दिल्ली सरकार की उत्पाद नीति बनाम वंदेमातरम पूरा गाने की कानूनी जबरदस्ती, सोलिसिटर जनरल का राजनीतिक बयान उसपर सुप्रीम कोर्ट का नजरिया और व्यवहार – खबरें ही खबरें!
संजय कुमार सिंह
आज अमर उजाला और नवोदय टाइम्स में सुप्रीम कोर्ट की खबर लीड है। अमर उजाला में लीड का शीर्षक है, धार्मिक वजहों से वंदे मातरम न गाना अपराध नहीं : सुप्रीम कोर्ट। खबरों के अनुसार सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से जवाब मांगा है और कहा है, 1986 का फैसला दंडात्मक कार्रवाई पर रोक लगाता है। सरकार को पता नहीं है या इससे मतलब नहीं है – मुझे नहीं पता। खबरों से पता नहीं चलता है। मोटा-मोटी कोई भी समझता है कि सरकार क्या चाहती है फिर भी सब हो रहा है और आज यह खबर मेरे 10 अखबारों में हिन्दी के इन दो अखबारों के अलावा अंग्रेजी में द टेलीग्राफ और दि एशियन एज के साथ टाइम्स ऑफ इंडिया और द हिन्दू में लीड है।
कहने की जरूरत नहीं है कि यह हेडलाइन मैनेजमेंट का हिस्सा है वरना वंदेमातरम पर फैसला 28 अक्टूबर 1937 को कांग्रेस कार्यसमिति ने ले लिया था। इस मौके पर जवाहरलाल नेहरू, सुभाष चंद्र बोस, सरदार बल्लभ भाई पटेल और मौलाना अबुल कलाम आजाद मौजूद थे। तय हुआ था कि राष्ट्रीय आयोजनों में शुरू के दो पद ही गाए जाएंगे। गीत के बाकी हिस्से से अलग इन दो पदों में ऐसा कुछ नहीं है कि किसी समुदाय को कोई आपत्ति हो। कहने की जरूरत नहीं है कि इस तय मामले को भाजपा सरकार ने फिर से उठाया है और सुप्रीम कोर्ट तमाम दूसरे काम छोड़कर इसे सुन रही है, नोटिस तो जारी किए ही हैं। सरकारी वकील ने जो कहा वह कम आपत्तिजनक नहीं है।
मुख्य खबर के साथ छपी इससे संबंधित एक खबर का शीर्षक है, नक्सलियों की सोच के अनुसार नहीं बनेंगे कानून। नया कानून किस सोच के कारण बना है और इस सरकार में नक्सलियों की सोच या दिमागी नक्सल का क्या मतलब है उस पर जाने की जरूरत अभी नहीं है। अभी तो सिर्फ यह तथ्य कि सुभाष चंद्र बोस और जवाहरलाल नेहरू ने इस विषय पर गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर से मार्गदर्शन मांगा था। टैगोर का तर्क था कि वंदे मातरम के पहले दो छंदों में मातृभूमि की प्राकृतिक सुंदरता और ममता का कोमल व सार्वभौमिक वर्णन है। इसे गीत के बाकी हिस्से से अलग किया जा सकता है। वैसे भी, बाद के चार छंदों में मां दुर्गा, लक्ष्मी और सरस्वती का प्रत्यक्ष धार्मिक उल्लेख है। मूर्तिपूजा से जुड़ी उपमाएं भी हैं। भारत सरकार ने इसे गाना सबके लिए कानूनन जरूरी कर दिया है और नहीं गाने वालों के लिए सजा का प्रावधान है। मुझे नहीं लगता है कि इसकी कोई जरूरत है और यह सरकार की प्राथमिकता में होना चाहिए। फिर भी सुप्रीम कोर्ट ने इसे सीधे खारिज नहीं करके जवाब मांगा है।
