कभी डिजिटल पत्रकारिता की दुनिया में The Lallantop की खूब चर्चा हुआ करती थी. अंदाज नया था, भाषा अलग थी और प्रस्तुति में ताजगी थी. लेकिन वक्त बड़ा बेरहम होता है. डिजिटल दुनिया में कल का सितारा आज अपने एक-एक वीडियो के लिए दर्शक तलाशता दिखाई दे सकता है और कल जिसे वह छोटा समझता था, वही उससे बहुत आगे निकल सकता है.
आज शायद The Lallantop के सामने भी यही बेचैनी है.
और इस बेचैनी की सबसे दिलचस्प मिसाल 4PM की पत्रकार शाहीन से जुड़े मामले में देखने को मिल रही है.
दिल्ली में 4PM की पत्रकार शाहीन और फ्रीलांस पत्रकार नफीसा के साथ कथित पुलिस मारपीट का मामला सामने आया. मामला देखते-देखते दिल्ली से निकलकर पूरे देश में पहुंचा और फिर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी चर्चा का विषय बन गया.
देश के तमाम बड़े मीडिया संस्थानों ने खबर की. विदेशी मीडिया ने भी इसे उठाया. रिपोर्टों में शाहीन की पहचान बताई गई. यह बताया गया कि वह 4PM से जुड़ी पत्रकार हैं.
फिर शायद The Lallantop को भी लगा कि अरे, यह तो बड़ी खबर है!
टीम शाहीन के पास पहुंची. बातचीत हुई. इंटरव्यू हुआ. एक के बाद एक वीडियो सामने आने लगे.
बहुत अच्छी बात है. पत्रकार के साथ कथित ज्यादती हुई है तो The Lallantop को ही नहीं, देश के हर पत्रकार और हर मीडिया संस्थान को आवाज उठानी चाहिए.
लेकिन यहां एक छोटी-सी समस्या हो गई.
शाहीन तो मिल गईं, उनकी कहानी भी मिल गई, इंटरव्यू भी मिल गया, वीडियो भी बन गया, दर्शक भी मिल गए… मगर बेचारा 4PM कहीं रास्ते में खो गया!
अब सवाल है कि आखिर क्यों?
जिस पत्रकार के पास आप कैमरा लेकर पहुंचे, वह किस संस्थान की पत्रकार है, यह बताने में कैसी परेशानी?
क्या कैमरा चालू होते ही 4PM शब्द स्क्रीन से गायब हो जाता है?
क्या 4PM बोलने से माइक्रोफोन बंद हो जाता है?
क्या YouTube का algorithm नाराज हो जाता है?
या The Lallantop के न्यूज़रूम में कोई ऐसी अदृश्य लक्ष्मण रेखा खिंची हुई है जिसके इस तरफ शाहीन का इंटरव्यू लिया जा सकता है, लेकिन उस तरफ जाकर “4PM की पत्रकार शाहीन” नहीं बोला जा सकता?
कमाल की पत्रकारिता है साहब!
- 4PM की पत्रकार चाहिए.
- 4PM की पत्रकार की एक्सक्लूसिव बातचीत चाहिए.
- 4PM की पत्रकार के साथ हुई घटना पर वीडियो चाहिए.
- उस वीडियो पर views चाहिए.
- Engagement चाहिए.
- Reach चाहिए.
- लेकिन 4PM का नाम?
न बाबा न! वह मत बोल देना! अब The Lallantop के प्रबंधन को कम से कम अपने रिपोर्टरों से इतना तो पूछना चाहिए कि भाई, आखिर 4PM नाम की इस बीमारी का इलाज क्या है?
अगर यह सिर्फ एक सामान्य संपादकीय चूक है तो उसे सुधारिए. और अगर किसी पत्रकार ने जानबूझकर उस मीडिया संस्थान की पहचान हटाई, जिसकी पत्रकार का वह इंटरव्यू कर रहा था, तो प्रबंधन को जरूर पूछना चाहिए कि यह कौन-सी पत्रकारिता की पाठशाला है?
पत्रकार का काम तथ्य बताना होता है, अपनी पसंद-नापसंद के हिसाब से तथ्य का आधा परिचय देना नहीं.
कल्पना कीजिए, कोई 4PM का रिपोर्टर The Lallantop के किसी पत्रकार का इंटरव्यू करे और पूरे इंटरव्यू में उसका परिचय देते समय The Lallantop का नाम ही गायब कर दे.
तब क्या प्रतिक्रिया होगी?
क्या इसे स्वस्थ पत्रकारिता कहा जाएगा?
अगर नहीं, तो वही कसौटी यहां भी लागू होनी चाहिए.
The Lallantop के मालिकों और प्रबंधन को भी अपने न्यूज़रूम से एक सीधा सवाल पूछना चाहिए:
आखिर 4PM का नाम लेने में दिक्कत क्या है? और अगर किसी रिपोर्टर को प्रतिद्वंद्वी मीडिया संस्थान का नाम लेने भर से इतनी परेशानी है कि तथ्यात्मक परिचय भी अधूरा छोड़ना पड़े, तो शायद प्रबंधन को उसे कुछ दिन रिपोर्टिंग से छुट्टी देकर पत्रकारिता का पहला पाठ दोबारा पढ़ने भेज देना चाहिए.
पाठ बहुत छोटा है: जिसका इंटरव्यू कर रहे हो, उसका सही परिचय भी दर्शकों को बता दो.
