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सुख-दुख

उस इंटरव्यू के बीच घरेलू सहायक की अनसुनी पर पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर का ‘टिपिकल ठाकुर’ जाग उठा था!

उमेश चतुर्वेदी-

साल 2002 का जाड़ा शुरू हो चुका था.. शायद नवंबर महीने की शुरूआत थी..दिल्ली की फिजाओं में सुबह-शाम हल्की ठंड पड़ने लगी थी..ऐसी ही एक शाम अपने उन दिनों के अखबार के साप्ताहिक स्तंभ ‘सप्ताह का साक्षात्कार’ के लिए चंद्रशेखर जी के पास पहुंचा. दिल्ली के तीन साउथ एवेन्यू के घर में जो गए हैं, उन्हें पता है। घर के अहाते में घुसते ही बायीं तरफ कुछ कुछ कमरे हैं, उनमें से सबसे आखिरी कमरे में मुझे इंतजार करने के लिए बोला गया..

थोड़ी देर के इंतजार के बाद बुलावा आया..चंद्रशेखर जी, उस कमरे से एक कमरा बाद के एक कमरे में इंतजार कर रहे थे..उन्होंने धोती और बंडी पहन रखी थी..बंडी एक तरह से सिली हुई बनियान होती है, जिसे पुराने लोग पहने थे। हल्की कुनकुनी ठंड की वजह से वे हल्की चादर भी लपेटे हुए थे..

तय विषय के मुताबिक, साक्षात्कार शुरू हुआ.. मैंने अपने सवालों की तोप खोल दी और वे जवाब देते रहे..

मेरे पास टेपरिकॉर्डर नहीं था.. लिहाजा मैं उनके जवाबों को जल्दी-जल्दी लिख रहा था..

इसी बीच उनके पास संदेश लेकर उनका एक कर्मचारी आया.. चंद्रशेखर जी के कोई पुराने समर्थक और स्नेही आए थे…वे पश्चिमी उत्तर प्रदेश…शायद अलीगढ़ के वे रहने वाले थे..

यह संदेशा पाते ही चंद्रशेखर जी ने इंटरव्यू रोक कर मुझसे पूछा, ‘क्या सर, उन्हें बुला लें, थोड़ी देर के लिए..’

चंद्रशेखर जी औपचारिक रूप से मिलने वाले लोगों को सर ही बोला करते थे.. चंद्रशेखर जी को मना करने की स्थिति में मैं था कहां?

उन्होंने उस स्नेही जन को बुला लिया.. वे अपने पोते के साथ आए थे..साथ में कुछ उपहार भी लाए थे.

उपहार में था देसी घी..एक छोटा झोला भी था..शायद उसमें कुछ खाने-पीने की चीजें थीं.. और साथ में एक डब्बा भी था..स्टील का दूध लाने वाला डब्बा..

चंद्रशेखर जी से दुआ-सलाम के बाद उन्होंने वह डब्बा खोल दिया.. उसमें वे लौकी यानी घिया का हलवा बनवाकर लाए थे..

डब्बे का उन्होंने ढक्कन खोला..चंद्रशेखर जी उसे देखते रहे..उसकी हल्की देसी गमक फैल गई.. उन्होंने चंद्रशेखर जी से इसरार किया कि इसे अभी खाया जाए..

चंद्रशेखर जी ने अपने घरेलू सहायक को आवाज दी.. वह पहले ही नए आगंतुक के लिए पानी रख गया था और शायद चाय बनाने गया था..

चंद्रशेखर जी की हांक सुनकर वह आया..चंद्रशेखर जी ने हलवा का डब्बा उसे पकड़ाया और उसे गरम करके कटोरियों में लाने को बोला..

इस बीच चंद्रशेखरजी की अपने समर्थक से बातचीत चलती रही..उनके पोते से भी मुखातिब रहे..इस बीच मैं शांत दर्शक बना रहा..

थोड़ी देर में छोटी-छोटी कटोरियों में घिया का वह हलवा लाया गया..हलवे की गमक ऐसी थी कि मुंह से पानी आ जाए.. घरेलू सहायक हलवा रखकर पानी लाने जाने लगा..

