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आनलाइन एड एजेंसी झुकी, भड़ास के खाते में हफ्ते भर के विज्ञापन के लिए 70 डालर आए… चीयर्स

एक विदेशी आनलाइन एड एजेंसी ने 70 डालर मेरे एकाउंट में भेज दिए. काफी दिनों से बारगेनिंग चल रही थी. मैंने बहुत पहले तय कर लिया था कि बिना एडवांस लिए आनलाइन या आफलाइन, किसी एड एजेंसी वालों या किसी शख्स का विज्ञापन नहीं चलाउंगा क्योंकि विज्ञापन चलवाने के बाद पेमेंट न देने के कई मामले मैं भुगत चुका था. बकाया भुगताने के लिए बार बार फोन करने, रिरियाने की अपनी आदत नहीं रही. हां, इतना जरूर कुछ मामलों में किया हूं कि किसी रोज दारू पीकर बकाया पैसे के बराबर संबंधित व्यक्ति को फोन कर माकानाकासाका करके हिसाब चुकता मान लेता हूं. पर यह कोई ठीक तरीका थोड़े न है. इसलिए एक नियम बना लिया. बिना एडवांस कोई विज्ञापन सिज्ञापन नहीं. दर्जनों एड प्रपोजल इसलिए खारिज करता रहा क्योंकि आनलाइन एजेंसी को एडवांस पेमेंट वाला शर्त मंजूर न था. लेकिन आखिरकार एक एड एजेंसी झुकी और 70 डालर हफ्ते भर के विज्ञापन के लिए दे दिए.

एक विदेशी आनलाइन एड एजेंसी ने 70 डालर मेरे एकाउंट में भेज दिए. काफी दिनों से बारगेनिंग चल रही थी. मैंने बहुत पहले तय कर लिया था कि बिना एडवांस लिए आनलाइन या आफलाइन, किसी एड एजेंसी वालों या किसी शख्स का विज्ञापन नहीं चलाउंगा क्योंकि विज्ञापन चलवाने के बाद पेमेंट न देने के कई मामले मैं भुगत चुका था. बकाया भुगताने के लिए बार बार फोन करने, रिरियाने की अपनी आदत नहीं रही. हां, इतना जरूर कुछ मामलों में किया हूं कि किसी रोज दारू पीकर बकाया पैसे के बराबर संबंधित व्यक्ति को फोन कर माकानाकासाका करके हिसाब चुकता मान लेता हूं. पर यह कोई ठीक तरीका थोड़े न है. इसलिए एक नियम बना लिया. बिना एडवांस कोई विज्ञापन सिज्ञापन नहीं. दर्जनों एड प्रपोजल इसलिए खारिज करता रहा क्योंकि आनलाइन एजेंसी को एडवांस पेमेंट वाला शर्त मंजूर न था. लेकिन आखिरकार एक एड एजेंसी झुकी और 70 डालर हफ्ते भर के विज्ञापन के लिए दे दिए.

बात सत्तर डालर जैसी छोटी रकम की नहीं. बात सिद्धांत की है. कंटेंट और तेवर मेनटेन रखें तो विज्ञापन पैसा प्रतिष्ठा सब खुद ब खुद अपने कदमों पर चल कर आते हैं. अन्यथा डग्गामारी पत्रकारिता का हश्र देख ही रहे हैं. कंटेंट छोड़ कर बाकी सभी मोर्चे पर संपादक से लेकर मार्केटिंग तक के लोग बांय बांय करते हुए मरे जा रहे हैं पर जनता है कि उन्हें भाव न देकर बिकाउ बिकाउ पेड पेड बाजारू बाजारू समेत जाने क्या क्या कह कह कर लिहो लिहो कर रही  है. और, ये सच है कि अगर मीडिया बिकाउ व पेड न हुआ होता तो मीडिया के खिलाफ भड़ास निकालने की खातिर किसी आनलाइन प्लेटफार्म की जरूरत न पड़ती.

