भारत में प्रेस की आजादी और पत्रकारों की सुरक्षा को लेकर अब अंतरराष्ट्रीय मीडिया में भी सवाल उठ रहे हैं। ऑस्ट्रेलिया के सरकारी ब्रॉडकास्टर ABC ने 30 अक्टूबर को एक विस्तृत रिपोर्ट प्रकाशित की है। इसमें अक्टूबर में दिल्ली सहित देश के अलग-अलग शहरों में प्रदर्शनों की कवरेज कर रहे पत्रकारों को हिरासत में लिए जाने, टीवी मीडिया के बदलते स्वरूप, सोशल मीडिया पोस्ट हटाए जाने और विदेशी मीडिया पर लगाई जा रही पाबंदियों का मुद्दा उठाया गया है। रिपोर्ट में कई वरिष्ठ भारतीय पत्रकारों के अनुभव और विचार भी शामिल हैं।
ABC की रिपोर्ट के मुताबिक, कमेटी टू प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट्स (CPJ) ने अक्टूबर में दो दिनों के भीतर देशभर में कम से कम 43 पत्रकारों को हिरासत में लिए जाने की पुष्टि की थी। इनमें से कम से कम 39 पत्रकार दिल्ली में और बाकी पत्रकार दूसरे शहरों में हिरासत में लिए गए थे। ये पत्रकार मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर हुए प्रदर्शनों की रिपोर्टिंग कर रहे थे। प्रदर्शनकारियों का आरोप था कि मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) का इस्तेमाल सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी के पक्ष में किया जा रहा है। चुनाव आयोग और सरकार ने इन आरोपों को खारिज किया है।
घर से निकले और पुलिस ने बस में बैठा दिया
ABC की रिपोर्ट की शुरुआत पत्रकार शोएब दानियाल के अनुभव से होती है। दानियाल काम के सिलसिले में प्रदर्शन की कवरेज करने घर से निकले थे। उनके घर के बाहर एक पुलिस चौकी बनाई गई थी, जो एक दिन पहले तक वहां नहीं थी। उन्होंने वहां तैनात पुलिस अधिकारी से प्रदर्शन को लेकर बातचीत शुरू की। दानियाल के मुताबिक, अधिकारी उन पर संदेह करने लगा और नाराज होकर हिरासत में लेने की बात कहने लगा। इसके बाद बिना कोई कारण बताए उन्हें बस में बैठा दिया गया।
रिपोर्ट में न्यूजलॉन्ड्री की एडिटर-इन-चीफ मनीषा पांडे ने कहा कि राष्ट्रीय राजधानी में, जहां बड़ी संख्या में पत्रकार काम करते हैं, वहां किसी सरकार का इस तरह की कार्रवाई करने का भरोसा दिखाना हैरान करने वाला है। उनके मुताबिक, ऐसी कार्रवाई से बड़े पैमाने पर आक्रोश पैदा होना स्वाभाविक है।
श्रीनिवासन जैन बोले- टीवी मीडिया का बड़ा हिस्सा सरकार का प्रचारक बन गया
ABC की रिपोर्ट में भारतीय मीडिया की मौजूदा स्थिति पर NDTV में करीब 30 साल तक काम कर चुके पत्रकार श्रीनिवासन जैन की टिप्पणी भी शामिल है। उन्होंने कहा कि भारतीय मीडिया कभी पूरी तरह स्वतंत्र नहीं रहा और हमेशा सरकार के दबाव का सामना करता रहा है। लेकिन पिछले एक दशक में उन्होंने जो बदलाव देखा है, वह मीडिया का पूर्ण पतन है। खासकर टीवी मीडिया का बड़ा हिस्सा सरकार के प्रचारक के रूप में काम करने लगा है।