इससे पहले दिल्ली की आम आदमी पार्टी की सरकार ने 2021 में नयी आबकारी नीति लागू की थी। जुलाई 2022 में दिल्ली के तत्कालीन मुख्य सचिव ने एक रिपोर्ट सौंपी, जिसमें नीति निर्माण व आवंटन में वित्तीय अनियमितताओं और प्रक्रियात्मक उल्लंघनों के आरोप लगाए गए। इसके आधार पर उपराज्यपाल वीके सक्सेना ने सीबीआई जांच की सिफारिश की। नतीजा यह रहा कि दिल्ली के तत्कालीन उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया (फरवरी 2023), पार्टी के राज्यसभा सांसद संजय सिंह (अक्तूबर 2023) और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल (मार्च 2024) में गिरफ्तार किए गए। यह किसी निर्वाचित सरकार के खिलाफ भारत सरकार की सबसे बड़ी कार्रवाई थी। इसमें बीआरएस नेता के कविता और कई अन्य आबकारी अधिकारियों व शराब कारोबारियों को गिरफ्तार किया गया। कई मौकों पर यह टिप्पणी भी की कि बिना मुकदमे के किसी को अनिश्चितकाल के लिए जेल में नहीं रखा जा सकता है। अरविंद केजरीवाल ने जेल से बाहर आने के बाद सितंबर 2024 में मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। वे जनता की अदालत में बेदाग साबित होना चाहते थे लेकिन वे और उनकी पार्टी चुनाव हार गई।
अब खबर है कि चुनाव में भारी बेईमानी हुई थी। पुराने मतदाता हटाकर नए जोड़े गए थे और उसमें भी भारी गड़बड़ी के कई किस्से हैं। दूसरी ओर, भाजपा और केंद्र सरकार इसे भ्रष्टाचार के खिलाफ बड़ी कार्रवाई बताती है जबकि अभी तक कुछ साबित नहीं हुआ है। निचली अदालत (ट्रायल कोर्ट) से अरविंद केजरीवाल और अन्य आरोपियों को राहत मिलने के बाद, केंद्रीय जांच ब्यूरो यानी केंद्र सरकार ने इस आदेश को दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती दी। केंद्र की भाजपा सरकार ने किन मामलों में ऊपर की अदालत में अपील की और किनमें नहीं उसका भी एक पैटर्न लगता है लेकिन वह अलग मामला है। केजरीवाल के खिलाफ अपील न्यायमूर्ति स्वर्णकांता शर्मा की पीठ के सामने थी।
अरविंद केजरीवाल ने न्यायमूर्ति स्वर्णकांता शर्मा की पीठ में सुनवाई पर आपत्ति जताते हुए एक अतिरिक्त हलफनामा दाखिल किया और न्यायपीठ से खुद को इस केस से अलग करने की मांग की। केजरीवाल ने तर्क दिया कि इस मामले में निष्पक्ष न्याय के सिद्धांत का पालन होना चाहिए। हलफनामे में दावा किया गया कि न्यायमूर्ति स्वर्णकांता शर्मा के बेटे/बच्चे केंद्र सरकार के वकीलों के पैनल में शामिल हैं और उन्हें केंद्र सरकार की तरफ से केस आवंटित होते हैं। केजरीवाल का कहना था कि चूंकि इस मामले में सरकार और सीबीआई की तरफ से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता पक्ष रख रहे हैं, और सरकारी केसों/काम के आवंटन एवं पैनल प्रणालियों का सीधा संबंध सॉलिसिटर जनरल और विधि मंत्रालय से होता है, इसलिए जज के परिजनों को व्यावसायिक व आर्थिक लाभ मिलने के कारण हितों के टकराव की स्थिति बनती है।
