 साल तक साये की तरह साथ रहे सुबोध अग्रवाल का ‘आप’ नेता गोपाल राय पर बड़ा हमला, बोले- करियर, कारोबार सब गंवाया, बदले में मिला सिर्फ इस्तेमाल

गोपाल राय मेरी तनख़्वाह का आधा पैसा ले लेते थे!

दिल्ली की राजनीति में उस समय नया विवाद खड़ा हो गया, जब आम आदमी पार्टी के वरिष्ठ नेता और बाबरपुर से विधायक गोपाल राय के पूर्व करीबी सहयोगी सुबोध अग्रवाल ने सोशल मीडिया पर लंबा बयान जारी कर अपने राजनीतिक सफर और गोपाल राय के साथ रिश्तों को लेकर कई गंभीर आरोप लगाए।

Bearded man in a light green kurta speaking, with a pale yellow mask resting under his chin, against a dark blue background.
गोपाल राय

करीब एक दशक तक गोपाल राय के साथ काम करने का दावा करने वाले सुबोध अग्रवाल ने आरोप लगाया कि उन्होंने अपना इंजीनियरिंग करियर, निजी भविष्य और पारिवारिक कारोबार तक राजनीति के लिए दांव पर लगा दिया, लेकिन जरूरत पड़ने पर उन्हें और उनके परिवार को पूरी तरह अकेला छोड़ दिया गया।

सुबोध अग्रवाल के मुताबिक, वर्ष 2013 में वह बदलाव की राजनीति के उद्देश्य से आम आदमी पार्टी से जुड़े और धीरे-धीरे गोपाल राय के सबसे भरोसेमंद सहयोगियों में शामिल हो गए। उन्होंने दावा किया कि 2014 की चुनावी हार और कठिन दौर में जब अधिकांश लोग साथ छोड़ गए, तब भी वह अंत तक गोपाल राय के साथ डटे रहे।

अपने बयान में उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि मंत्री बनने के बाद गोपाल राय ने उन्हें फर्राश-कम-प्यून के पद पर नियुक्त किया और मिलने वाले वेतन का अधिकांश हिस्सा बंगले के खर्च तथा अन्य मदों में देने को कहा। बाद में निजी सचिव (PS) बनाए जाने पर भी आधी सैलरी बंगले के खर्च में देने की शर्त रखी गई।

सुबोध अग्रवाल का कहना है कि उन्होंने निजी क्षेत्र में करियर बनाने का अवसर छोड़ दिया, अपने पिता की मृत्यु के बाद भी गोपाल राय के कहने पर पैतृक किराना व्यवसाय बंद कर पूरे परिवार के साथ दिल्ली आ गए और 2025 तक सरकार, संगठन तथा विधानसभा के सभी कार्य पूरी निष्ठा से करते रहे।

उन्होंने आरोप लगाया कि 2025 के विधानसभा चुनाव के बाद पार्टी की सरकार नहीं बनने पर उनकी आर्थिक और पारिवारिक स्थिति बेहद खराब हो गई। बैंक का लगभग 10 लाख रुपये का कर्ज, बंद हो चुका कारोबार और परिवार की जिम्मेदारियों के बीच उन्हें उम्मीद थी कि वर्षों की निष्ठा का कुछ प्रतिफल मिलेगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ।

सुबोध अग्रवाल के अनुसार, चुनाव के बाद गोपाल राय की ओर से केवल अपनी माताजी का मेडिकल कार्ड बनवाने के लिए फोन आया, जबकि उस समय उनकी अपनी मां भी गंभीर रूप से बीमार थीं। उनका आरोप है कि इसी घटना से उन्हें एहसास हुआ कि उनकी व्यक्तिगत परिस्थितियों की कोई चिंता नहीं की गई।

अपने बयान के अंत में सुबोध अग्रवाल ने दावा किया है कि उनके सभी आरोपों से जुड़े दस्तावेज और प्रमाण उनके पास सुरक्षित हैं तथा समय आने पर वह पूरे घटनाक्रम को क्रमवार सार्वजनिक करेंगे।

इस मामले में विधायक गोपाल राय की ओर से समाचार लिखे जाने तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई थी। उनका पक्ष प्राप्त होने पर उसे भी प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा।

