संजय कुमार सिंह
वैसे तो देश भर में 28 विधानपरिषद चुनाव और नतीजे की खबर बहुत बड़ी नहीं है लेकिन सीटें सत्तारूढ़ पार्टी जीत जाए तो मामला गंभीर है। खास कर तब जब चुनाव चोरी और मुख्य चुनाव आयुक्त पर पक्षपाती होने का आरोप है। देश भर में इससे नाराजगी जाहिर है। इसका मुकाबला प्रधानमंत्री की चिन्ता हो सकती है। सत्ता और पार्टी (के पूरे परिवार) की साख बचाना भी उन्हीं की जिम्मेदारी हो सकती है। लेकिन इसके लिए जो तरीके अपनाए जाएंगे वह व्यक्ति के अनुसार अलग होंगे। मनमोहन सिंह ने लगभग कोई कोशिश नहीं की या जो की वह वैसे चर्चित नहीं हुई जैसे नरेन्द्र मोदी की कोशिशें हैं।
मुझे लगता है कि मौजूदा समय में भाजपा या सत्तारूढ़ दल के लिए चुनाव जीतना इतनी बड़ी उपलब्धि नहीं है कि प्रधानमंत्री स्वयं इस स्तर का प्रचार करें और किया तो जाहिर है नीचे वालों के लिए संदेश के रूप में देखा गया। देवेन्द्र फडणवीस ने प्रधानमंत्री के ट्वीट को अपनी टिप्पणी, अ बिग फैट जीरो के साथ रीट्वीट कर दिया लेकिन कांग्रेस शून्य पर नहीं रही। इससे बड़ी बात है कि भाजपा ने सारी सीटें नहीं जीतीं और नागपुर, बनारस जैसी सीटों पर हार गई है। ठीक है कि कांग्रेस के लिए एक सीट जीतना उपलब्धि नहीं है लेकिन भाजपा के लिए खास सीटें हारना ज्यादा शर्मनाक है। चुनाव चोरी का संतोषजनक जवाब नहीं होने पर भी। आज के अखबारों के लिए यह एक बड़ा और दिलचस्प मामला था। लेकिन अखबारों में आमतौर पर खबर वैसे नहीं है।
कई अखबारों ने चुनाव नतीजों को लीड बनाया है और भाजपा के सभी सीटों पर नहीं जीतने पर भी प्रधानमंत्री इतने खुश हैं या खुशी जता रहे हैं तो यह जानकारी भी महत्वपूर्ण है कि तीन टीएमी सांसद (राज्यभा सदस्य) सुखेंदु शेखर रॉय, सुष्मिता देव और प्रकाश चिक बड़ाइक भाजपा टिकट पर राज्यसभा उप चुनाव जीत गए तब भाजपा ने ऐसे सीना नहीं ठोका था। क्यों? समझना मुश्किल नहीं है। जाहिर है, 12 साल बाद भी प्रधानमंत्री देश के एक काबिल, अनुभवी और परिपक्व प्रधानमंत्री के रूप में काम करने की बजाय चुनावी राजनीति कर रहे हैं। भले यह गलत न हो पर देश को उनकी योग्यता का कोई लाभ मिलता नहीं दिख रहा है और एक चुनाव में वोटर दूसरे उम्मीदवार की तुलना इस आधार पर भी करेगा।
चुनाव निष्पक्ष हो, सभी दलों के लिए समान स्थितियां हों, वोटर जागरूक और जानकार हों तो नतीजे बदल सकते हैं पर सरकार मतदाताओं तक सही और निष्पक्ष सूचनाएं पहुंचने से रोकने के लिए हर संभव उपाय कर रही है। मीडिया उसका पूरा साथ दे रहे हैं। इसलिए आज विधानसभा चुनाव नतीजों की खबर की ही चर्चा करूंगा। अमर उजाला में आज यह खबर लीड है। फ्लैग शीर्षक है, चार राज्यों की 28 सीटों के लिए मतगणना। मुख्य शीर्षक है, एनडीए का 16 सीटों पर परचम, यूपी में भाजपा 6, सपा को चार सीटें। बीच में हाइलाइट किया गया है, पीएम मोदी बोले – पर्ची से चुनाव हुए अनुमान लगाइए कांग्रेस कितना जीती।
आप जानते हैं कि 2014 में भी नरेन्द्र मोदी कांग्रेस पर आरोप लगाते थे। 12 साल से सत्ता में हैं, कांग्रेस सत्ता से काफी दूर है फिर भी, अभी भी वे कांग्रेस का ही विरोध करते हैं और उसी के खिलाफ प्रचार करते हैं। ठीक है कि वे करते हैं तो खबर है लेकिन मीडिया के लिए संपादकीय विवेक भी कुछ होता था। वह अब ढूंढ़ना पड़ता है और मैं उसी को रेखांकित करता रहता हूं। उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव अगले लोक सभा चुनाव से पहले होंगे। यहां भाजपा का मुकाबला सपा यानी समाजवादी पार्टी से है। विधान परिषद चुनाव सपा का प्रदर्शन खराब नहीं है। प्रधानमंत्री के लिए वह मुद्दा भी नहीं है। उन्हें कांग्रेस की आलोचना करनी है ताकि विपक्ष को न लगे कि कांग्रेस और उसके नेता उनका योग्य, सक्षम विकल्प हो सकते हैं। अमर उजाला ने समाजवादी पार्टी के प्रदर्शन को महत्व दिया है।