सुप्रीम कोर्ट में कल वंदे मातरम के अलावा एसआईआर पर भी सुनवाई हुई। देशबन्धु ने आज दिल्ली के ड्राफ्ट वोटर लिस्ट से 47 लाख नाम हटाने पर कोर्ट की सख्ती की खबर दी है और बताया है कि सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग से जवाब मांगा है। यहां वंदे मातरम की खबर इसके साथ है और दो कॉलम में छपी है। एसआईआर पर सुप्रीम कोर्ट की इस कार्रवाई और खबर के अलावा आज दिल्ली के प्रमुख राष्ट्रीय अखबार, हिन्दुस्तान टाइम्स की लीड दिल्ली में अपराध की एक बड़ी वारदात है। खबरों के अनुसार दो हफ्ते में यह चौथा मामला है। इससे देश की राजधानी में नागरिकों को मिल रही सुरक्षा का पता चलता है। खबर है कि जन्मदिन पर मित्र के साथ आस्थाकुंज पार्क गई 17 साल की लड़की के साथ खुद को पुलिस वाला बताने वालों ने बलात्कार किया। टाइम्स ऑफ इंडिया और द हिन्दू में यह खबर सेकेंड लीड है।
दि इंडियन एक्सप्रेस ने आज एसआईआर पर अपनी खोजी खबर छापी है। सात कॉलम की इस खबर का शीर्षक तीन लाइन का है। हिन्दी में यह कुछ इस तरह होगा, 10 महीने में 14 बार दो चुनाव आयुक्तों ने चुनाव आयोग के कदमों पर ऑन रिकार्ड एतराज किया – उन्हें अंधेरे में रखने से लेकर नए वोट जोड़ने और नाम हटाने तक के लिए। इस खबर का इंट्रो हिन्दी में इस तरह होगा, चुनाव आयोग के अंदर अनजाना मतभेद : नए वोटर्स से संबंधित कदम को चुनाव आयुक्तों ने ‘अनधिकृत, अवैध’ कहा; दिल्ली में जमीन पर काम कर रहे अधिकारियों को छोड़कर मतदाताओं से संबंधित डाटाबेस तक पहुंच को ‘केंद्रीयकृत’ किए जाने के खिलाफ चेतावनी जताई।
दैनिक भास्कर आज सबसे अलग है। पहले पन्ने की लीड का फ्लैग शीर्षक है, “नए नियम – ट्राई का दूरसंचार कंपनियों को आदेश, महीने भर में हो सकता है लागू”। मुख्य शीर्षक है, मोबाइल रिचार्ज में बिना डेटा वाले ‘सस्ते प्लान’ बढ़ाने होंगे। कल अमर उजाला में पहले पन्ने पर एक खबर थी, दूसरे को सिम देने पर 3 वर्ष जेल, 50 लाख जुर्माना संभव। यह खबर कहां से किस मौके पर किस लिए आई थी, मुझे बिल्कुल समझ में नहीं आया। पहले पन्ने पर थी इसलिए गंभीर लगी। पर खबर में कुछ है नहीं सिवाय इसके कि अपराध रोकने के लिए यह सरकार सजा बढ़ा देती है। नीट पेपर लीक मामले में यही किया गया और साइबर फ्रॉड की आड़ में इस तरह की खबरों से कुछ नया या अलग नैरेटिव बनाने की कोशिश हो रही लगती है। अमर उजाला की खबर से यह पता नहीं चला कि सिम देना अपराध है या आपके सिम से अपराध हो तो आपको नहीं बख्शा जाएगा – यह खबर है।
मुझे लगता है दोनों का कोई मतलब नहीं है। सिम मेरे नाम पर हो तो मेरे खिलाफ कार्रवाई होगी ही लेकिन अपराध नहीं होगा तब भी होगी तो क्यों या नहीं होगी – यह स्पष्ट नहीं है। खबर में यह भी कहा गया है कि छत्तीसगढ़ में एक एजेंट ने लोगों के दस्तावेज का दुरुपयोग करके 25 फर्जी सिम चालू कर दिए। अगर ऐसा है तो जिसके दस्तावेज का इस्तेमाल हुआ उसे सजा क्यों मिलनी चाहिए समझ में नहीं आया। यही नहीं, बैंक कहता है कि दस्तावेज दीजिए नहीं तो खाता बंद कर देंगे। मोबाइल फर्जी दस्तावेज से भी चलता रहता है। उसकी सच्चाई की पुष्टि नहीं होती है, बैंक फोटो कॉपी के साथ ओरिजनल भी मांगता है। यह एक ही देश में एक ही उपभोक्ता के लिए दो तरह के कानून का मामला है।

मैं रोज चार हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल दस, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।