यह खबर सुबोध अग्रवाल द्वारा सार्वजनिक रूप से जारी किए गए बयान और उसमें लगाए गए आरोपों पर आधारित है। इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।


पढ़िए सुबोध अग्रवाल का संपूर्ण पोस्ट-

मेरा सफरमेरी जुबानी

मैं सुबोध अग्रवाल! साल 2013 में इलेक्ट्रॉनिक्स एंड कम्युनिकेशन इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी करने के बाद मैं सरकारी नौकरी (PSU) की तैयारी के लिए दिल्ली आया था। लेकिन शायद किस्मत ने मेरे लिए कुछ और ही तय कर रखा था। उस समय मेरे अंदर एक अलग ही जुनून था—देश और राजनीति में बदलाव लाने का। इसी जुनून ने मुझे आम आदमी पार्टी के कार्यालय तक पहुँचा दिया।

वहीं मेरी पहली मुलाकात गोपाल राय जी से हुई। उनकी सोच और काम करने के तरीके से मैं इतना प्रभावित हुआ कि उनकी टीम का हिस्सा बन गया। घर से जो पैसे मेरी पढ़ाई और व्यक्तिगत खर्च के लिए आते थे, वही पैसे मैंने पार्टी के काम में लगाने शुरू कर दिए। उस समय मेरे मन में न किसी पद की इच्छा थी और न किसी वेतन की। मेरे लिए सबसे बड़ा उद्देश्य था बदलाव की उस लड़ाई का हिस्सा बनना।

2014: हार के बाद भी साथ नहीं छोड़ा

लोकसभा चुनाव 2014 के दौरान गोपाल राय जी की टीम के लगभग 40 लोग वाराणसी चुनाव प्रचार के लिए गए थे। चुनाव में करारी हार हुई। उससे पहले दिल्ली की सरकार भी इस्तीफा दे चुकी थी। पूरे संगठन में निराशा का माहौल था। बहुत से लोग पार्टी और टीम छोड़कर चले गए।

लेकिन गोपाल राय जी की उस पूरी टीम में केवल चार लोग अंत तक डटे रहे—कृष्णा, सुरेश, अमित और मैं।

इसके बाद हमने बाबरपुर विधानसभा में संगठन को दोबारा खड़ा करने का काम शुरू किया। मैं अपना पूरा सामान लेकर लगभग 24 घंटे गोपाल राय जी के साथ रहने लगा। इस दौरान कई कठिन परिस्थितियाँ आईं। परिवार भी मेरे इस फैसले से खुश नहीं था, लेकिन मैंने कभी उनका साथ नहीं छोड़ा।

2015: सरकार बनी, लेकिन मेरा लक्ष्य पद नहीं था

हमने दिन-रात मेहनत की। बाबरपुर में नई टीम बनाई, चुनाव की तैयारी की और 2015 का विधानसभा चुनाव पूरी ताकत से लड़वाया। पार्टी जीती और सरकार बनी। गोपाल राय जी मंत्री बने।

एक मंत्री के पास 10 निजी पद होते हैं। लगभग सभी पद भर दिए गए थे। अंत में केवल फर्राश-कम-प्यून का पद बचा था। गोपाल जी ने मुझसे कहा कि मैं वह पद स्वीकार कर लूँ। मैंने बिना किसी झिझक के हाँ कर दी।

उन्होंने कहा कि जो वेतन मिलेगा, उसका उपयोग बंगले के खर्च में करना होगा। मुझे इसमें भी कोई आपत्ति नहीं थी। क्योंकि मैं नौकरी करने नहीं आया था। मैं बदलाव की उस यात्रा का हिस्सा बनने आया था।

उस समय लगभग 15 से 20 हजार रुपये वेतन मिलता था। उसका अधिकांश हिस्सा बंगले के खर्च या गोपाल जी के गाँव में उनके पिताजी के खाते में जमा कर दिया जाता था। इससे पहले तक मेरा पूरा खर्च घर से ही आता था।

2017: फिर पढ़ाई की ओर

लगातार काम करते हुए मुझे महसूस हुआ कि मैंने अपने करियर के कई महत्वपूर्ण वर्ष पीछे छोड़ दिए हैं। इसलिए 2017 में मैंने आगे पढ़ाई करने का निर्णय लिया।