इतना कठिन नहीं है. इसके लिए न कोई बड़ी डिग्री चाहिए, न कोई विशेष ट्रेनिंग.
सिर्फ पत्रकारिता की सामान्य ईमानदारी चाहिए.
और अगर प्रबंधन को लगे कि कोई पत्रकार संस्थागत प्रतिद्वंद्विता में इतना उलझ चुका है कि सामान्य attribution भी नहीं कर पा रहा, तो उसे यह भी तय करना चाहिए कि ऐसे व्यक्ति को रिपोर्टिंग करनी चाहिए या कुछ समय न्यूज़रूम से बाहर बैठकर यह समझना चाहिए कि पत्रकारिता व्यक्तिगत पसंद और नापसंद से बड़ी चीज है.
क्योंकि यह मामला 4PM की तारीफ करने का नहीं है.
The Lallantop से कोई यह नहीं कह रहा कि आप 4PM की प्रशंसा में संपादकीय लिखिए.
कोई यह भी नहीं कह रहा कि आप 4PM की पत्रकारिता से सहमत हो जाइए.
आलोचना कीजिए. सवाल पूछिए. जहां गलती लगे, वहां 4PM को कठघरे में खड़ा कीजिए.
लेकिन जब 4PM की पत्रकार का इंटरव्यू कर रहे हैं तो कम से कम इतना साहस तो रखिए कि दर्शकों को बता सकें कि वह 4PM की पत्रकार हैं.
यही तो पत्रकारिता है. वरना दृश्य बड़ा हास्यास्पद हो जाता है.
- दुनिया लिख रही है—4PM की पत्रकार.
- देश के मीडिया संस्थान लिख रहे हैं—4PM की पत्रकार.
- सोशल मीडिया पर लोग जानते हैं—4PM की पत्रकार.
और The Lallantop कैमरा लेकर उसी पत्रकार के सामने बैठा है, मगर मानो मन ही मन प्रार्थना कर रहा हो—
“हे भगवान, बातचीत पूरी हो जाए… बस कहीं 4PM का नाम न निकल जाए!”
यह प्रतिस्पर्धा है या कॉमेडी?
अगर 4PM इतना गैर-महत्वपूर्ण है तो उसकी पत्रकार की कहानी के पीछे कैमरा लेकर क्यों घूम रहे हैं? और अगर उसकी पत्रकार की कहानी इतनी महत्वपूर्ण है कि लगातार वीडियो बनाने पड़ रहे हैं, तो उसके संस्थान का नाम बताने में संकोच कैसा?
दोनों बातें एक साथ कैसे चल सकती हैं?
यही वजह है कि सवाल The Lallantop के रिपोर्टर से ज्यादा उसके संपादकीय नेतृत्व से पूछा जाना चाहिए.
क्या यही आपकी editorial policy है? अगर नहीं, तो अपने रिपोर्टरों से पूछिए कि 4PM का नाम किसने गायब किया और क्यों? और अगर यह आपकी editorial policy है, तो फिर खुलकर बता दीजिए कि The Lallantop में 4PM की पत्रकार का इंटरव्यू लिया जा सकता है, लेकिन 4PM का नाम लेना वर्जित है.
कम से कम दर्शकों को नियम तो पता रहेगा! डिजिटल पत्रकारिता की दुनिया बदल चुकी है.
अब किसी पुराने ब्रांड का नाम ही उसकी ताकत की गारंटी नहीं है. दर्शक हर दिन फैसला करता है कि किसे देखना है, किस पर भरोसा करना है और किसे पीछे छोड़ देना है.
इसलिए पुराने गौरव की तस्वीर दीवार पर टांगकर वर्तमान की प्रतिस्पर्धा नहीं जीती जाती.
इसके लिए खबर चाहिए. विश्वसनीयता चाहिए. और सबसे बढ़कर तथ्य को तथ्य की तरह बताने का आत्मविश्वास चाहिए.
The Lallantop को 4PM पसंद हो, नापसंद हो या उससे जबरदस्त प्रतिस्पर्धा महसूस होती हो—यह उसका अपना मामला है.
मगर शाहीन की पेशेवर पहचान कोई राय नहीं है. शाहीन 4PM की पत्रकार हैं. इसमें न विचारधारा है, न बहस है, न पक्ष-विपक्ष. यह एक तथ्य है. और तथ्य का नाम लेने में यदि किसी मीडिया संस्थान को परेशानी होने लगे तो परेशानी 4PM में नहीं, कहीं और है.
इस पूरे प्रकरण का सबसे शानदार व्यंग्य शायद यही है—
शाहीन चाहिए.
शाहीन की कहानी चाहिए.
शाहीन का इंटरव्यू चाहिए.
शाहीन के नाम पर audience चाहिए.
शाहीन पर लगातार वीडियो चाहिए.
बस जिस 4PM की वह पत्रकार हैं, उसका नाम नहीं चाहिए!
वाह The Lallantop!
प्रतिस्पर्धा करते-करते कम से कम पत्रकारिता का परिचय देना तो मत भूल जाइए. और हां, अगली बार 4PM के किसी पत्रकार का इंटरव्यू करने जाएं तो कैमरे के साथ थोड़ा-सा साहस भी ले जाइएगा.
काम आएगा. क्योंकि 4PM का नाम न लेने से 4PM गायब नहीं होगा. हां, नाम लेने से इतनी घबराहट जरूर यह सवाल पैदा कर देती है कि आखिर डर किस बात का है?