मीडिया के बदलते व नए ट्रेंड्स को लेकर मेरे पास जो थोड़ी बहुत समझ है, वह खुद के अनुभव के आधार पर है. साफ साफ दिख रहा है कि मीडिया का बहुत तेजी से विकेंद्रीकरण हो रहा है. जिस कदर आनलाइन न्यूज पोर्टल और वेब टीवी चैनल शुरू हो रहे हैं, उससे मीडिया व पत्रकारिता नामक महत्वपूर्ण चीज कुछ घरानों, कुछ व्यक्तियों, कुछ शख्सियतों की बपौती नहीं रहा करेगी. सोशल मीडिया और आनलाइन मीडिया के कारण जो जबरदस्त चेंज आए हैं उससे बड़ा फायदा आम पत्रकारों समेत उन तमाम लिखने पढ़ने वालों को हो रहा है जो अपने सोच में क्रिएटिव हैं, सरोकारी हैं, हार्डवर्किंग है, इन्नोवेटिव हैं, तकनीकी ज्ञान से लैस हैं. दुनिया भर में एड रेवेन्यू का बहुत बड़ा हिस्सा डिजिटल यानि इंटरनेट की तरफ मुड़ चुका है. कोई यूट्यूब पर अपना चैनल चलाकर लाखों रुपये महीने कमा रहा है तो कोई अच्छा सा ब्लाग लिखकर लाखों रुपये महीने विदेश से मंगा रहा है.

दिल्ली से लेकर आगरा तक के उन कई लोगों को जानता हूं जो सामान्य गृहिणी हैं या युवा टेक एक्सपर्ट हैं, और, गूगल के ही प्लेटफार्म्स पर अपनी क्रिएटिविटी व ज्ञान के जरिए लाखों रुपये महीने कमा रहे हैं. डिजिटल की तरफ शिफ्ट हो रहे एड रेवेन्यू का छोटा छोटा हिस्सा हम भड़ास जैसे पोर्टलों /  न्यू मीडिया माध्यमों के जरिए अलग किस्म का कंटेंट क्रिएट करने वालों को भी मिल रहा है. यह एड रेवेन्यू लाखों करोड़ों उन न्यूज पोर्टलों / न्यू मीडिया माध्यमों तक पहुंच रहा है जो जमीनी-रीयल किस्म की पत्रकारिता या किसी खास फील्ड का एक्सपर्ट होकर संबंधित कंटेंट क्रिेएट कर रहे हैं व इसके जरिए खुद का व अपने माध्यम का अलग स्थान पहचान बनाए हुए हैं. ये लोग खुद का एक बड़ा पाठक वर्ग / दर्शक वर्ग क्रिएट कर चुके हैं.

यूट्यूब से लेकर ब्लाग, वेब, सोशल मीडिया आदि के जरिए एक होनहार समझदार नौजवान अब अच्छा खासा पैसा कमा सकता है, इसका उल्लेख आनलाइन कंटेंट मानेटाइजेशन वर्कशाप में कर चुका हूं जिसमें शरीक होने के लिए देश भर से लोग ग्यारह ग्यारह सौ रुपये देकर आए थे. पहले सारा ज्ञान व पैसा अंग्रेजी में था. लेकिन अब हिंदी के आगे बड़े बड़े घुटने टेक रहे हैं. गूगल के एडसेंस से महीने में सैकड़ों डालर मिलने के साथ साथ अब दूसरी आनलाइन एड कंपनीज भी भड़ास को एडवांस में पेमेंट देकर अपने विज्ञापन लगवा रही हैं. यह हिंदी के लिए और आनलाइन हिंदी मीडिया के लिए सुखद मोड़ है. बड़े, कारपोरेट व बिकाऊ मीडिया घराने देश का पैसा ब्लैक में इकट्ठा कर विदेश में चुरा रहे हैं तो हम छोटे व नए मीडिया वाले विदेश से हजारों डालर देश में मंगवाकर सच्ची देश सेवा भी कर रहे हैं. सो दोस्तों, आगे बढ़िए और बिकाउ मीडिया की नौकरियों में सपने तलाशने की जगह खुद की छोटी शुरुआत कर डालिए. मैं तो चला 70 डालर के नाम आज शाम पार्टी मनाने.. चीयर्स गुरु!!!

लेखक यशवंत सिंह भड़ास के संस्थापक और संपादक हैं. इनसे संपर्क [email protected] के जरिए किया जा सकता है.

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