गोपाल राय जी से बात करके मैं बेंगलुरु चला गया। वहाँ C-DAC की परीक्षा दी और पहली ही कोशिश में सफल हुआ। मुझे C-DAC नोएडा में PG Diploma in VLSI में प्रवेश मिला। पढ़ाई के दौरान भी मेरा खर्च घर से ही चलता था।

2018: करियर छोड़कर फिर राजनीति

2018 की शुरुआत में पढ़ाई पूरी ही हुई थी कि गोपाल राय जी ने मुझसे कहा, “अब प्राइवेट नौकरी क्या करोगे अब हमारे साथ वापस आ जाओ।”

मुझे लगा कि उन्हें मेरी जरूरत है। इसलिए मैंने बिना ज्यादा सोचे हाँ कर दी। परिवार इस फैसले से बिल्कुल खुश नहीं था, लेकिन मैं अपना निर्णय ले चुका था।

18 फरवरी 2018 को मैं उनके साथ आयुर्वेदिक उपचार के लिए केरल के कोट्टक्कल गया। लेकिन अगले ही दिन सुबह मुझे खबर मिली कि मेरे पिताजी का हार्ट अटैक से निधन हो गया है।
यह मेरे जीवन का सबसे बड़ा झटका था।

मैं घर पहुँचा तो सब कुछ बदल चुका था। मैं परिवार का सबसे बड़ा बेटा था। माँ अकेली थीं। छोटा भाई दिव्यांग था। घर की किराने की दुकान थी, लेकिन उसे संभालने वाला कोई नहीं था।
मैंने उसी समय तय कर लिया कि अब दिल्ली नहीं जाऊँगा। गाँव में रहकर परिवार और दुकान दोनों संभालूँगा।

फिर एक नया मोड़

पिताजी के निधन के लगभग दो महीने बाद गोपाल राय जी मेरे गाँव आए। उन्होंने मुझसे और मेरे परिवार से कहा कि हम सब दिल्ली चलें। उन्होंने भरोसा दिलाया कि परिवार की चिंता उन्हें करने की जरूरत नहीं पड़ेगी।

मैंने उनसे साफ कहा कि यदि पूरे परिवार के साथ दिल्ली आना है तो घर चलाने का भी इंतज़ाम होना चाहिए।
उन्होंने कहा कि उनका PS का पद खाली है और वह मुझे मिल जाएगा। लेकिन एक शर्त थी—वेतन का आधा हिस्सा बंगले के खर्च में देना होगा।

यह फैसला मेरे लिए आसान नहीं था। फिर भी 2020 के विधानसभा चुनाव को देखते हुए और उनके भरोसे पर मैंने अपना पैतृक किराना व्यवसाय बंद कर दिया और 2019 में पूरे परिवार के साथ दिल्ली आ गया।

उस समय मेरी माँ, मेरा दिव्यांग भाई, मेरी पत्नी और मेरा पूरा परिवार मेरे साथ था। मेरी सैलरी लगभग 50 हजार रुपये थी। इसके बावजूद मैंने सरकार के काम, बाबरपुर विधानसभा के काम और गोपाल राय जी के व्यक्तिगत कार्य पूरी निष्ठा और ईमानदारी से संभाले।

2020 का चुनाव भी हमने पूरी मेहनत से लड़वाया और पार्टी फिर से सरकार बनाने में सफल रही।

2020 से 2025: बिना रुके काम

2020 से लेकर 2025 के विधानसभा चुनाव तक मैंने बिना किसी रुकावट के हर जिम्मेदारी निभाई। सरकार के काम, विधानसभा के काम, संगठन के काम और व्यक्तिगत जिम्मेदारियाँ—जो भी मिला, पूरी ईमानदारी से करता रहा। कई विपरीत परिस्थितियाँ भी आईं, लेकिन मैंने कभी पीछे हटना नहीं सीखा।

2025: सबसे कठिन दौर

2025 के चुनाव में पार्टी सरकार नहीं बना सकी, हालांकि गोपाल राय जी चुनाव जीत गए। यहीं से मेरे जीवन का सबसे कठिन दौर शुरू हुआ। मैं पूरे परिवार (माँ, दिव्यांग भाई ,पत्नी और बच्चे )के साथ सरकारी आवास में रह रहा था, जिसे अब खाली करना था।
मेरी पढ़ाई को दस साल हो चुके थे। निजी क्षेत्र का कोई अनुभव नहीं था। गाँव की दुकान पहले ही बंद कर चुका था।

