धीरज फूलमति सिंह-
कुछ माह पहले मुझ से किसी ने पूछा था कि आज खोजी पत्रिकारिता विलुप्त सी हो गई है, ऐसा क्यों?
सच बताऊ, पत्रकारिता में कदम रखने के साथ यह बात मैं भी महसूस कर रहा था, कि आज खोजी पत्रकारिता नहीं होती है। जुर्म उजागर करने के लिए पुलिस के पास अधिकार होते है, सेना, नेता और प्रशासन सबके पास कानूनी अधिकार होते है पर पत्रकार के पास कोई अधिकार नहीं होता है।
पत्रिकारिता एक जुनून है, जो सबके पास नहीं होती है। जैसे जासूस होते है ना? जासूसी करो, दुश्मन देश की जानकारी अपने मुल्क को दो पर वाह-वाही नहीं मिलती और अगर पकड़े गए तो अपना मुल्क भी हाथ उठा देता है कि हम इन्हें नहीं जानते। गुमनामी की मौत मर जाते हैं, कोई पुछने वाला नहीं है। पत्रकारों की स्थिती भी कमोवेश वैसी ही है।
ऐसे में खोजी पत्रकारिता कर के अपनी और अपने परिवार की जान जोखिम में कौन डालना चाहेगा? तनख्वाह लो और शांत रहो…यही बेहतर है।
कुछ दिन पहले धनबाद में कोयला माफिया का शिकार एक खोजी पत्रकार हो गए, कितने लोगों को यह बात पता है, उनका नाम कौन जानता है। छत्तीसगढ़, बिहार और महाराष्ट्र में तो कई केस हैं, खोजी पत्रकारों के मरने और मारने के। नक्सलवाद में कई पत्रकारों की बली चढ़ गई है, कितनों को हम जानते हैं? उनके लिए संवेदना व्यक्त करना तो दूर की बात है।
बड़ी बेरहमी से हम कह देते है कि पत्रकारिता आज दलाली का धंधा हो गई है मगर हम में से कितने लोग समझते है कि पत्रकार की मजबूरी क्या है? एक पत्रकार की कमजोरी क्या है? उसके कानूनी अधिकार क्या हैं?
अन्याय, जुर्म के खिलाफ एक्शन लेते हुए पुलिस या सैनिक शहीद हो जाये तो उन्हें वीरता पुरस्कार मिलता है, देश और समाज से सम्मान मिलता है, परिवार के सदस्य को नौकरी और भरण-पोषण के लिए आमदनी का जरिया सरकार मुहैय्या करवाती है लेकिन अपराध को उजागर करते समय अगर एक पत्रकार को मार दिया जाता है तो उसे क्या मिलता है? …..कुछ नहीं।
अपराध को उजागर करते समय वसई (मुंबई) में कुछ साल पहले एक खोजी पत्रकार को खौलते कोलतार के ड्रम में जिंदा ही डाल दिया गया था…क्या हुआ? कुछ नहीं। अपराधी आज भी खुले घूम रहे हैं। आप एक बार कल्पना करके देखिए, खौलते कोलतार में जिंदा डाले जाने पर आप को कैसा लगेगा? डर के मारे रौंगटे न खड़े हो जायें तो कहना!
पत्रकारिता की मजबूरी क्या होती है? पत्रकारिता में साजिश कैसे होती है? खोजी पत्रकार की औकात क्या होती है? पत्रकार का डर क्या होता है? पत्रकारिता अब व्यवसाय क्यों हो गई है?
आप को इन सवालों के जवाब चाहिए तो आप को नेटफ्लीक्स पर रिलीज हुई “रिपोर्टिंग लाईव” फिल्म जरूर देखनी चाहिए। इस फिल्म ने मेरे रोंगटे खडे कर दिये, खोजी पत्रिकारिता को लेकर मेरे मन में उमड़ते सभी सवालों के जवाब दे दिये हैं, शायद आप को भी जवाब मिल जाए? और आप में से कई लोग पत्रकारों का सम्मान करने लगे!



