सौरभ सोमवंशी-
लखनऊ। उत्तर प्रदेश विधानसभा के प्रमुख सचिव प्रदीप कुमार दुबे की नियुक्ति, सेवा विस्तार और वर्तमान में पद पर बने रहने की वैधता को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई से पहले ही इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ की डिवीजन बेंच ने स्वयं को मामले से अलग कर लिया।
न्यायमूर्ति जसप्रीत सिंह और न्यायमूर्ति इंद्रजीत शुक्ला की पीठ के समक्ष जैसे ही याचिकाकर्ता कर्मेश प्रताप सिंह की ओर से सुप्रीम कोर्ट की अधिवक्ता रीना एन. सिंह वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से पेश हुईं, दोनों न्यायाधीशों ने प्रदीप दुबे से पूर्व परिचय का हवाला देते हुए मामले की सुनवाई से खुद को अलग कर लिया।

क्या है मामला?
उत्तर प्रदेश विधानसभा में पूर्व सूचना अधिकारी रहे कर्मेश प्रताप सिंह ने याचिका दायर कर विधानसभा के प्रमुख सचिव प्रदीप कुमार दुबे की नियुक्ति और पद पर बने रहने की वैधता पर सवाल उठाए हैं।
याचिकाकर्ता की ओर से पैरवी कर रहीं अधिवक्ता रीना एन. सिंह का कहना है कि उन्होंने अदालत का दरवाजा खटखटाने से पहले मुख्यमंत्री, राज्यपाल, प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति समेत विभिन्न सक्षम प्राधिकारियों के समक्ष भी शिकायतें की थीं।


याचिका में आरोप लगाया गया है कि प्रदीप दुबे की प्रारंभिक नियुक्ति से लेकर वर्तमान तक का पूरा कार्यकाल नियमों और संवैधानिक प्रावधानों के अनुरूप नहीं है तथा वह बिना वैध अधिकार के पद पर बने हुए हैं।
नियुक्ति प्रक्रिया पर उठाए गए सवाल
याचिका के अनुसार, वर्ष 2009 में प्रदीप दुबे की नियुक्ति उत्तर प्रदेश विधानसभा सचिवालय (भर्ती एवं सेवा शर्तें) नियमावली, 1974 के प्रावधानों की अनदेखी कर की गई थी।
याचिकाकर्ता का दावा है कि चयन श्रेणी के पदों के लिए अधिकतम आयु सीमा 52 वर्ष निर्धारित थी, जबकि नियुक्ति के समय प्रदीप दुबे की आयु इससे अधिक थी।
याचिका के मुताबिक, 13 जनवरी 2009 को उन्होंने उत्तर प्रदेश न्यायिक सेवा से स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति (वीआरएस) ली और उसी दिन उन्हें प्रमुख सचिव (संसदीय कार्य) नियुक्त कर दिया गया। इसके छह दिन बाद 19 जनवरी 2009 को उन्हें विधानसभा सचिवालय के प्रमुख सचिव का अतिरिक्त प्रभार भी सौंप दिया गया।
याचिका में आरोप लगाया गया है कि यह पूरी प्रक्रिया बिना विज्ञापन, प्रतिस्पर्धी चयन, लोक सेवा आयोग से परामर्श तथा संविधान के अनुच्छेद 187 के तहत आवश्यक अनुमोदन के पूरी की गई।
सेवा विस्तार पर भी सवाल
याचिका में वर्ष 2010-11 में विधानसभा सचिवालय सेवा नियमों में किए गए कथित संशोधनों पर भी प्रश्न उठाए गए हैं। दावा किया गया है कि इन संशोधनों को विधानसभा के पटल पर नहीं रखा गया और इन्हीं के आधार पर प्रदीप दुबे को लगातार सेवा विस्तार दिया जाता रहा।
याचिकाकर्ता का यह भी आरोप है कि वर्ष 2011 में लागू की गई ‘सर्विस ट्रांसफर’ व्यवस्था के माध्यम से उनकी स्थिति को नियमित करने का प्रयास किया गया।
सेवानिवृत्ति के बाद भी पद पर बने रहने का आरोप
याचिका के अनुसार, प्रदीप कुमार दुबे 30 अप्रैल 2019 को 62 वर्ष की आयु पूरी कर चुके थे। याचिकाकर्ता का कहना है कि 17 मार्च 2020 को जारी अधिसूचना के तहत सेवानिवृत्ति आयु 65 वर्ष किए जाने का लाभ भी उन्हें नहीं मिल सकता था। इसके बावजूद वह आज भी प्रमुख सचिव के पद पर कार्यरत हैं, जबकि उनकी आयु 68 वर्ष से अधिक बताई गई है।
कोर्ट से क्या मांग की गई है?
याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट से प्रदीप कुमार दुबे के खिलाफ ‘क्वो वारंटो’ रिट जारी करने की मांग की है। इसके तहत अदालत किसी सार्वजनिक पद पर बैठे व्यक्ति से पूछती है कि वह किस वैधानिक अधिकार के आधार पर उस पद पर बना हुआ है।
याचिका में मांग की गई है कि—
- प्रदीप दुबे से उनके पद पर बने रहने का कानूनी आधार पूछा जाए।
- उनकी नियुक्ति और पद पर बने रहने को अवैध घोषित किया जाए।
- उन्हें पद से हटाया जाए।
- प्रमुख सचिव विधानसभा के पद पर विधिसम्मत चयन प्रक्रिया के माध्यम से नियुक्ति की जाए।
- मामले में कथित अनियमितताओं की जांच कराई जाए।
क्या होता है ‘क्वो वारंटो’?
‘क्वो वारंटो’ एक संवैधानिक रिट है, जिसे हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट तब जारी कर सकती है जब यह प्रश्न उठता है कि कोई व्यक्ति किसी सार्वजनिक पद पर किस अधिकार से बना हुआ है। यदि अदालत को लगता है कि संबंधित व्यक्ति वैधानिक रूप से उस पद का अधिकारी नहीं है, तो उसे पद छोड़ने का निर्देश दिया जा सकता है।