इसी बीच 2024 में मैंने बैंक से लगभग 10 लाख रुपये का ऋण लेकर एक छोटा व्यवसाय शुरू किया था। काम धीरे-धीरे आगे बढ़ रहा था। लेकिन चुनाव आते ही मैंने सब कुछ छोड़कर लगभग आठ महीने पूरी ईमानदारी से चुनाव में लगा दिए। परिणाम यह हुआ कि व्यवसाय का पैसा बाजार में फँस गया और बैंक का कर्ज सिर पर आ गया।

मैं मानसिक रूप से पूरी तरह टूट चुका था। चुनाव के बाद मुझे उम्मीद थी कि इतने वर्षों के साथ और विश्वास के बाद कम से कम कोई यह पूछेगा कि आगे क्या करोगे, परिवार कहाँ रहेगा और तुम्हारी क्या योजना है। लेकिन ऐसा कभी नहीं हुआ।

इस बीच हमने आना काम तो कर दिया था लेकिन गोपाल जी जो काम बोल रहे थे वो काम हम कर रहे थे जैसे विधानसभा का फॉर्म भरना ,आई कार्ड बनवाना, बंगला खाली करना इत्यादि ।
सबसे ज्यादा तकलीफ तब हुई, जब चुनाव हारने के लगभग डेढ़ महीने बाद गोपाल राय जी का फोन आया। उन्होंने सिर्फ इतना कहा कि उनका मेडिकल कार्ड बनवा देना, क्योंकि उनकी माताजी का इलाज कराना है। उसी समय मेरी अपनी माँ भी बीमार थीं।

उस दिन मुझे पहली बार महसूस हुआ कि उन्हें मेरे या मेरे परिवार की चिंता नहीं है उन्हें केवल अपने काम से मतलब है ।
उस शाम मैंने घर जाकर माँ और पत्नी से बात की। दोनों ने एक ही बात कही—
गाँव हमारा अपना है। वहीं चलिए। वहीं से फिर से शुरुआत करेंगे।
उनकी यही बात मेरे लिए सबसे बड़ी ताकत बन गई।

नई शुरुआत

गाँव लौटना मेरे लिए आसान नहीं था। साल 2002 में मैं गाँव छोड़कर निकला था। उसके बाद पढ़ाई, राजनीति, संघर्ष, पिताजी का निधन और दिल्ली का जीवन—सब कुछ मेरी जिंदगी का हिस्सा बन गया था। इतने वर्षों बाद वापस लौटना आसान नहीं था, लेकिन मैंने तय कर लिया कि अब परिस्थितियों से भागना नहीं है, बल्कि उनका सामना करना है। आज मेरे पास शायद पहले जैसा पद या पहचान नहीं है, लेकिन मेरे पास मेरा आत्मसम्मान, मेरा परिवार और दोबारा खड़े होने का साहस है। यह कहानी किसी के प्रति नफरत या बदले की भावना से नहीं लिखी गई है। यह उस सफर की कहानी है, जिसमें मैंने अपने जीवन के सबसे महत्वपूर्ण वर्ष, अपना करियर, अपना पारिवारिक व्यवसाय और अपने कई सपने एक विश्वास और एक उद्देश्य के लिए समर्पित कर दिए।
आज मेरी स्थिति क्या है, यह आप सभी के सामने है। मैंने जो भी लिखा है, उसका एक-एक तथ्य और उससे जुड़े प्रमाण मेरे पास सुरक्षित हैं। यदि किसी को मेरी बातों या मेरी ईमानदारी पर संदेह हो, तो वो हमसे ले सकते हैं।

इस सफर में मैंने शायद बहुत कुछ खोया है लेकिन पाया कुछ नही है ।लेकिन मुझे इस बात का संतोष है कि मैंने कभी अपनी नीयत, अपनी ईमानदारी और अपनी निष्ठा से समझौता नहीं किया।
यह मेरी कहानी का अंत नहीं है, बल्कि एक नई शुरुआत है।
बाकी कहानी अभी बाकी है समय आने पर मैं पूरे घटनाक्रम को क्रमवार, तथ्यों और प्रमाणों के साथ आप सभी के सामने रखूँगा।

धन्यवाद।
आपका साथी
सुबोध अग्रवाल

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