जैन ने 2022 में अडानी समूह के अधिग्रहण के बाद NDTV छोड़ दिया था। ABC से बातचीत में उन्होंने बताया कि नेटवर्क के नए प्रबंधन की संपादकीय दिशा कुछ ही हफ्तों में स्पष्ट होने लगी थी। उन्होंने एक उदाहरण देते हुए कहा कि पत्रकारों की आपत्ति के बावजूद गौतम अडानी का एक प्रतिद्वंद्वी चैनल को दिया गया इंटरव्यू प्रसारित करने का दबाव बनाया गया था। जैन ने हालिया प्रदर्शनों के दौरान पत्रकारों की धरपकड़ को एक ‘घायल सत्ता’ की प्रतिक्रिया बताया। उनके मुताबिक, प्रदर्शनों को दबाने के लिए असाधारण बल का इस्तेमाल किया गया और मीडिया को चुप कराने या डराने की कोशिश भी इसी प्रतिक्रिया का हिस्सा थी।
प्राइम टाइम में कई ‘फॉक्स न्यूज’ जैसे चैनल
न्यूजलॉन्ड्री की मनीषा पांडे ने भारत के प्राइम टाइम टीवी न्यूज परिदृश्य की तुलना अमेरिका के फॉक्स न्यूज जैसे कई चैनलों से की। उन्होंने कहा कि कई चैनलों पर सरकार की तारीफ करने वाले एक जैसे मुद्दे उठाए जाते हैं, सरकार से सवाल कम किए जाते हैं और विपक्ष तथा प्रदर्शनकारियों को निशाना बनाया जाता है। असहमति जताने वालों को देश का दुश्मन तक बताया जाता है।
पांडे के मुताबिक, सरकार की बातों को दोहराने वाले एंकरों को अक्सर मंत्रियों और प्रधानमंत्री के इंटरव्यू जैसे महत्वपूर्ण अवसर मिलते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि कॉरपोरेट स्वामित्व और सरकारी विज्ञापन मीडिया पर दबाव की एक और परत जोड़ते हैं। कई टीवी नेटवर्क सरकारी विज्ञापनों से होने वाली कमाई पर निर्भर हैं और उनका स्वामित्व ऐसे कारोबारी समूहों के पास है, जिनके व्यावसायिक हित सरकारी ठेकों से जुड़े हैं।
युवा दर्शक टीवी न्यूज से दूर हो रहे हैं
मनीषा पांडे ने कहा कि युवा भारतीय उस टीवी न्यूज से तेजी से दूरी बना रहे हैं, जिसे उनके माता-पिता वर्षों से देखते आए हैं। उनके मुताबिक, पिछले 12 वर्षों में टीवी न्यूज में शिक्षा, रोजगार और बुनियादी ढांचे जैसे युवाओं से जुड़े मुद्दों को पर्याप्त जगह नहीं मिली। इसके चलते स्वतंत्र डिजिटल न्यूज प्लेटफॉर्म और सोशल मीडिया पर सक्रिय पत्रकारों तथा कंटेंट निर्माताओं के लिए जगह बनी है।
ABC ने राजनीतिक व्यंग्यकार रमित वर्मा का भी जिक्र किया, जिन्हें दिल्ली में प्रदर्शन की कवरेज के दौरान हिरासत में लिया गया था। वर्मा ने कहा कि वह चाहते हैं कि ज्यादा से ज्यादा भारतीय घटनाओं का दस्तावेजीकरण करें, ताकि सत्ता में बैठे लोगों को जवाबदेह बनाया जा सके। उन्होंने मुख्यधारा के मीडिया की भूमिका पर भी सवाल उठाए।
मार्च से जुलाई के बीच करीब 1.95 लाख पोस्ट हटाने के आदेश
रिपोर्ट में सोशल मीडिया पर सामग्री हटाने की सरकारी कार्रवाई का भी उल्लेख है। ABC ने इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के हवाले से बताया कि केंद्र सरकार ने मार्च से जुलाई के बीच इंस्टाग्राम, फेसबुक और यूट्यूब पर प्रकाशित पोस्ट को हटाने के लिए करीब 1.95 लाख आदेश दिए।
