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आज के अखबार : सबों ने प्रचारकों की सरकार का प्रचार ही किया है; आइए, नभाटा की कोशिश देखिए-समझिए  

Hindi news ticker with a red banner headline claiming PM Modi announced five big announcements from the Red Fort; five short bullet headlines mention AI, online exams, civil defense, sports talent drive, and scholarships.

पुरानी खबरों के आलोक में इस प्रचार की सत्यता जानिए

संजय कुमार सिंह

देश में 26 जनवरी और 15 अगस्त छुट्टी का दिन होता है। सरकारी नियम यह है कि अगर आप इस दिन काम करवाएंगे तो अलग से पैसे देने होंगे। मोटा-मोटी इसका मतलब है, 31 दिन के महीने में 32 दिन काम के पैसे। वहां, जहां वेतन प्रति माह है और ज्यादातर यही व्यवस्था है जहां छुट्टी मिलती है। वरना काम करो, दिहाड़ी लो। न्यूनतम दिहाड़ी सरकार की तरफ से तय है लेकिन मांग और पूर्ति का मामला है। रेलवे में कुलियों का मामला थोड़ा अलग है और कुलियों का संगठन यात्रियों को लूट रहा है, लिफ्ट और एलिवेटर लगने से परेशान है। बैट्री वाली गाड़ी आम लोगों के लिए चल ही नहीं पाई। सरकार के खिलाफ इतने मुद्दे हैं कि किसकी बात की जाए, किसकी छोड़ी जाए। सरकार से संबंधित तमाम मामलों में रोजगार का मामला सबसे जरूरी है लेकिन उनकी भी चर्चा नहीं होती है। उससे भी बुरा यह कि ज्यादा आबादी का तर्क दिया जाता है जैसे पहले पता नहीं था कि आबादी ज्यादा है और इस सरकार ने आबादी नियंत्रित करने के लिए कुछ क्रांतिकारी किया है। ऐसे में इस सरकार से शिकायत, जांच, कार्रवाई का तो कोई मतलब ही नहीं है। इसलिए, छुट्टी के दिन अखबार छापने और नहीं छापने का अपना अर्थशास्त्र है। अगले दिन के लिए विज्ञापन तो नहीं ही होता है, खबरें भी नहीं होती हैं। दूसरी ओर विज्ञापन और विज्ञप्तियां नहीं होने से पन्ना भरने का खर्च बढ़ जाता है। आज में हिन्दी के मेरे चार में से तीन अखबार नहीं आए हैं। अंग्रेजी के जो अखबार आए हैं उनमें दि एशियन एज, द टेलीग्राफ और द हिन्दू का हिन्दी संस्करण लगभग नहीं है। इंडियन एक्सप्रेस समूह का हिन्दी अखबार जनसत्ता, हिन्दुस्तान टाइम्स का हिन्दुस्तान और टाइम्स ऑफ इंडिया का नवभारत टाइम्स आया है। जहां तक शिकायतों पर सुनवाई नहीं होने की बात है, हम सब देख रहे हैं कि छुआछूत जैसा मामला सार्वजनिक तौर पर खुलेआम हुआ, बिना शिकायत कार्रवाई नहीं हुई और शिकायत किए जाने के बाद भी अभी तक किसी कार्रवाई की खबर नहीं है।

