सुरेश चिपलुनकर-
क्या भाजपा की आईटी सेल कमजोर पड़ रही है?? या वास्तव में लोगों में गुस्सा बढ़ता जा रहा है?? कल बीबीसी ने अपनी साइट पर मोदी के जन्मदिन हेतु शुभकामना संदेश देने और क्या गिफ्ट करेंगे, जैसा सामान्य सवाल पूछा था..
परन्तु जिस बात की कतई आशंका नहीं थी, वह हुआ.. अक्सर बीबीसी की वेबसाइट भाजपा की आईटी सेल के निशाने पर रहती है, परन्तु कल कमेंट करने वालों ने जिस तरह से मोदी संबंधी इस कॉलम पर गंदी गंदी गालियों की झड़ी लगाई, वह हैरान करने वाला था.. आईटी सेल के हजारों गुर्गे भी उन गालियों वाले कमेंट्स का मुकाबला नहीं कर पा रहे थे…
थोड़ी ही देर में बीबीसी की वेबसाइट के संचालक को कमेंट करना पड़ा कि कृपया अपनी भाषा पर नियंत्रण रखें और सभ्य भाषा में कमेंट करें,, परन्तु यह फिर भी नहीं रुका.. अंततः बीबीसी के इतिहास में पहली बार मोदी को शुभकामना संदेश भेजने वाली पोस्ट पर कमेंट्स सेक्शन को बंद कर दिया गया..
ऐसा आज से पहले कभी नहीं हुआ था.. कि भाजपा का गालीबाज और झूठ फैलाने वाला भारीभरकम आईटी सेल गिरोह पीछे छूट गया.. ऐसा कैसे चलेगा बाबू भैया?? नेहरू, सोनिया, पप्पू को गालियां देने वाले नए नए ट्रेनियों की संख्या कम हो रही है क्या??
कृष्ण चौधरी-
पहले अधिकांश लोग सार्वजनिक मंचों पर गालियों से एक दूरी बना कर रखते थे। सोशल मीडिया पर भाषाई शुचिता का खूब ख़याल रखा जाता था और गाली-गलौज करने वालों से लोग अक्सर किनारा कर लेते थे।
इसकी एक वजह यह भी थी कि लोग ऐसे लोगों से बहस करने के बजाय अपना मानसिक सुकून बचाना ज़्यादा ज़रूरी समझते थे। उन्हें लगता था कि सामने वाला अगर तर्क के बजाय गाली पर उतर आया है, तो उससे उलझने का कोई मतलब नहीं। फालतू में अपनी बेइज्जती होगी, और गालियाँ खाएँगे।
भाजपा ने यहाँ के इसी सामाजिक मनोविज्ञान को बहुत अच्छी तरह समझा और उसका भरपूर इस्तेमाल किया। ITCell में ऐसे लोगों की पूरी फौज तैयार की, जिनका काम ही यह था कि सरकार की आलोचना करने वाले को गालियों से घेरो। कोई सवाल पूछे, तो उसके सवाल का जवाब देने के बजाय उसे गंदी गालियों से चुप करवा दो। कोई असहमति जताए, तो उसे व्यक्तिगत हमलों में उलझा दो।
धीरे-धीरे यह इनके लिए एक कारगार रणनीति बन गई, आलोचक को इतना परेशान कर दो कि वह अगली बार बोलने से पहले दस बार सोचे।
इस रणनीति की ताक़त सिर्फ़ गाली में नहीं थी, बल्कि उस मनोवैज्ञानिक दबाव में थी जो गाली के पीछे काम करता है। हर व्यक्ति सार्वजनिक रूप से अपमानित होना नहीं चाहता। हर कोई अपनी टाइमलाइन को युद्ध का मैदान बनाना नहीं चाहता। इसलिए बहुत से लोग चुप हो जाते थे। उन्हें लगता था कि अपनी बात कहने की कीमत अगर लगातार गालियाँ सुनना है, तो चुप रहना ही बेहतर है। इस तरह गाली सिर्फ़ एक शब्द नहीं रह जाती, वह बातचीत से बाहर धकेलने का एक औज़ार बन जाती है।
ऊपर से जब कुछ भाजपाई नेता ख़ुद मंचों से अनाप-शनाप बोलते, तो उनके समर्थकों को भी एक तरह का लाइसेंस मिल जाता। सार्वजनिक भाषा की मर्यादा का जो दबाव आम लोगों पर था, वह भाजपाइयों के ऊपर जैसे लागू ही नहीं होता था।
आलोचक इस उम्मीद में पीछे हटते रहे कि शायद सभ्य भाषा में बात करने से माहौल सभ्य बना रहेगा। लेकिन जब सामने वाला सभ्यता को आपकी कमजोरी समझने लगे, तो उसे फिर चुप नहीं कराया जा सकता।
फिर जंतर-मंतर पर CJP वाला प्रोटेस्ट हुआ। वहाँ Gen Z ने सिर्फ़ महामानव को ही नहीं, बल्कि उस पूरे डिजिटल तंत्र को धो दिया, जो कभी गाली और ट्रोलिंग के ज़रिए लोगों को चुप कराने का आदी हो चुका था।
और शायद इस घटनाक्रम का सबसे बड़ा असर यही हुआ कि जिन लोगों को अब तक IT Cell के दिहाड़ी गालीबाज़ों का तोड़ समझ नहीं आ रहा था, उन्हें भी एक बात समझ में आ गई, कि इनकी नब्ज़ कहाँ दबी हुई है।
जब किसी हथियार का इस्तेमाल एकतरफ़ा हो रहा हो, तो वह डर पैदा करता है। लेकिन जब वही हथियार दूसरी तरफ़ से भी चलने लगे, तो उसका असर बदल जाता है।
और यहीं से मामला बराबरी का नहीं, बल्कि 21:5.6 का हो गया है। मतलब अब पूरा ITCell नकारा साबित हो चुका है, या बहुत कमजोर पड़ रहा है, इतना कमजोर कि इन्हें सोशल मीडिया का ऐल्गोरिद्म भी हाशिये पर डाल दे रहा है।
Gen Z ने अब सभी को इतना सिखा दिया है जिसकी वजह से ज्यादातर लोगों ने सोशल मीडिया पर भाषाई शुचिता को साइड में रख कर ITcell वाले दिहाड़ीयों से मुक़ाबला करना शुरू कर दिया है।
गालियाँ अब केवल सड़क या चौराहे की चीज़ नहीं रहीं, वे सोशल मीडिया पर मीम, पोस्ट, कॉमेडी, राजनीतिक व्यंग्य सब में घुस चुकी हैं।
इसका मतलब यह नहीं कि गाली देना अपने-आप में कोई महान कार्य है, या हर बहस का जवाब गाली होना चाहिए। लेकिन इतना ज़रूर है कि जिस भाषा को कभी दूसरों को डराने और चुप कराने के लिए इस्तेमाल किया जाता था, अब उसी भाषा पर संघी Itcell का एकाधिकार नहीं रहा। और अब वो ख़ुद डरे हुए हैं, क्योंकि अपने ही खोदे हुए गड्ढे में जो जा गिरे हैं।
Now they’re getting a taste of their own medicine…
महामानव जी की जिस लार्जर देन गॉड वाली इमेज को बनाने में अरबों खर्च किए थे, उसे मात्र दो महीने में लोगों ने धो कर रख दिया है। गुब्बारा फूट गया है….और दिये का तेल ख़त्म हो गया है…
मूल खबर....