दिल्ली में प्रदर्शन की कवरेज के दौरान हिरासत में लिए गए रमित वर्मा ने कहा कि उनकी कितनी पोस्ट हटाई जा चुकी हैं, अब उन्हें इसकी गिनती भी याद नहीं है। उनके मुताबिक, बिना स्पष्ट कारण बताए सोशल मीडिया पोस्ट हटाया जाना अब आम बात बनती जा रही है।
BBC और अल जज़ीरा पर भी नियमों का दबाव
ABC की रिपोर्ट में विदेशी मीडिया संस्थानों के सामने आ रही चुनौतियों का भी जिक्र है। रिपोर्ट के मुताबिक, BBC और अल जज़ीरा जैसे बड़े अंतरराष्ट्रीय प्रसारकों को भारत में अपना काम जारी रखने के लिए भारतीय इकाई स्थापित करने और स्थानीय कर्मचारियों को नियुक्त करने जैसी शर्तों का सामना करना पड़ा है।
विदेशी पत्रकारों के लिए कुछ भौगोलिक क्षेत्रों में रिपोर्टिंग की पहुंच भी सीमित है। जम्मू-कश्मीर और लद्दाख जैसे इलाकों में जाने के लिए सरकारी अनुमति की जरूरत का भी रिपोर्ट में उल्लेख किया गया है।
DPDP कानून को लेकर भी उठे सवाल
डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण (DPDP) कानून भी ABC की रिपोर्ट का हिस्सा है। रिपोर्ट में कहा गया है कि नए निजता संबंधी प्रावधानों को लेकर पत्रकारिता जगत में चिंता है। डिजिटल न्यूज पब्लिशर्स एसोसिएशन (DNPA) ने इसे ‘प्री-सेंसरशिप’ यानी खबर प्रकाशित होने से पहले ही उस पर रोक लगाने की आशंका पैदा करने वाला कानून बताया है।
DNPA 21 समाचार प्रकाशकों की ओर से सुप्रीम कोर्ट में इस कानून को चुनौती दे रहा है और मांग कर रहा है कि पत्रकारों को इससे छूट दी जाए, ताकि प्रेस की स्वतंत्रता सुरक्षित रह सके। विवाद का एक प्रमुख पहलू यह है कि खबरों में किसी व्यक्ति की पहचान उजागर करने से पहले उसकी सहमति लेने की जरूरत पत्रकारिता के काम को किस तरह प्रभावित कर सकती है।
पत्रकारों के मन में बढ़ा डर, ABC ने सरकार से मांगा जवाब
रिपोर्ट के अंत में शोएब दानियाल ने कहा कि पिछले 12 वर्षों में पत्रकारों के भीतर डर तेजी से बढ़ा है। उनके मुताबिक, यह बुनियादी धारणा भी कमजोर हुई है कि पत्रकार लोकतंत्र के लिए एक महत्वपूर्ण और जरूरी काम करते हैं।
ABC ने अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट किया है कि उसने दिल्ली पुलिस और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार से इन आरोपों पर प्रतिक्रिया मांगी है।
इस बीच, रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स (RSF) के 2026 के वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स में भारत 180 देशों में 157वें स्थान पर है। वर्ष 2019 में भारत 140वें स्थान पर था। 2025 में भारत की रैंकिंग 151 थी, जो 2026 में छह स्थान और नीचे आ गई।
ऑस्ट्रेलिया के सरकारी प्रसारक की यह रिपोर्ट ऐसे समय आई है, जब भारत में पत्रकारों की सुरक्षा, मीडिया की संपादकीय स्वतंत्रता, सरकारी विज्ञापन पर निर्भरता और डिजिटल मंचों पर सामग्री हटाने जैसे मुद्दों पर लगातार बहस हो रही है।
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