ऐसे तमाम मामले हैं और देर-सबेर यह मामला भी दब जाएगा। हमारे समय में मीडिया में फॉलो अप हुआ करता था जो अब नहीं के बराबर है। कॉक्रोच जनता पार्टी की एक मांग नीट पेपर लीक के कारण आत्महत्या करने वाले बच्चों को मुआवजा देने की थी। उसपर समझौता ही स्पष्ट नहीं था और जो था उसे पूरा नहीं किया गया। गिरफ्तारी रोकने के लिए लगना पड़ा तो मुआवजा पीछे रह ही जाना था। पता नहीं क्या स्थिति है। समाज इन मुद्दों पर उद्वेलित नहीं होता है और जिन मुद्दों पर होता है वह आप देख रहे हैं। हाल के कुछ उदाहरणों में छात्र आंदोलन के दौरान पुलिस वालों का जख्मी होना, झारखंड के छात्र आंदोलन में राहुल गांधी का सक्रिय न होना और रचनात्मक कांग्रेस के  कार्यक्रम में संदीप दीक्षित का कुछ आपत्तिजनक कर देना शामिल है। इस क्रम में वंदेमातरम के गायन को भी मुद्दा बनाने की कोशिश चल रही है जबकि कांग्रेस के कार्यक्रमों में वंदे मातरम तमाम महात्माओं के जन्म के पहले से गाया जाता रहा है और उसपर निर्णय हो चुका है। मुद्दा यह है कि सरकार काम कम करती है, जरूरी काम भी नहीं कर रही है, झूठा प्रचार किया जा रहा है और कुर्सी से चिपके रहने के लिए कुछ भी किया जा सकता है। यह अलग बात है कि इसमें सरकार बुरी तरह फंस गई है। आप या सरकार मानें या न मानें।

आज टाइम्स ऑफ इंडिया में छपी खबर के अनुसार, सरकारी पद का लालच देकर किसी व्यक्ति से 2.9 करोड़ रुपये की ठगी कर ली गई। इस संबंध में दिल्ली पुलिस ने छह लोगों के खिलाफ एक व्यवसायी से सरकारी पद दिलाने का झांसा देकर 2.9 करोड़ रुपये की ठगी करने के आरोप में एफआईआर दर्ज की है। उसे बताया गया था कि वह पर्यावरण सुरक्षा के लिए सरकार द्वारा कथित तौर पर बनाई गई एक काउंसिल का प्रमुख बनने के लिए आवेदन कर सकता है। मामला यह है जुलाई 2026 में कि पर्यावरण मंत्री के चार करीबी अचानक हटा दिए गए हैं। मंत्री कौन होते हैं और मंत्रालय कसे चल रहे हैं इसपर हाल में बहुत खास कहा गया है पर किसी मंत्री के पूरे पर्सनल स्टाफ को बिना कोई कारण बताए एक साथ हटाना बेहद दुर्लभ है। खबर है कि पर्यावरण मंत्रालय ने वर्ष 2021 में एक ‘कार्यालय आदेश’ जारी किया था, जिसके तहत बिना पर्यावरण मंजूरी शुरू हुई परियोजनाओं को भारी जुर्माना लगाकर पिछली तारीख से मंजूरी देने का रास्ता साफ किया गया था। मई 2025 में इस व्यवस्था पर रोक लगी, नवंबर 2025 में तीन जजों की पीठ ने 2:1 के बहुमत से ऐसी मंजूरियों के लिए रास्ता साफ किया था। जुलाई 2026 में मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अगुआई वाली सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने इस 2021 वाले आदेश को पूरी तरह रद्द कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि बिना मंजूरी प्रोजेक्ट शुरू करके बाद में ‘पोस्ट-फैक्टो’ क्लीयरेंस लेना पर्यावरण कानूनों की मूल भावना का उल्लंघन है। लगातार अदालती फैसलों का बदलना और सरकार के अपने अफसरों को अचानक हटाना यह दर्शाता है कि पर्यावरण नीति में स्थायित्व और पारदर्शिता की गंभीर कमी है। उसमें यह नियुक्ति और करोड़ों का लेन-देन।

