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विनोद मेहता कहीं आलोक मेहता के भाई तो नहीं हैं?

Sushant Jha : विनोद मेहता से सिर्फ एक बार मिला, वो भी संयोग से। सन् 2004 में IIMC में एडमिशन लेना था, प्रवेश परीक्षा का फार्म खरीद लिया था। एक सज्जन थे जो 1000 रुपये प्रति घंटा विद चाय एंड समोदा कोचिंग करवाते थे। किसी भी कीमत पर IIMC में घुस जाने की जिद ने मुझे नोएडा सेक्टर 30(शायद) के एक सोसाइटी में पहुंचा दिया। सुबह के सात-साढे सात बजे होंगे। हमारी कोचिंग चल ही रही थी, कि कॉलबेल बजा।

Sushant Jha : विनोद मेहता से सिर्फ एक बार मिला, वो भी संयोग से। सन् 2004 में IIMC में एडमिशन लेना था, प्रवेश परीक्षा का फार्म खरीद लिया था। एक सज्जन थे जो 1000 रुपये प्रति घंटा विद चाय एंड समोदा कोचिंग करवाते थे। किसी भी कीमत पर IIMC में घुस जाने की जिद ने मुझे नोएडा सेक्टर 30(शायद) के एक सोसाइटी में पहुंचा दिया। सुबह के सात-साढे सात बजे होंगे। हमारी कोचिंग चल ही रही थी, कि कॉलबेल बजा।

सामने एक कड़क मूंछों वाले सज्जन थे जो अभी-अभी जॉगिंग करके आ रहे थे-बिल्कुल निक्कर में। उन्होंने अंग्रेजों जैसी अंग्रेजी में पूछा, ‘एंड हाऊ आर यू जेंटिलमैन? स्टार्टेड अर्ली टुडे?…उन्होंने सबसे हाथ मिलाया। कोचिंग करनेवाले सज्जन ने हमसे पूछा, ‘इनको जानते हो? अब मैं असमंजस में! अंग्रेजी पत्रिकाएं तो पढता था, लेकिन अंग्रेजी पत्रकारों को न जाने कौन से लोक का समझता था। नाम ही याद न था। तो फिर उन्होंने कहा- ‘ये विनोद मेहता हैं, आउटलुक के संपादक। हमारे ऊपर रहते हैं’।

विनोद मेहता ने मुस्कुरा कर कहा, ‘देखा कर्नल हमें भी बहुत सारे लोग नहीं जानते हैं।’ खैर, विनोद मेहता जैसे तीर से आए थे, वैसे ही चले गए। मेरी बिहारी बुद्धि ! मैंने उनके जाने के के बाद तपाक से पूछा, ‘ये आलोक मेहता के भाई हैं क्या? (आलोक मेहता हिंदी वाले थे, संयोग से हिंदी आउटलुक में भी थे-सो मैंने सोचा कि पक्का विनोद मेहता ने भाई को रख लिया होगा!) लेकिन कोचिंग वाले गुरुजी ने कहा, ‘नहीं दोनों में कोई संबंध नहीं है सिवाय इसके कि दोनों के नाम के आखिरी में मेहता है।’

उसके बाद तो मैं मेहता की लेखनी, उनके बोलने के स्टाइल, उनके डार्क ह्यूमर का फैन हो गया। हालांकि उनका झुकाव एक हद तक कांग्रेस के प्रति था और वे कई सारी नीतियों के आधार पर बीजेपी के विरोधी थे लेकिन फिर भी वे बहुत बेबाक थे। लगता है कि खुशबंत सिंह का एक लघु अवतार हो-जिसको अभी बहुत दिन और जीना था। उनका पहली बार नाम मैंने तब सुना था जब आउटलुक (इंग्लिश) सन् 1995 में लांच हुई थी और उसमें नरसिम्हा राव की जीवनी ‘द इनसाइडर’ का कुछ हिस्सा छपा था जो विवादास्पद हुआ था। उस समय गांव में था और बीबीसी पर इस पर कोई स्टोरी सुनी थी। उनका आखिरी लेख मैंने टाईम्स ऑफ इंडिया में पढा था, जो प्रधानमंत्री के मीडिया सलाहकारों पर था- The media advisers come in all shapes and sizes. उनकी किताब ‘लखनऊ ब्वॉय’ और ‘एडीटर अनप्लग्ड’ पठनीय किताबें हैं। विनोद मेहता को श्रद्धांजलि।

पत्रकार सुशांत झा के फेसबुक वॉल से.


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