आज भी एक्सप्रेस में रीतिका की रिपोर्ट पढ़िए और समझिए कि किस तरह चुनाव आयोग में मनमाने तरीके से काम हो रहा है।
आयोग एक व्यक्ति के मनमाने फैसले का केंद्र बन गया है। ज्ञानेश कुमार को तुरंत पद छोड़ना चाहिए।स्कूल के मॉनिटर एग्जाम में भी इससे अधिक पारदर्शिता और जिम्मेदारी ली जाती है।
इतने गंभीर खुलासे के बाद सुप्रीम कोर्ट या सरकार भी चाहे तो वह भी कम से कम इतना ही कर ही सकता है की पूरे SIR प्रोसेस को रद्द करवा दे और 2024आम चुनाव के वोटर लिस्ट को फिर से मानक बनाए! फिर भविष्य में नए सिरे से वोटर लिस्ट को अपडेट करे जिसमे आम जनता को न कष्ट हो और आयोग की तरफ से साजिश की आशंका हो!
-नरेंद्र नाथ मिश्रा, वरिष्ठ पत्रकार
शीतल पी सिंह-
Indian Express में रितिका चोपड़ा की रिपोर्ट एक बड़े षडयंत्र का दस्तावेजी पर्दाफाश है।
इंडियन एक्सप्रेस में 23 और 24 सितंबर को प्रकाशित रिपोर्टें पढ़कर सबसे पहले यह सवाल उठता है: अगर चुनाव आयोग के तीन में से दो आयुक्त ही मतदाता सूची से जुड़े फैसलों और उसके सॉफ़्टवेयर पर लिखित आपत्ति दर्ज कर रहे हों, तो आयोग जनता को भरोसा कैसे दिलाएगा कि पूरी प्रक्रिया पारदर्शी है?
रिपोर्ट के मुताबिक़, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले दस महीनों में कम से कम 14 बार रिकॉर्ड पर आपत्तियाँ उठाईं। उनका कहना था कि कुछ आदेश और फ़ैसले उनकी जानकारी या आयोग की अपेक्षित मंज़ूरी के बिना जारी हुए। ये आपत्तियाँ मामूली दफ़्तरी काम पर नहीं थीं। इनका संबंध नए मतदाता का नाम जोड़ने, मौजूदा नाम हटाने या बहाल करने, SIR की अपीलों और मतदाता सूची के सॉफ़्टवेयर पर नियंत्रण से था। रिपोर्ट के अनुसार, संबंधित आपत्तियों की प्रतियाँ मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को भी भेजी गई थीं।
एक उदाहरण फ़ॉर्म 6 का है, जिसे नया मतदाता बनने के लिए भरना पड़ता है। आयोग के पोर्टल पर उसमें यह सवाल जोड़ दिया गया कि आवेदक, उसके माता-पिता या दादा-दादी का नाम पिछली SIR की मतदाता सूची में था या नहीं। सवाल को अनिवार्य नहीं बताया गया, लेकिन उसका जवाब दिए बिना ऑनलाइन आवेदन आगे नहीं बढ़ता था। 16 मई को विवेक जोशी ने फ़ाइल पर लिखा था कि कानून के तहत निर्धारित फ़ॉर्म को 1960 के नियमों में संशोधन किए बिना इस तरह नहीं बदला जा सकता। 19 मई को संधू ने उनकी बात से सहमति जताई। इसके बावजूद बदलाव लागू हुआ। 13 अगस्त को संधू ने उसे “अनधिकृत” और “ग़ैरक़ानूनी” बताते हुए तत्काल हटाने को कहा, ताकि पहली बार मतदाता बनने वाले युवाओं को परेशानी न हो। यह आयुक्तों की दर्ज की हुई कानूनी आपत्ति थी; किसी अदालत का अंतिम निष्कर्ष नहीं। लेकिन आयोग के लिए इसका सार्वजनिक, स्पष्ट जवाब देना ज़रूरी है।
दूसरा और भी गंभीर मुद्दा है: मतदाता सूची पर आख़िर नियंत्रण किसका है? कानून स्थानीय निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण अधिकारी, यानी ERO, को सूची तैयार करने और दावों तथा आपत्तियों पर निर्णय लेने की ज़िम्मेदारी देता है। लेकिन दोनों आयुक्तों ने चिंता जताई कि ERONet और ECINet में अधिकार धीरे-धीरे दिल्ली स्थित आईटी विभाग के हाथों में सिमट रहे हैं। मई में जोशी ने ऐसे ऑडिट का प्रस्ताव दिया जिससे पता चले कि वैधानिक अधिकारियों के अलावा किसी और के पास मतदाता डेटाबेस बदलने की पहुँच तो नहीं है। अगस्त में संधू ने दर्ज किया कि राज्य और ज़िला स्तर के अधिकारियों को पोर्टल तक पूरा अधिकार नहीं मिल रहा, जिससे वे अपना कानूनी काम नहीं कर पा रहे।
मामला यहाँ तक पहुँचा कि जुलाई में आईटी विभाग की निगरानी से जुड़ा कार्य-विभाजन बदले जाने पर दोनों आयुक्तों ने अलग-अलग कैबिनेट सचिव को लिखा। अगले दिन उन्होंने संयुक्त रूप से उस आदेश को अलग रखकर पुरानी व्यवस्था जारी रखने का निर्देश दिया। जिस संस्था को देश के चुनावों में स्वतंत्र निर्णय लेने हैं, उसके भीतर अधिकार और जवाबदेही को लेकर ऐसी लिखित खींचतान को हल्के में कैसे लिया जा सकता है?