नवोदय टाइम्स की आज की लीड का शीर्षक है, दिमागी नक्सली से रहना होगा सतर्क : पीएम मोदी। इसके साथ भागवत के उच्च विचार भी टॉप पर हैं। शीर्षक है, युवा हमारी शक्ति, सही दिशा मिले तो विश्व गुरु बनेगा देश। यह सब तब है जब प्रधानमंत्री ने 2018 में कहा था कि 2022 में भारत की अर्थव्यवस्था 5 ट्रिलियन की हो जाएगी और उस समय की स्थितियों के अनुसार यह बहुत सामान्य था। तब कहा भी गया था। फिर भी प्रचार चलता रहा जैसा सरकार बहुत परिश्रम कर रही है। फिर कोविड आ गया और मामला अटक गया। अब हमारी अर्थव्यवस्था जापान से आगे निकल गई है लेकिन पांच ट्रिलियन की बात नहीं होती है और ऐसे ही चल रहा है। देश के लिए प्रधानमंत्री का यह झूठ (आप प्रचार कह सकते हैं) संदीप दीक्षित के व्यंग से कम महत्वपूर्ण है। द टेलीग्राफ ने इस शीर्षक के साथ विपक्ष की इस प्रतिक्रिया को भी उतना ही महत्व दिया है कि प्रधानमंत्री का स्वतंत्रता दिवस का भाषण फूहड़ था। टाइम्स ऑफ इंडिया और द हिन्दू में यही शीर्षक है। हिन्दुस्तान टाइम्स ने प्रधानमंत्री की सप्तधारा की व्याख्या की है और इसे विकसित भारत का ब्लूप्रिंट कहा है। इंडियन एक्सप्रेस ने बताया है कि प्रधानमंत्री की मानें तो विकसित भारत 2047 की हमारी यात्री की शक्ति युवा होंगे (इथेनॉल की कोई चर्चा नहीं मिली)। मीडिया पीत पत्रकारिता से काफी आगे निकल गया है।    

जाहिर है, दाल में काला नहीं है दाल ही काली है और अब तो बदबू भी आ रही है। इस मामले में दोनों पक्ष सरकारी कार्यशैली का लाभ उठाने की कोशिश में थे। अगर दोनों कामयाब रहते तो खबर नहीं छपती और खबर नहीं छपती है इसलिए अयोग्य या अपात्र लोग भी कोशिश में लगे हैं। अच्छी सरकार में दोनों संभव नहीं था। पारदर्शिता होती तो कोई ऐसी कोशिश भी नहीं करता। इतने पैसे दांव पर लगाने का मतलब धंधे में विश्वसनीयता भी है और यह ऐसे ही नहीं बनी होगी। यह उदाहरण है सरकार की कार्यशैली और आम नागरिक की स्थिति का। जिसे नौकरी या पद्म पुरस्कार नहीं चाहिए, उसके लिए प्रचार किया जाता रहा है कि, इन्हें वीआईपी और सिफारिशी संस्कृति से मुक्त करके “पीपुल्स पद्म” (जनता का पद्म) और पारदर्शी व्यवस्था में बदल दिया गया है। सरकार का दावा है कि अब ये पुरस्कार दिल्ली के लुटियंस जोन या राजनीतिक पहुँच वाले लोगों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि समाज के लिए जमीनी स्तर पर काम करने वाले “अनसंग हीरोज” (अनाम नायकों) को दिए जा रहे हैं। अगर यह मान भी लिया जाए कि वाकई ऐसा हो रहा है तो नौकरी या पद का उदाहरण आज की खबर है। मनन मिश्रा का कारनामा है या लाठी चलाने का अधिकार मिले तो लाठी घुसाने की कोशिश करने वाले लोग मौका मान लेते हैं। कील लगी और करंट मारने वाली का इस्तेमाल तो हुआ ही है।