अभी वह अंदर जाने वाले दरवाजे को पार किया ही था..कि चंद्रशेखर जी ने उसे दोबारा हांक दी.. गुड्डू को बुलाओ… सहायक ने उनकी हांक को सुनकर भी शायद अनसुना किया..

चंद्रशेखर जी ने फिर कुछ तेज आवाज में उससे कहा, गुड्डू को भेजो.. घरेलू सहायक ने चंद्रशेखर जी की आवाज सुनकर भी कोई जवाब नहीं दिया..

इस बीच चंद्रशेखर जी के अंदर का टिपिकल ठाकुर जाग उठा.. जो लोग पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार हैं, उन्हें पता है कि टिपिकल ठकुरैती क्या होती है..

वे चिल्ला पड़े. ‘अरे घोंचू…XXXXXX मारूंगा दो जूता..जवाब नहीं दे रहा..नवाब का XXX हो गए हो..’

आम ठाकुरों के मुंह से ऐसी बातें मैंने अपने गांव-देहात में खूब सुनी है..इसलिए मुझे बहुत ज्यादा अचंभा नहीं हुआ..अचंभा इस बात से हुआ कि प्रधानमंत्री रहा शख्स भी ऐसी भाषा का इस्तेमाल करता है..

दर्शक भाव में बैठा मेरा पत्रकार इस दृश्य को देखकर जाग उठा.. थोड़े व्यंग्यात्मक लहजे में मैंने चंद्रशेखर जी से बोल दिया..

अब मैं समझ सकता हूं कि भारत का प्रधानमंत्री अधिकारियों से कैसे बोलता होगा.. मेरी बात सुन चंद्रशेखर जी के चेहरे पर मुस्कान आ गई..

‘क्या सर, मैंने कुछ गलत कहा क्या?’ \मेरी हंसी छूट गई.. चंद्रशेखर जी भी हंसने लगे.. साथ में हलवा प्राशन भी होता रहा..

चंद्रशेखर जी ने उस घरेलू सहायक के बारे में जानकारी दी, ‘सरवा मनबढ़ू हो गया है..रामबहादुर ने महाराजगंज से लाकर मुझ पर इसे थोप दिया है.. सुनता ही नहीं है..’

रामबहादुर माने रामबहादुर सिंह…बिहार की महाराजगंज सीट से दो बार सांसद रहे समाजवादी नेता.. यहां बताना जरूरी है कि वह घरेलू सहायक उनका मुंहलगा था..उनकी डांट का भी उस पर खास असर नहीं दिखा..

Three men in white shirts huddle over a document, discussing in what appears to be a small office.
कल उनकी पुण्यतिथि थी कल ही के दिन 2007 में उनका निधन हुआ था तब दिन रविवार था कल बुधवार था चित्र में तीन समाजवादी मधु दंडवते जॉर्ज फर्नांडिस और चंद्रशेखर

यह बताना जरूरी नहीं कि इसके बाद सप्ताह के साक्षात्कार के लिए देश के ज्वलंत मु्द्दों पर बात बाद में पूरी हुई.. वह इंटरव्यू मेरी पुरानी कतरनों में कहीं होगा..

आज भी मुझे फोटो खिंचाने में हिचक होती है..हालांकि आज का दौर ऐसा ही है..जहां जाओ, भले ही रिपोर्टिंग करने जाओ..फोटो खिंचवा लो..ताकि सनद रहे..

वैसे भारतीय जनसंचार संस्थान में मीडिया की नैतिकता की कक्षा में हमें पढ़ाया गया था, समाचार के OBJECT के साथ फोटो नहीं खिंचानी है..उसकी बात पर ताली भी नहीं बजानी है और उसके लिए खड़े होकर अभिवादन भी नहीं करना है..

मेरे स्वभाव में यह आज भी घुला हुआ है..शायद यही वजह कि चंद्रशेखर के साथ कोई फोटो नहीं ले पाया..

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