आज की रिपोर्ट ने इस विवाद को गोवा के 97 वास्तविक मतदाताओं की कहानी से जोड़ दिया है। वहाँ स्थानीय ERO ने दस्तावेज़ और आपत्तियाँ देखकर इन लोगों को मतदाता सूची में शामिल करने योग्य पाया। राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी के कार्यालय ने सात दिनों में दिल्ली को आठ ईमेल भेजकर सॉफ़्टवेयर में पुराने फ़ैसले को पलटने की सुविधा माँगी। आयोग के अपने उप चुनाव आयुक्त ने भी आईटी विभाग से कहा कि सॉफ़्टवेयर सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के मुताबिक़ आवश्यक कार्रवाई को नहीं रोक सकता। फिर भी 21 फ़रवरी को प्रकाशित अंतिम सूची में ये 97 नाम नहीं आए। इंडियन एक्सप्रेस ने जाँचकर बताया कि 20 सितंबर तक भी वे नाम सूची में नहीं थे। गोवा के मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने अख़बार से कहा कि राज्य ने नाम शामिल करने के मामले दिल्ली को बताए थे, लेकिन उन्हें शामिल न करने का फ़ैसला वहीं से हुआ।
97 का आँकड़ा देश की विशाल मतदाता संख्या के सामने छोटा लग सकता है। पर इनमें हर व्यक्ति एक नागरिक है, जिसकी पात्रता की जाँच के बाद भी उसका नाम सूची में नहीं आया। गोवा में कुछ स्वास्थ्य योजनाओं की पात्रता भी राज्य की मतदाता सूची से जुड़ी है। इसलिए सवाल सिर्फ़ मतदान के दिन का नहीं, रोज़मर्रा के अधिकारों का भी है।
इस बीच पश्चिम बंगाल की SIR पर संधू का एक और सवाल रिपोर्ट में दर्ज है। जिन मतदाताओं को न्यायिक अधिकारियों ने सूची में शामिल किया, उनके विरुद्ध आयोग की ओर से अपील दाख़िल करने की अनुमति किसने दी और अपील किसने दाख़िल की? यह सवाल इसलिए अहम है क्योंकि आयोग ने सुप्रीम कोर्ट को बताया है कि 22.21 लाख अपीलें हटाए गए मतदाताओं ने नाम बहाल कराने के लिए कीं, जबकि 16.10 लाख अपीलें सूची में शामिल मतदाताओं के नाम हटवाने के लिए थीं। उन दूसरी अपीलों को किसने दाख़िल किया, यह आयोग ने अपने जवाब में स्पष्ट नहीं किया था। इस तथ्य से अपने आप किसी चुनाव के नतीजे के बारे में निष्कर्ष नहीं निकलता, लेकिन प्रक्रिया का हिसाब माँगना बिल्कुल जायज़ है।
चुनाव आयोग के भीतर मतभेद होना अपने आप में अपराध नहीं है। असली कसौटी यह है कि दर्ज आपत्तियों पर क्या निर्णय हुआ, किस अधिकार से हुआ और उसका रिकॉर्ड क्या है। 2023 का कानून भी कहता है कि आयोग का काम जहाँ तक संभव हो सर्वसम्मति से चले; मतभेद होने पर बहुमत की राय से फैसला हो। यहाँ सवाल यह है कि जब दो आयुक्त बार-बार कहते रहे कि उन्हें फैसलों की जानकारी या मंज़ूरी की प्रक्रिया में शामिल नहीं किया गया, तब आयोग की सामूहिक निर्णय-प्रक्रिया कैसे चली?
इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार, उसने 21 सितंबर को आयोग और दोनों आयुक्तों से इन चिंताओं पर जवाब माँगा था; रिपोर्ट प्रकाशित होने तक जवाब नहीं मिला। अब आयोग को दस्तावेज़ों के साथ बताना चाहिए: फ़ॉर्म 6 का बदलाव किसने स्वीकृत किया, ERO को अपना निर्णय सॉफ़्टवेयर में लागू करने की पूरी सुविधा कब मिलेगी, प्रस्तावित ऑडिट का क्या हुआ, और गोवा के 97 पात्र मतदाताओं के नाम अब तक क्यों नहीं जुड़े?
लोकतंत्र में चुनाव आयोग से भरोसा माँगने भर से भरोसा पैदा नहीं होता। जब उसके अपने दो आयुक्त लिखित सवाल उठाएँ और स्थानीय अधिकारी पात्र पाए गए मतदाता का नाम भी दर्ज न कर सकें, तो जवाब देना आयोग की संवैधानिक ज़िम्मेदारी है।
रितिका की मूल रिपोर्ट-
Still awaited… urgently required’: गोवा कर्मचारियों ने 7 दिन में 8 ईमेल भेजे, लेकिन चुनाव आयोग ने वैध मतदाताओं को बाहर रखा
पणजी- दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में 97 मतदाता भले ही छोटी संख्या लगें, लेकिन गोवा की यह कहानी राष्ट्रीय महत्व की है। फरवरी 2026 में स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) के तहत गोवा की अंतिम मतदाता सूची प्रकाशित होने से ठीक पहले राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी (CEO) डॉ. संजय गोयल ने दिल्ली स्थित चुनाव आयोग (ECI) को सात दिनों में आठ बार ईमेल और पत्र भेजे। इनमें 97 ऐसे मतदाताओं की सूची थी, जिन्हें गोवा के अपने इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर्स (EROs) ने सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुसार सुनवाई कर, दस्तावेज जांचकर पात्र पाया था। इन मतदाताओं को पहले “लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी” (तार्किक असंगति) के कारण सूची से बाहर किया गया था। सुप्रीम कोर्ट के 29 जनवरी 2026 के आदेश के बाद गोवा ने सूची प्रकाशित की, 649 मतदाता आगे आए और 97 मामलों में EROs ने फैसला लिया कि पहले का निर्णय “रिवर्स” करना होगा और नाम अंतिम सूची में शामिल करने होंगे। समस्या यह थी कि ECINet सॉफ्टवेयर (चुनाव आयोग का केंद्रीकृत सिस्टम) में “रोलबैक” या रिवर्ट का विकल्प ही नहीं था। EROs अपने फैसले लागू नहीं कर सकते थे क्योंकि अनुमति दिल्ली के IT डिवीजन के पास थी। ईमेल में बार-बार लिखा गया: “response… is still awaited” (जवाब अभी भी प्रतीक्षित)
“The Roll back option is urgently required”
“The matter is most urgent”
18 फरवरी को दिल्ली के डिप्टी इलेक्शन कमिश्नर ने भी IT महानिदेशक सीमा खन्ना को लिखा कि IT सिस्टम सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुसार जरूरी कार्रवाई को नहीं रोक सकता। फिर भी 21 फरवरी को अंतिम सूची प्रकाशित हो गई और ये 97 नाम उसमें नहीं थे। सितंबर 2020 तक भी ये नाम सूची में गायब हैं। गोवा के CEO संजय गोयल ने इंडियन एक्सप्रेस से कहा:
“हमने ECI को इन मामलों की जानकारी दी थी। फैसला उनका था। लेकिन ECINET में ERO स्तर पर नाम फिर से शामिल करने का कोई तंत्र होना चाहिए।” इन 97 में से 65 तलेगाव विधानसभा क्षेत्र से हैं। गोवा में मतदाता सूची से बाहर होना सिर्फ वोट का नुकसान नहीं है। राज्य की कई स्वास्थ्य योजनाएं (जैसे मेडिक्लेम स्कीम—डायलिसिस, ट्रांसप्लांट, केमोथेरेपी आदि) सिर्फ मतदाताओं के लिए खुली हैं। यह मामला चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी की चिंताओं से जुड़ा है, जिन्होंने ECINet के केंद्रीकरण और जमीनी अधिकारियों की शक्तियां छिनने पर 10 महीने में 14 बार आपत्ति दर्ज की थी।
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