दैनिक भास्कर में पहले पन्ने पर यह खबर नहीं है। विज्ञापन है लेकिन पहले पन्ने की लीड, सेकेंड लीड बनानी होती तो बन ही सकती थी। दिलचस्प यह है कि दूसरे पहले पन्ने पर भी यह खबर नहीं है। दोनों पन्ने पर लगभग आधा विज्ञापन है और इस तरह पूरे पहले पन्ने पर इस खबर को जगह नहीं मिली है। पहले पन्ने की लीड है, जियो देश की दूसरी बड़ी कंपनी, टाटा को पीछे छोड़ रिलायंस सबसे बड़ा ग्रुप। जियो की खबर दूसरे अखबारों में भी पहले पन्ने पर है। इसी तरह, आज टाटा की खबर भी कुछेक अखबारों में पहले पन्ने पर है। द टेलीग्राफ में तो लीड है। लेकिन दैनिक भास्कर में टाटा की खबर दोनों ही पहले पन्नों पर नहीं है। द टेलीग्राफ की लीड का शीर्षक है, राहुल टाटा विवाद में कूदे। द टेलीग्राफ में विधान परिषद चुनाव नतीजे की खबर वैसे नहीं है जिससे भाजपा को लाभ हो। शीर्षक है, बैलट (पत्र के नतीजे) पर तंज से वाराणसी की हार छिप गई।
आप जानते हैं कि उत्तर प्रदेश के अखबार अमर उजाला ने अपने दिल्ली संस्करण में प्रधानमंत्री के तंज को तो प्रमुखता दी है लेकिन वाराणसी में भाजपा की हार को महत्व नहीं दिया है। यह संपादकीय विवेक और बेईमानी का मामला है आप चाहे जैसे देखें। ठीक है कि प्रधानमंत्री ने कहा तो उनकी बात छप गई बनारस में हार या जीत पर किसी ने शायद कहा ही नहीं हो। पर वह अलग मुद्दा है। मेरा मकसद किसी को दोष देना नहीं है। मैं चाहता हूं कि पाठक इन बातों को समझें। तभी यह यकीन होगा कि गुब्बारे की हवा तेजी से निकल रही है या निकल चुकी है। द टेलीग्राफ में आज की तीसरी महत्वपूर्ण खबर भी पहले पन्ने पर पुरी की फोटो के साथ तीन कॉलम में है। शीर्षक हिन्दी में कुछ इस तरह होता, पुरी ने एपस्टीन के भूत को हरा दिया।
दि एशियन एज में यह टॉप पर दो कॉलम की खबर है जिसका शीर्षक तीन लाइनों में है। हिन्दी में यह इस तरह होता, हरदीप पुरी को उत्तर प्रदेश से इनकार के बाद मध्य प्रदेश से राज्यसभा का टिकट मिला। मध्य प्रदेश के नेताओं ने कहा, चौंकाने वाला चुनाव। देशबन्धु में एमएलसी चुनाव में भाजपा को झटका शीर्षक खबर पांच कॉलम की लीड है। लेकिन टाटा समूह के मामले में राहुल गांधी के कूदने की खबर नहीं है। हरदीप सिंह पुरी फिर जाएंगे राज्यसभा भी सामान्य खबर की तरह है। हालांकि, यहां एक और दिलचस्प राजनीतिक खबर है, अशोक होटल और रामलीला मैदान में अनुमति नहीं मिलने के बाद अब इंडिया गठबंधन ने कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के सरकारी आवास 10 राजाजी मार्ग पर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार गुप्ता के खिलाफ कल सार्वजनिक महाभियोग कार्यक्रम आयोजित करने का फैसला किया है।
आप समझ सकते हैं कि विपक्ष के लिए एक राजनीतिक कार्यक्रम करना इतना मुश्किल बना दिया जाए तो चुनाव जीतना कितना मुश्किल होगा और उसपर भी हारने पर तंज जैसे चुनाव किसी महान योग्यता, लोकप्रियता या ऐतिहासिक योगदान के कारण जीते जा रहे हैं। यह सब वे लोग कर रहे हैं जो इमरजेंसी और चुनाव खारिज किए जाने के हाईकोर्ट के फैसले के कारण इंदिरा गांधी की आलोचना करने का कोई मौका नहीं चूकते रहे हैं। आज जब ऊपर वर्णित अखबारों ने संबंधित खबरों को महत्व दिया या नहीं दिया है तब दि इंडियन एक्सप्रेस ने की लीड बताती है कि सुप्रीम कोर्ट ने एसआईआर को चुनौती देने पर सुनवाई की और खबर यह है कि लॉजिकल डिसक्रिपेंसी की कानूनी वैधता का निर्णय अभी तक नहीं हुआ है। हिन्दुस्तान टाइम्स की लीड का शीर्षक है, सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग से फॉर्म 6 के उपयोग पर सवाल किया, मतदाताओं को नोटिस। यहां एमएलसी चुनाव की खबर भी प्रमुखता से है। शीर्षक है – एमएलसी चुनाव : भाजपा 13 सीटें जीती, कांग्रेस एक; समाजवादी पार्टी फायदे में।
