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सुख-दुख

अभद्र अभिव्यक्ति के पीछे का सच : ”आपका सुपुत्र क्लास में दूसरे बच्चों को गालियां देता है… ”

Gopal Agrawal-

मैंने एक विद्यार्थी के अभिवावक को बुलाकर बताया कि आपका सुपुत्र क्लास में दूसरे बच्चों को गालियां देता है कृपया इसकी सोहबत पर नजर रखें। अभिभावक का उत्तर विस्मयकारी था। उन्होंने तीन गालियों का विशलेषण लगाते हुए कहा कि क्लास के दूसरे बच्चे ही ऐसा करते होंगे, उनके घर पर तो कोई गाली जानता भी नहीं। मैंने अन्दाजा कर लिया कि भाषा में गालीयों का मिश्रण उनके अन्दर समाहित हो चुका है या वर्तमान शब्दावली में DNA में है। मनोरोग की इस अवस्था में वे जान ही नहीं सकते कि उनके प्रत्येक वाक्य में तीन चार शब्द असामजिक प्रकृति के हैं।

अब जरा गौर करें कि समाज में कुछ लोग कहीं से सीख कर आए कि महिला का अर्थ सिर्फ बच्चों के जन्म तक सीमित है वे चार से चालीस बच्चे जनने की बात करते हैं। समाज के ही लोगों पर तंज कसते हुए पाकिस्तान या समुद्र का रास्ता बताते हैं। ऐसे व्यक्तियों के लर्निग पाइन्ट पर फोकस कर मनोरोग का उपचार किया जाय। आलोचना से उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि वे चाहते यही हैं कि लोग उनकी बातों से प्रभावित हों या आलोचना करें। नाम की प्रसिद्धि दोनों अवस्थाओं में है।

इसे एक लक्षण के रूप में भी लें। राष्ट्र नीति सिद्धान्तों, योजनाओं, समता, सम्पन्नता, सरसता, सभ्य व अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता जैसे तत्वों से बनी है। किसी की निजी अस्मिता पर अतिक्रमण कर घोंस जमाना समाजिक व राजनीतिक चेतना में निषेध है। धर्म, राजनीतिक विचार व समाजिक परिवर्तन के औजार तथा प्रयोग का तरीका सोच के अनुरूप पृथक पृथक हो सकता है परन्तु इसमें घृणा व हिंसा को अध्यात्म या भौतिक विमर्श स्वीकारोक्ति नहीं देता। ईश्वर को न मानने वाले भी एक तरह से अनेकों ईश्वर के सिद्धांत को न मानने वाले हुए और जो मानते भी है वे भी समझते है कि जब ईश्वर एक ही है तो पृथक पथृक धर्म के पृथक पृथक ईश्वर नहीं हो सकते। सब एक ही कुनबे के हैं। रीत-रिवाज से कुछ अलग हो गये।

मैं तो यही सोचूगां व प्रार्थना करूंगा, ईश्वर से भी तथा उन व्यक्तियों से भी कि समाज में हिंसा के बल पर कमजोर बनाम बलवान, गोरा बनाव काला, स्त्री बनाम पुरूष, गरीब बनाम अमीर के बीच भेद बंद कर कृषक व स्थानीय बाजार के उत्थान के लिए बनने वाली योजनाओं पर बहस चलायें अन्यथा चुनाव घनाड्य वर्ग की बपोती बन जायेंगे। इसे यूं समझ सकते है कि आपके एक मत से एक वाट की विद्युत ताकत लेकर करोड़ों लोगों से एक-एक वाट एकत्रित कर अपार शक्ति का केन्द्र सत्ता प्रमुख बन जायेगा। उस शक्ति से वे व्यक्ति खुले रूप से लाभान्वित होंगे जिन्होंने इस ताकत को जुटाने के लिए अपने धन को खपाया था, जिसकी हजारों लाखों गुना वसूली वे स्वयं लाभार्थी बन कर करेंगे। इसलिए जहां भी उत्तेजनात्मक गैर सैद्धान्तिक बात हो, संभल जाना चाहिए। कहीं कोई ठगी के लिए संवाद तो नहीं रच रहा है। हां, ध्यान रखना, जिसकी भाषा-संस्कृति सभ्य व नीति परिचायक नहीं, वह नेता नहीं है।

लेखक गोपाल अग्रवाल मेरठ के निवासी हैं. चिंतक और समाजवादी राजनेता होने के साथ-साथ कुछ शिक्षण संस्थानों के संचालक भी हैं. गोपाल से संपर्क 09837087693 या [email protected] के जरिए किया जा सकता है.

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