ऐसा नहीं है कि सरकार अब ऐसी हो गई है। मेरे ख्याल से शुरू से ऐसी ही है। देश में 12 साल से सत्ता में है। तीसरी बार भले बहुमत नहीं मिला और बैसाखी के सहारे है और बैसाखी उसी ने खरीदी या जुगाड़ी है। दो साल में कमजोर नहीं हुई है और तृणमूल या बंगाल के 20 गद्दार साथ देने की कोशिश में फंसे हुए हैं। शिवसेना के छह बागियों का भी मामला है लेकिन सुप्रीम कोर्ट का एक पुराना फैसला सभी मामलों को उलझाए हुए है। सबको पता है फिर भी प्रधानमंत्री के स्वतंत्रता दिवस के भाषण की भिन्न खास बातों को नवभारत टाइम्स ने हाईलाइट किया है। सच्चाई आप जानते हैं। मैं याद भी दिला दे रहा हूं। पहला एआई है और उसके सम्मेलन तथा उस आयोजन के साथ गलगोटिया यूनिवर्सिटी को याद कीजिए और समझिए कि अब क्या बेहतर या नया हो जाएगा। 2) मुफ्त ऑनलाइन कोचिंग है। आप कौशल विकास योजना और उसका प्रचार याद कीजिए। स्थिति यह है कि राजीव प्रताप रुड़ी कौशल विकास मंत्री थे। कोविड के समय पप्पू यादव ने आरोप लगाया था कि सांसद निधि से खरीदे गए एम्बुलेंस उनके घर में ढंक कर खड़े थे और बचाव में रुड़ी ने कहा था कि ड्राइवर नहीं हैं। तब मुझे लगा था कि जो कौशल विकास मंत्री रहा हो उसके पास छपरा जैसे शहर या सारण जैसे जिले में कोविड के समय एम्बुलेंस चलाने के लिए ड्राइवर नहीं है। बाद में मोदी सरकार के मंत्रियों का हाल और कौशल विकास मंत्रालय के घोटाले का पता चला। सरकार ने आज तक नहीं बताया है कि कौशल कल्याण कितने बच्चों का हुआ और वे कहां क्या नौकरी कर रहे हैं। अगर सरकार के करोड़ों फूंक कर भी नौकरी नहीं मिली तो क्या फायदा और नौकरी मिली हो – ये सरकार प्रचार नहीं करे तो दाल में काला और बाकी सीएजी की रिपोर्ट तो है ही।

सुरक्षा की बदलती जरूरत के लिए आधुनिक ट्रेनिंग का मामला भी नया है। मेरे ख्याल से इसकी जरूरत और उपयोगिता तभी होगी जब सरकार यह तय करे कि पेलेट गन और कील लगी लाठी चलवानी है कि नहीं। और इसे स्वीकार करे। अभी भी कहा जा रहा है कि गोली चली ही नहीं। 4) खेल प्रतिभा तलाश – हाल में उत्तराखंड की एक लड़की ने मुख्यमंत्री के सामने कहा कि उससे भारत की तरफ से भेजने के लिए पैसे मांगे गए और वह नहीं जा पाई। मुझे लगता है कि इसपर कोई कार्रवाई नहीं हुई। देश, समाज और मीडिया ने तो वह भी नहीं किया जो संदीप दीक्षित के खिलाफ किया। 5) सेमी कंडक्टर प्लांट की कई कहानियां हैं। अभी एक ही बताता हूं। राजनीतिक दलों के वार्षिक ऑडिट रिपोर्ट और इलेक्टोरल ट्रस्ट के माध्यम से मिले डोनेशन का ब्योरा सार्वजनिक हुआ, तो मीडिया रिपोर्ट्स (स्क्रॉल डॉट इन और न्यूजलॉन्ड्री) ने एक क्रोनोलॉजी बताई जो इस प्रकार है – 29 फरवरी 2024 को केंद्र सरकार ने देश में ‘इण्डिया सेमीकंडक्टर मिशन’ के तहत टाटा समूह के दो बड़े सेमीकंडक्टर प्लांट (गुजरात के धोलेरा और असम के मोरीगांव) को मंजूरी दी। इन प्रोजेक्ट्स की कुल लागत में 50% हिस्सेदारी के तहत केंद्र सरकार ने टाटा ग्रुप के लिए लगभग ₹44,203 करोड़ की सरकारी सहायता/सबसिडी स्वीकृत की। अप्रैल 2024 (लोकसभा चुनाव से ठीक पहले) टाटा ग्रुप की कंपनी (टाटा संस/प्रोग्रेसिव इलेक्टोरल ट्रस्ट) ने भारतीय जनता पार्टी को ₹757 करोड़ से ₹758 करोड़ का चंदा दिया था। प्रधानमंत्री इन्हीं की बात कर रहे हों तो सच क्यों नहीं होगा। बाकी का मैं बता चुका।

मैं रोज चार हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल दस, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।

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