टाइम्स ऑफ इंडिया की लीड दिल्ली की मतदाता सूची में सूचना जोड़ने के लिए तय 30 अक्तूबर की अंतिम तिथि को खत्म किया- है। विधान परिषद चुनाव नतीजे की खबर दो कॉलम में है। इसका शीर्षक है, एमएलसी चुनाव की 28 में से से 16 सीटें एनडीए को मिली; उत्तर प्रदेश में भाजपा को छह के मुकाबले समाजवादी पार्टी को 5 सीटें मिलीं। मोदी जी का तंज यहां भी है और इस खबर के साथ है लेकिन छोटी सी खबर है। विवरण अंदर होने की सूचना है। हरदीप पुरी को राज्य सभा चुनाव के लिए उम्मीदवार बनाए जाने की खबर भी छोटी सी है लेकिन टाटा के मुद्दे पर राहुल गांधी ने सरकार पर हल्ला बोला, वित्त मंत्री ने पलटवार किया – दो कॉलम की खबर है।
द हिन्दू की लीड का शीर्षक है, सुप्रीम कोर्ट ने पूछा, क्या चुनाव आयोग के पास मतदाताओं को दंडित करने की शक्ति है? सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि चुनाव आयोग की यह ‘गलती’ है कि वह उन पुराने मतदाताओं को, जिनके नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए थे, नए मतदाताओं के रूप में आवेदन करने के लिए मजबूर किया। कोर्ट ने सवाल किया कि अगर मतदाता एसआईआर प्रक्रिया के दौरान सुस्त रहे या उन्होंने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी, तो उन्हें वोट देने के अधिकार से कैसे वंचित किया जा सकता है? याचिकाकर्ताओं के वकील प्रशांत भूषण ने बताया कि एसआईआर प्रक्रिया की शुरुआत में दिल्ली में कुल 1,45,10,299 मतदाता थे, जिनमें से 47,56,722 मतदाताओं के बारे में यह दर्ज किया गया कि उन्होंने अपने ‘एन्यूमरेशन फॉर्म’ (विवरण फॉर्म) वापस नहीं जमा किए।
खबर के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने पूछा, “मान लीजिए कि कोई मतदाता सुस्त था या उसने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी; तो क्या यह आपके [चुनाव आयोग के] लिए… उसके वोट देने के अधिकार को हमेशा के लिए छीन लेने का आधार बन सकता है?” राहुल गांधी-टाटा की खबर दि इंडियन एक्सप्रेस में भी है। शीर्षक है, राहुल (गांधी) ने कहा टाटा को आपराधिक तौर पर नष्ट किया जा रहा है, वित्त मंत्री ने ‘उकसाने’ की कोशिश की आलोचना की। विधान परिषद चुनाव वाली खबर दि इंडियन एक्सप्रेस में भी है। इसके अनुसार प्रधानमंत्री ने तंज कसा : शीर्षक है, बैलट पेपर से हुए चुनाव में कांग्रेस का सूपड़ा साफ, अनुमान लगाइए कांग्रेस ने कितनी सीटें जीतीं।
नवोदय टाइम्स में सरकारी कर्मचारियों का महंगाई भत्ता तीन फासद बढ़ने की खबर टॉप पर बॉक्स में है। नवोदय टाइम्स की लीड तो फॉर्म 6 भरने की शर्त पर सुप्रीम कोर्ट ने उठाए सवाल – खबर है लेकिन जियो प्लैटफॉर्म्स लिमिटेड के आईपीओ की लिस्टिंग सेरेमनी में कंपनी के डायरेक्टर अनंत अंबनी का भाषण विज्ञापन की तरह छपा है। हो सकता है विज्ञापन ही हो या यह भी संभव है कि अखबार ने अति उदारता में पूरी विज्ञप्ति जैसे आई वैसे ही छाप दी। यह इसलिए भी दिलचस्प है कि इस खबर या विज्ञप्ति या प्रचार का शीर्षक वही है जो अखबार के पहले पन्ने से पहले छपने विज्ञापन या जैकट का शीर्षक है। मुझे नहीं लगता है कि इसपर किसी तरह की टिप्पणी की कोई आवश्यकता है।

मैं रोज चार हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल दस, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।



