मुंबई। बॉम्बे हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि किसी नागरिक को केवल सरकार के खिलाफ नारे लगाने या सरकारी नीतियों का विरोध करने के आधार पर जिला बदर नहीं किया जा सकता। न्यायमूर्ति माधव जमदार की एकल पीठ ने सईद अहमद चौधरी के खिलाफ जारी जिला बदर का आदेश रद्द करते हुए पुलिस की कार्रवाई पर कड़ी टिप्पणी की।
सुनवाई के दौरान अदालत ने पुलिस से सवाल किया, “क्या सिर्फ इसलिए किसी व्यक्ति को जिला बदर किया जा सकता है क्योंकि उसने ‘बीजेपी सरकार मुर्दाबाद’ के नारे लगाए? क्या नागरिक सरकार के गुलाम हैं? क्या उन्हें विरोध प्रदर्शन करने या अपनी बात रखने का अधिकार नहीं है?”
CAA और ज्ञानवापी मुद्दे पर प्रदर्शन के बाद हुई थी कार्रवाई
सईद अहमद चौधरी ने नागरिकता संशोधन कानून (CAA), ज्ञानवापी मस्जिद विवाद और केंद्र सरकार के अन्य फैसलों के विरोध में कई धरने-प्रदर्शन आयोजित किए थे। इन प्रदर्शनों से जुड़े पांच एफआईआर का हवाला देते हुए मुंबई पुलिस ने दिसंबर 2025 में उन्हें एक वर्ष के लिए जिला बदर करने का आदेश जारी किया था। बाद में कोंकण मंडल के मंडलायुक्त ने भी इस आदेश को बरकरार रखा था।
‘सरकारी फैसलों का विरोध अपराध नहीं’
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट कहा कि किसी सरकारी नीति या फैसले का विरोध करना महाराष्ट्र पुलिस अधिनियम के तहत जिला बदर करने का वैध आधार नहीं हो सकता। अदालत ने पुलिस की कार्रवाई को दुर्भावनापूर्ण बताते हुए कहा कि इससे नागरिक के मौलिक अधिकारों का हनन होता है।
अदालत ने कहा कि भारत सरकार के निर्णयों का विरोध करने के कारण किसी व्यक्ति को राज्य से बाहर करने की कार्रवाई उसके अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और गरिमा के साथ जीवन जीने के अधिकार का उल्लंघन है।
संविधान देता है विरोध का अधिकार
न्यायालय ने कहा कि संविधान का अनुच्छेद 19 प्रत्येक नागरिक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और शांतिपूर्ण विरोध का अधिकार देता है, जबकि अनुच्छेद 21 सम्मानपूर्वक जीवन जीने की गारंटी प्रदान करता है। केवल सरकार की आलोचना करने या उसके निर्णयों से असहमति जताने के आधार पर किसी नागरिक के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई नहीं की जा सकती।
‘पेपर लीक पर विरोध होगा तो क्या केस दर्ज करेंगे?’
सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति जमदार ने यह भी कहा कि यदि किसी पेपर लीक जैसे मुद्दे पर लोग विरोध प्रदर्शन करते हैं, तो क्या उन पर भी आपराधिक मुकदमे दर्ज कर दिए जाएंगे? उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में शांतिपूर्ण विरोध नागरिकों का संवैधानिक अधिकार है और इसे अपराध की तरह नहीं देखा जा सकता।
पुलिस को भी दी नसीहत
हाईकोर्ट ने पुलिस अधिकारियों को भी कानून के निष्पक्ष इस्तेमाल की सलाह दी। अदालत ने कहा कि पुलिस जनता की सेवक है, किसी मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री की निजी सेवक नहीं। इसलिए कानून का इस्तेमाल नागरिकों की आवाज दबाने के लिए नहीं, बल्कि निष्पक्ष और संवैधानिक तरीके से किया जाना चाहिए।
इन टिप्पणियों के साथ बॉम्बे हाईकोर्ट ने सईद अहमद चौधरी के खिलाफ जारी जिला बदर का आदेश निरस्त कर दिया।
ज्ञानेंद्र अवस्थी-
“BJP मुर्दाबाद” कहने पर जिला बदर? — जज ने कहा: नागरिक गुलाम नहीं हैं
आज बॉम्बे हाईकोर्ट में कुछ असाधारण हुआ। एक जज ने वह कहा — जो शायद ही कभी किसी अदालत ने इतनी साफगोई से कहा हो।
जस्टिस माधव जामदार ने कहा — “नागरिकों को भारत सरकार का गुलाम बनाया जा रहा है। वे प्रदर्शन नहीं कर सकते, आंदोलन नहीं कर सकते — यह क्या है?”
मामला क्या था?
Socialist Democratic Party of India के महासचिव सईद अहमद अब्दुल वहीद चौधरी CAA और ज्ञानवापी विवाद के खिलाफ मोर्चे और धरने आयोजित कर रहे थे।
मुंबई पुलिस ने उन्हें एक साल के लिए जिला बदर कर दिया — पांच FIR के आधार पर जो ज़्यादातर सरकार विरोधी प्रदर्शनों के लिए थीं।
जस्टिस जामदार ने यह आदेश देखा। और आगबबूला हो गए।
जज ने जो कहा — वह इतिहास में दर्ज होगा
“याचिकाकर्ता ने तो सिर्फ ‘BJP Government Murdabad’, ‘Amit Shah Murdabad’ जैसे नारे लगाए। नागरिक ऐसे नारे क्यों नहीं लगा सकते? ऐसे नारों के लिए जिला बदर आदेश क्यों?”
“पुलिस मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री की सेवक नहीं है — वे जनसेवक हैं। मैं आपके अधिकारियों पर भारी जुर्माना लगाऊंगा।”
“अगर लोग विरोध करें तो आप केस थोप देंगे — यह क्या है? नागरिकों का प्रदर्शन करना उनका अधिकार है।”
और फिर — “वॉशिंग मशीन” वाली टिप्पणी
जस्टिस जामदार ने महाराष्ट्र की राजनीति में चल रहे “horse-trading” पर भी टिप्पणी की।
उन्होंने कहा — “एक 10 साल के बच्चे की दुर्घटना में मौत हो गई और राज्य विधानसभा में चर्चा हो रही थी कि Presiding Officer कैसे चुना जाए और वह एक पार्टी से दूसरी पार्टी में कैसे shift हो गया। पूरे महाराष्ट्र में horse-trading चल रही है — केस बदलने पर विचार करें, वॉशिंग मशीन है।”
फैसला
जस्टिस जामदार ने अपने आदेश में लिखा — “सरकार के फैसलों का विरोध करने और उसके खिलाफ नारे लगाने मात्र से किसी नागरिक को जिला बदर नहीं किया जा सकता। यह कार्रवाई दुर्भावनापूर्ण है और संविधान के अनुच्छेद 19 और 21 के तहत मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है।”
जिला बदर आदेश रद्द।
यह फैसला इतना बड़ा क्यों है?
आज के भारत में — जहाँ असहमति को देशद्रोह कहा जाता है। जहाँ विरोध प्रदर्शन पर UAPA लगाया जाता है। जहाँ “BJP मुर्दाबाद” कहने पर जिला बदर किया जाता है।
एक जज ने खड़े होकर कहा — नागरिक गुलाम नहीं हैं। पुलिस प्रधानमंत्री की नौकर नहीं है। विरोध करना — अधिकार है।
यह फैसला नज़ीर है। क्योंकि जब अदालतें जागती हैं — तो लोकतंत्र सांस लेता है।



